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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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नवगीत

 

 

जिस दिन मन खुद ही बोलेगा


मधकर गौड़

 

तुमने कैसे मान लिया मैं

चाहे जहाँ चरण धर लूँगा,

हर पत्थर के आगे जाकर

हँस कर उसे नमन कर लूँगा ।

 

मन के चित्रों पर भावों के

रंगों का तर्पण होता है,

दो चेहरों को एक बना दे

प्यार वही दर्पण होता है,

 

धूप चली है साथ हमेशा

मेरी परछाई को पकड़े,

गंध सदा सुकुमार कमल को

रहती भुजपाशों में जकड़े,

 

कैसे साहस सपन रचेंगे

अपने आप जतन कर लूँगा ।

 

आँधी के माथे पर मैंने

संकल्पों के फूल चढ़ाये,

और वेग को बाँहों में भर

आलिंगन के रास रचाये,

 

मेंहदी को कब कहना पड़ता

स्वयं ढूँढ लेती हथेलियाँ,

कितनी भी उलझी हों लेकिन

सुलझ-सुलझ जातीं पहेलियाँ,

 

जिस दिन मन खुद ही बोलेगा

अपने आप वचन भर लूँगा ।

 

मधुकर गौड़

ब्लू ओसन 1-ए-302, (ब्लू एम्पायर कांप्लेक्स)

महावीर नगर, नियर एकता नगर,

कांदिवली (प.) मुंबई -400068

 

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