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भाषांतर |
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बांग्ला कविता अनुवादः तपन मुखर्जी आकाश के उस पार जो कुछ मृत्यु के नीचे है वही शुरूआत है जो नीचे डूब जाते हैं वे आते हैं फिर-फिर जल, वायु तथा घास उन्हें लगा देते हैं पंख
आकाश के उस पार सब कुछ अंकित है अस्त होता है सूर्य जल में जो प्रतिबिंब बनाता है उसे ही उथल-पुथल किया जाता है कभी इस पार कभी उस पार मूल रचनाः जय गोस्वामी
फिर आना है वापस फिर आना है वापस-धानसीढ़ी के पास- इसी बंगाल में आदमी नहीं तो चील या किसी पक्षी के रूप में या भी भोर का कौआ बनकर इस कार्तिक के देश में कोहरे की धुंध में तैर कर कटहल की छाँव में या फिर हंस बन कर पूरे दिन तैरते हुए तालाब में वापस होगी बंगाल के नदी और ज़मीन का दुलान पाने
शायद संध्या की हवा में कुछ उड़ता हुआ देखेंगे या फिर कोई उल्लू बैठा होगा किसी डगाल में या फिर कोई शिशु आँगन में धान से खेलता मिलेगा किसी नदी में कोई किशोर वापस आता मिलेगा नाव से कोई एक सफेद बगुला दिखेगा इन्हीं सबकी भीड़ में । मूल रचनाः जीवानंद दास
भमण चलना अधिक पड़ता है वापस आने के रास्ते पर जाना पहचाना और बहुत ही सहज है वापसी का रास्ता अभी हाल, सब जगह वापसी से ही सरोकार है यदि न जाना चाहें सब समय पहाड़ करीब आता है स्थिर पहाड़ घेर लेता है यह कैसा निरूद्ध भ्रमण है खड़े रहो या फिर वापस आओ जहाँ भी जाओगे वहीं भविष्य है मूल रचनाः शंख घोष
11, विद्यानगर, अमलीड़ीह रायपुर, छत्तीसगढ़
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