ई-पताः srijjangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण थोपकथन भाषांतरसंस्कार मूल्याँकनहस्ताक्षर

पुस्तकायन विचार-वीथीप्रसंगवश इनदिनोंहिंदी-विश्व लोक-आलोकव्याकरणतकनीकबचपनशेष-विशेष हलचलविशेषांक सृजनधर्मीलेखकों से संपादक बनेंचतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

गीत

 

 

कहाँ गये गलीचे नयन ?


महेश अनघ

 

कहाँ गये घूँघट के उजियारे

कहाँ गयी रेशमी छुअन,

यहाँ-वहाँ काम की गठानों में

उलझा-उलझा-सा है मन ।

 

साँसों का अंगराग छूटा है

पानी से आग से गुजरने में,

बादल ने झेले उन्चास पवन

धरती की सेज पर उतरने में,

कहाँ गये मंत्रों के आमंत्रण,

कहाँ गये लाज के हवन ?

 

कहाँ गयी वे गणगौरी रातें

सिन्दूरी बातों से माँग भरी,

मेंहदी की शाम दिन महावर के

नूपुर जैसी बजती दोपहरी,

कहाँ गये अधर धरे ताजमहल

कहाँ गये मन वृंदावन ?

 

हमने तो सांतिए बनाये थे

रिश्तों में भर कर हल्दी-चंदन,

सात-सात जन्मों तक चलते थे

चूनर से पगड़ी के गठबंधन,

कहाँ गये इंतजार के पनघट

कहाँ गये प्यास के वचन ?

 

लगता है उत्सव की बाँहों में

धोखे से पिन चुभा गया कोई,

जहरीले कर्ज के रसायन से

बस्ती का मुँह धुला गया कोई,

कहाँ गयी पलकें, वंदनवारें

कहाँ गये गलीचे नयन ?

महेश अनघ

डी- 12 - बी, गार्डन होम्स,अलकापुरी,

ग्वालियर, मध्यप्रदेश -  474006

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण थोपकथन भाषांतरसंस्कार मूल्याँकनहस्ताक्षर

पुस्तकायन विचार- वीथीप्रसंगवश इनदिनोंहिंदी-विश्व लोक-आलोकव्याकरणतकनीकबचपनशेष-विशेष हलचलविशेषांक सृजनधर्मीलेखकों से संपादक बनेंचतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com