ई-पताः srijjangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण थोपकथन भाषांतरसंस्कार मूल्याँकनहस्ताक्षर

पुस्तकायन विचार-वीथीप्रसंगवश इनदिनोंहिंदी-विश्व लोक-आलोकव्याकरणतकनीकबचपनशेष-विशेष हलचलविशेषांक सृजनधर्मीलेखकों से संपादक बनेंचतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

गीत

 

 

मुक्ति-गीत


मधुर गंजमुरादाबादी

 

हो गये मुक्त हम,

पूर्ण उन्मुक्त हम,

छिन्न बंधन हमारे सभी हो गये ।

 

नीति के वाक्य सब धर दिये ताक पर,

अपने मन में न देखा कभी झाँक कर,

कितने सर्वस्व अपना गये राख कर,

तब गयी दासता,

हमको क्या वास्ता ?

मुफ़्त दौलत मिली हम खुशी हो गये ।

 

हर तरफ अपनी गोटें बिछाने लगे,

सिर्फ़ अपने ही सपने सजाने लगे,

मंच पर नित्य नाटक दिखाने लगे,

निखरी भाषण कला,

खूब सबको छला,

इस तरह हम बड़े, आदमी हो गये ।

 

हमने चाहा कि हर पद हमें ही मिले,

सब पे छा जाये वह कद हमें ही मिले,

लाभ हो जिसमें वह मद हमें ही मिले,

स्वार्थ साधें सदा,

सुख हमें ही बदा,

अपने घर के लिए रोशनी हो गये ।

 

चूकते क्यों भला, हमको मौका मिला,

आप करते रहे लाख शिकवा-गिला,

बस चलेगा यही, एक ही सिलसिला,

यह प्रजातंत्र है,

शक्ति ही मंत्र है,

जो हुए बस हमीं, बह हमीं हो गये ।

 

मधुर गंजमुरादाबादी

गंजमुरादाबाद, उन्नाव

उत्तरप्रदेश - 251502

 

अपनी बातकविताछंदललित निबंधकहानीलघुकथाव्यंग्यसंस्मरण थोपकथन भाषांतरसंस्कार मूल्याँकनहस्ताक्षर

पुस्तकायन विचार- वीथीप्रसंगवश इनदिनोंहिंदी-विश्व लोक-आलोकव्याकरणतकनीकबचपनशेष-विशेष हलचलविशेषांक सृजनधर्मीलेखकों से संपादक बनेंचतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com