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गीत |
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कहाँ गये गलीचे नयन ? महेश अनघ
कहाँ गये घूँघट के उजियारे कहाँ गयी रेशमी छुअन, यहाँ-वहाँ काम की गठानों में उलझा-उलझा-सा है मन ।
साँसों का अंगराग छूटा है पानी से आग से गुजरने में, बादल ने झेले उन्चास पवन धरती की सेज पर उतरने में, कहाँ गये मंत्रों के आमंत्रण, कहाँ गये लाज के हवन ?
कहाँ गयी वे गणगौरी रातें सिन्दूरी बातों से माँग भरी, मेंहदी की शाम दिन महावर के नूपुर जैसी बजती दोपहरी, कहाँ गये अधर धरे ताजमहल कहाँ गये मन वृंदावन ?
हमने तो सांतिए बनाये थे रिश्तों में भर कर हल्दी-चंदन, सात-सात जन्मों तक चलते थे चूनर से पगड़ी के गठबंधन, कहाँ गये इंतजार के पनघट कहाँ गये प्यास के वचन ?
लगता है उत्सव की बाँहों में धोखे से पिन चुभा गया कोई, जहरीले कर्ज के रसायन से बस्ती का मुँह धुला गया कोई, कहाँ गयी पलकें, वंदनवारें कहाँ गये गलीचे नयन ?
डी- 12 - बी, गार्डन होम्स,अलकापुरी, ग्वालियर, मध्यप्रदेश - 474006
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