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दोहे |
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कुन्दन सिंह सजल के दोहे
हर निर्णय में देर है, हर नगरी अंधेर तजी अयोध्या राम ने, ख्वाज़ा ने अजमेर।
मन में तो दुत्कार है, अधरों पर सत्कार इतने शातिर हो गये, लोगों के व्यवहार ।
पहले प्यार सलीम था, मजनू था, फरहाद लेकिन बनकर रह गया, अब फिल्मी संवाद ।
काम ढूँढ़ने शहर में, जो आये घर छोड़ सिमट गया फुटपाथ तक, उनका बाकी जोड़ ।
जुदा किसी की है धरा, जुदा किसी का व्योम अपने सारे एक से, बुद्ध शनीचर सोम ।
हर चेहरे पर बेबसी, हर चेहरे पर मौन निरक्षरों के गाँव की, चिठिया बाँचे कौन ।
पहले साहूकार का, अब सरकारी लोन इस कर्जे का गाँव से, भूत भगाये कौन ।
जीवन भर सन्मार्ग की खातिर रहे फ़क़ीर अब पंथों में बँट गये, दादू संत कबीर ।
उदय निवास, रायपुर(पाटन) सीकर, राजस्थान
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