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वर्ष- 2, अंक - 13, जून, 2007

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दोहे

 

जफ़र गोरखपुरी के दोहे

 

कहिए जो बेहतर लगे, बिना झिझक बिन खेद

ज़िंदा रखिये सोच को, होते हैं मतभेद ।

 

भेष बदलने से कहीं,  छुपते हैं करतूत

चाहे मुखौटा ओढ़ लो, चाहे मलो भभूत ।

 

क्या जाने क्या पी लिया,  माटी ने इस बार

धरती में सुर बोइये,  उग आये तलवार ।

 

बच्चे बस बाहर हुए,  घर महफ़ूज न बाट

अब ईश्वर भी क्या करे,  जो बोया सो काट ।

 

तट भी प्यासा ख़ून का, सागर को भी बैर

गए हैं चुनने सीपियाँ,  बच्चों की हो खैर ।

 

तीखी, मीठी थालियाँ,  सारे भोजन याद

जो माँ के हाथों पके,  उसका और ही स्वाद ।

 

मेरी कुल पूँजी यही,  साजन का इन नाम

सखी रे लेकर क्या करूँ, हाड माँस और चाम ।

 

आनी जानी लक्ष्मी,  लगा सके ना अंक

मर जाना भाया हमें सरस्वती के संग ।

जफ़र गोरखपुरी

ए-302, फ्लोरिडा, शास्त्री नगर

अंधेरी (पश्चिम), मुंबई-400053

 

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