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दोहे |
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जफ़र गोरखपुरी के दोहे
कहिए जो बेहतर लगे, बिना झिझक बिन खेद ज़िंदा रखिये सोच को, होते हैं मतभेद ।
भेष बदलने से कहीं, छुपते हैं करतूत चाहे मुखौटा ओढ़ लो, चाहे मलो भभूत ।
क्या जाने क्या पी लिया, माटी ने इस बार धरती में सुर बोइये, उग आये तलवार ।
बच्चे बस बाहर हुए, घर महफ़ूज न बाट अब ईश्वर भी क्या करे, जो बोया सो काट ।
तट भी प्यासा ख़ून का, सागर को भी बैर गए हैं चुनने सीपियाँ, बच्चों की हो खैर ।
तीखी, मीठी थालियाँ, सारे भोजन याद जो माँ के हाथों पके, उसका और ही स्वाद ।
मेरी कुल पूँजी यही, साजन का इन नाम सखी रे लेकर क्या करूँ, हाड माँस और चाम ।
आनी जानी लक्ष्मी, लगा सके ना अंक मर जाना भाया हमें सरस्वती के संग ।
ए-302, फ्लोरिडा, शास्त्री नगर अंधेरी (पश्चिम), मुंबई-400053
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