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अपनी बात |
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।। हिंदी का वर्तमान ।।
भाषा
शुरू में नहीं थी । थी भी तो इस रूप में नहीं । भाषा व्यवहारकर्ता की
श्रद्धा पर जनमती है
भाषा वह फूल है जिससे मनुष्य महकता है । समाज गमगमाता है । भाषा की बगिया माली के श्रम और प्रेम से जाना-पहचाना जाता है । माली का व्यवहार यदि आत्मीय है तो वह पास-पडौस को लांघकर औरों की बाड़ी तक अपना सुवास फेंकती है । माली यदि किराये का है तो वह कब मुरझा जाये कहा नहीं जा सकता है । कहने का मतलब साफ है कि वह समर्पित भाषाभक्तों से समुदाय की सीमा को लाँघकर इतर भाषा-भाषियों को आर्कषित करती है । जीवन के सभी घटकों में उसकी उपस्थिति अनिवार्य-सी हो जाती है । वह ऐसी अवधियों में जीवन की ताकत बन जाया करती है। मनुष्य या भाषानुयायी या भाषाश्रित तब अपने जीवन को भाषा के निर्देशों, संकेतों, इशारों और मर्मों से ही संचालित करता है ।
भाषा अंततः है क्या ? वह शब्दों का कुंजलक है । जिनके कुछ अर्थ होते हैं या मान लिये जाते हैं । अर्थ रहित शब्द भाषा से बाहर है । वह शब्द हो सकता है पर भाषा नहीं । इन शब्दो और अर्थों का एकमात्र घर स्वयं हमारे मन होता है । मन के अलावा वे कहीं नहीं होते । होते हैं क्या, आप ही सोच कर तो देखें ? इसे तीन तरह से बूझा जा सकता है । एक – शब्द । दूसरा – अर्थ और अंतिम वक्ता या श्रोता का मन । भाषा ही मन के भावों को दूसरों तक पहुंचाती है । जाहिर है शब्द और उसके अर्थ में हमारे और आपके मन के संयोग से एक अभेद्य पुल स्थापित हो जाता है । यानी कि भाषा के शब्द संकेत मात्र हैं और इन्हीं संकेतों से मनुष्य की दुनिया का सारा कारोबार चलता रहता है । इदिसिद्धम है - भाषा और मनुष्य परस्परावलंबी हैं । परस्पर रचयिता है एक दूसरे के ।
आज जब हम अपनी भाषा हिंदी को देखते हैं - खासकर 21 वीं सदी की शुरूआती मौके पर तो भ्रम-सा पैदा होता है । प्रश्न खड़े होने लगते हैं – क्या हिंदी का मनुष्य भूल गया कि वह अपनी भाषा का सानिध्य नहीं चाहता ? भाषा एकाएक कैसे उसके मनुष्य के भविष्य के लिए प्रश्न खड़ी कर रही है ? क्या यह केवल भ्रम है ? जो भाषा अपनी परिधि में मनुष्य का वर्तमान और आगत गढ़ती रही, वही कैसे भोथऱी लगने लगी है ? वह एक अनजान और अल्पचीन्ही भाषा के प्रति क्योंकर मोहग्रस्त होती जा रही है ? वह नहीं, उसके अनुयायी ही, जिसे स्वयं उसने गढ़ा है, मोहभंग के शिकार हो रहे हैं ? जो कभी मनुष्य का सब कुछ हुआ करती थी वह क्योंकर उपेक्षित सी जान पड़ती है ? प्रश्न हजारों हो सकते हैं ।
तर्क में आप भी कह सकते हैं कि अब हिंदी करवट ले रही है। जैसे वह पहले भी लिया करती थी । उसका मूल कहाँ है । वह तो संस्कृत की धारा से निकल कर कभी आयी थी । कभी वह ब्रज को अपनाने लगती थी, और कभी अवधी को । उसका अपना तो कुछ है नहीं । शायद यह भी कह सकते है कि अंगरेज़ी को वह लील जायेगी । अंगरेज़ी उसे लील नहीं सकती । और हिंदी को लेकर संशय की जरूरत नहीं । पर ऐसा होता तो मन में कुछ राहत भी होती । वस्तुतः ऐसा नहीं हो रहा है । अंगरेज़ी से उसका बैर भी नहीं । हिंदी का चरित्र ही है ऐसा कि वह किसी भी भाषा की विरोधिनी नहीं । हिंदी समरस भाषा है । हिंदी ही क्यों भाषा मात्र सामंजस्यता का मूल मंत्र हुआ करते हैं । भाषा में बैरतामूलक कुछ भी नहीं होता । यह तो उसके व्यवहार का षडयंत्र हुआ करता है । हिंदीभाषी यानी हम हिंदी के साथ उस तरह से नहीं है कि वह किसी भाषा या अंगरेज़ी को लीलने की मानसिकता में है । हम सभी हिंदी के बरक्स अंगरेज़ी को मात्र व्यावसायिकता के कोण से ललचायी दृष्टि से देख रहे हैं । जैसे एक भीखमंगा उसे देखता है । अपने अस्तित्व को बिसार कर । लगभग घुटना टेक मुद्रा में । इतिहास गवाह है कि देवभाषा मनुष्य की उदासीनता और उपेक्षा से त्रस्त होकर किताबों के पन्नों में जा सिमटी । सैकड़ों भाषा गायब हो चुके हैं । हिंदी गायब तो नहीं पर गायब होने की ओर प्रस्थान करने लगी है । कम से कम उसका मूल-स्वर ।
क्या इसमें हिंदी का दोष है जिससे हमें सैकड़ों वर्षों से ठीक से रच नहीं पाये ? शायद नहीं । कोई भी भाषा अस्मिता के विरूद्ध पाठ नहीं होती । हिंदी ने सदैव धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को साधा है । बराबर लय से । बराबर गति से । उसके यहाँ किसी को कम या ज़्यादा तवज्जो नहीं रहा है। यही हिंदी-मन भी में दिखता है और साहित्य का सारांश में भी । आज हिंदीतर भाषा को मात्र अर्थ के दर्पण में टकटकी लगाकर देखा जा रहा है । हिदीं का मनुष्य इतना दरिद्र हो गया है कि वह मात्र पेट के लिए अंगरेज़ी के आइने में अपना चेहरा चमकाना चाहता है। कोई कह सकता है कि यह बाजार का तिलस्म है । जैसे बाजार हिंदी भाषा के बीच रहा ही न हो कभी । कबीर ने उसे देखा है । तुलसी भी वहाँ से गुजरे हैं । बाजार स्वयं हौव्वा नहीं है । उसे सजाने और रचाने वाले मनुष्य ही हौव्वाबाज है । जाहिर है ये हौव्वाबाज इस ज़मीन के नहीं उस ज़मीन के हैं जो मनुष्य को नहीं मनुष्य के बाह्य वैभव को सर्वोपरि समझते रहे हैं । वे पश्चिम के हों ना हों हिंदी के नहीं हो सकते । हिंदी के मनुष्य की कमज़ोरी का फ़ायदा उठाकर वे बाजार के बहाने सेंध मार रहे हैं । वैसे यह सेंध पहले भी हुआ था । आज जिस तरह हिंदी अपने ही आँगन में उदास और उपेक्षित पड़ी है उसके मूल में बाजारवादी अंगरेज़ों की कुटिल चालें और धूर्ततायें ही तो रही हैं, जिसे आज तक न हमारे आका बूझ सके न हमारे भाषाविद् । जनता बेचारी खाक बूझ सकेगी । वह तो हाड़तोड़ मेहनत से लौटकर सब कुछ भूल जाती है ।
कोई यह भी कह सकता है कि अंगरेज़ी विश्व की बोली है । मैं यह पूछना चाहता हूँ कि वे कौन लोग है जिन्हें हिंदी को वैश्विक वाणी बनाने की जिम्मेदारी थी और जिन्होंने हिदी को इस मुकाम तक ला खड़ा किया ? किसने रोका था 50 करोड़ शिक्षित और चेतनासंपन्न आबादी को ऐसा करने से ? आप को यह कहने की अनुमति है कि हिंदी का आम आदमी को क्या अधिकार है ? क्या साधन है उसके पास ? कुछ हद तक सहमत भी हुआ जा सकता है जिसे रोजी-रोटी के लाले पड़ रहे हों वह भला भाषा के लिए योजनाबद्ध ढंग से सोच सकेगा । पर क्या जो इस बीच धनबली थी, ज्ञानबली थे । मनुष्य के विकास के बड़े-बड़े दावे में जोर-जोर से छाती ठोंकते रहते हैं जो । जिन्होंने नेतृत्व दिया समाज का । उन्होंने क्या किया ? इसके उत्तर में जो जो चेहरे बेनकाब होते हैं उन्हें किसने ऐसा करने दिया ? वे लोग कौन थे जिन्होंने यह सब जानते हुए भी हिंदी को वैश्विक बनाने में लाचारी ही प्रदर्शित की । या लाचार बने रहने का नाटक किया । इसमें हमारे जननायक भी आते हैं और भाषासेवी भी । भाषाशास्त्री भी और शिक्षाविद् – गुरूजन भी । सबसे ज्यादा वे पढ़े-लिखे लोग आते हैं जिनकी नैतिकता थी कि वे अपनी माँ के साथ धोखा न दें । उसकी अस्मत लुटते वक्त शुतुरमूर्ग का चेहरा ने ओढ़ लें । वे क्योंकर हिंदी के स्थान पर विदेशी भाषा के लिए चाकरी करते रहे । उन्होंने क्योंकर कभी विरोध नहीं जताया । क्यों उन्होंने हिंदी की श्रीवृद्धि के लिए समर्पण नहीं किया । जिसने भी ऐसा नहीं किया उसने सिर्फ अपनी निजता को बचाया है । यानी कि भाषा के साथ द्रोह किया है । उस भाषा के साथ जिसने उसे इस मुकाम तक पहुँचाया, इसी सूची को ज़रा विस्तृत करें तो ढेर सारे वर्ग के लोग मुँह छिपाते हुए नज़र आयेंगे । और जो भी ऐसा दिखते हैं वे सभी कहीं न कहीं राष्ट्रद्रोही भी है तब जब वह भाषा उनके देश की राष्ट्रभाषा भी हो ।
जो लोग हिंदी को हिंग्लिश बना रहे हैं वे दोगले संतान हैं । उन्हें आप ऐसा करने दें । यूँ भी दोगले किस्म के लोग किसी की नहीं सुनते । आप इन्हें रोक नहीं सकते तो भी चिंता की बात नहीं । इसमें क्या मीडिया को परे रखा जाना चाहिए । जिस मीडिया ने कभी हिंदी को मुक्ति की भाषा घोषित किया था । और जिसने विश्व के कई देशों को समानता, विश्ववंधुत्व और स्वतंत्रता का मंत्र दिया था उसी हिंदी के साथ आज मीडिया बलात्कार पर उतर चुका है । जैसे ऐसा करना ही सभ्यता हो उसकी । जैसे उसके पास विकल्प न रह गया हो । माना कि आप ऐसे स्वार्थी और बाजारू मीडिया के विपक्ष में खड़े रहने में आज सक्षम नहीं । आप में यह ज़ज्बा भी न रहा हो । कोई बात नहीं । ऐसे तत्वों के लिए आत्मीय विरोध तो पैदा कर ही सकते हैं – अपने मन में । मैं लगे हाथ एक उदाहरण देना चाहता हूँ । मेरे मित्र हैं –चंद्रशेखर व्यास । जाने-माने नाट्यकर्मी हैं । उन्होंने उसे टीव्ही को कभी अपने घर में घुसने नहीं दिया जो आज करोड़ों-करोड़ लोगों की भाषा बदल चुकी है । क्या मीडिया का इस तरह से विरोध नहीं किया जा सकता ? क्या वे पिछड़ गये ? चंद्रशेखर बनने में कोई दिक्कत नहीं है । फिर क्या, जब यह इलेक्ट्रानिक मीडिया नहीं था तो भारतीय या हिंदी पिछड़ी दशा में थी ?
कहने को तो ज्ञान आयोग के तर्क भी हैं और सैम पित्रौदा की वाणी भी । जो यह मान बैठे हैं कि अंगरेज़ी ज्ञान-विज्ञान की भाषा है । बात यहीं तक रहती तो ठीक भी है । उसे समूचा देश ज्ञान के लिए सीखता । उनका यह कहना हजम नहीं होता कि देश को ऊँचा उठाना हो तो कक्षा पहिली से ही अंगरेज़ी की पढ़ाई हो । यह तदर्थवाद है । अंगरेज़ी से जुझने का सामान्यीकरण जैसा है । ज्ञान आयोग की अनुशंसा में हिंदी या मातृभाषा पर खास ध्यान हो ऐसा नहीं लगता । इसका मतलब यही कि हमारे देश के कर्णधारों को अब भारत का विकास विदेशी भाषा के बगैर नहीं दिखाई देता । वाह रे देशप्रेम । यानी हिंदी सहित सारी मातृभाषायें चाकरी करें अंगरेज़ी की । यह विचारों में आधुनिकता नहीं विचारों का फैशन है । देश की आत्मा को ढहाने का खेल भी है । किसी को नेस्तनाबुद करने के लिए मात्र उसकी भाषा छीनना पर्याप्त होता है । वे इन संकटों से कैसे वाकिफ़ नहीं है । और यदि हैं तो फिर यह कैसी चालें है । ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा के लिए अंगरेज़ी सभ्य मनुष्य के लिए सहयोगी हो सकती है पर साध्य नहीं । ज्ञान-आयोग जिस तरह पिल पड़ा है उसमें हिंदी की अवमानना भी दिखाई देती है । सैम पित्रोदा के रिश्तेदार मेरे शहर में रहते हैं । वे आज भी घर-बाहर अंगरेज़ी में बात नहीं करते । स्वयं सैम पित्रोदा भी जब कभी रायपुर आते हैं तो परिजनों से अपनी भाषा में बतियाते हैं । वहाँ उनका ज्ञान या वैभव अंगेरज़ी के बगैर भी दिखाई देता है । और कदाचित वे भी अंतर्मन से समझते हों कि मातृभाषा का स्थान कोई अन्य भाषा खासकर विदेशी भाषा तो ले ही नहीं सकती । खासकर वह तो कदापि नहीं जिसने उसे परतंत्र बनाया ।
मेरे समक्ष एक उदाहरण और है – भारत के कुछ नये राज्यों में कक्षा पहली से अंगरेज़ी की पढ़ाई अनिवार्य कर दी गई है। मेरे अपने राज्य छत्तीसगढ़ में मेट्रिक का रिजल्ट कल-परसों ही आया है । जानते हैं प्रावीण्य-सूची में अंगरेज़ी माध्यम का एक भी विद्यार्थी जुड़ नहीं सका है । हालांकि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं लेकिन यह इस बात का भी प्रमाण है कि लाखों बच्चे अंगरेज़ी में अपनी अभिव्यक्ति अभी भी उस ढंग से नहीं कर पा रहे हैं जिसकी अपेक्षा की गई थी । वैसे यह सच ही है कि मनुष्य की ताकत अपनी भाषा में ही निहित होती है । बाह्य-भाषा में कदापि नहीं । भले ही उसे रोजी-रोटी के लिए अपनाया जाता है । मातृभाषा में नेह होता है और बाह्य-भाषा में दबाब ।
मित्रो, हम यहाँ उस हिदीं के पक्ष में जुमले गढ़ रहे हैं जो आज़ादी के 6 दशक के बाद भी देश की वास्तविक रूप में राष्ट्रभाषा नही बन सकी । हमने अपने संविधान को भी धता बता दी । और जिसके लिए राजनीति ने सदैव उत्तर और दक्षिण का द्वंद्व पैदा की है । वैसे आज समूचे भारत में हिंदी को लेकर कोई विरोध नहीं है । हाँ असम अभी भी हिंदी के खिलाफ़ हिंसक बना हुआ है । परदेश की ओर चलें तो बड़ी खुशी होती है । हमारे लाखों प्रवासी आज भी हिंदी की मशाल वहाँ थाम रखे हैं । किसी हद तक भारतीय परिवेश से ज्यादा । प्रवासी लेखन इसकी गवाही देता है जिसका मूल्याँकन होना अभी शेष है । हिंदी सेवी संस्थाएं और लोग आज अनेकों देश में हिदी संस्कृति के विकास के लिए कटिबद्ध नज़र आते हैं । उनकी वंदना की जानी चाहिए । वंदना तो उनकी भी की जानी चाहिए जो निस्वार्थ भाव से नयी तकनालॉजी में हिंदी के वर्चस्व को कायम रखने के लिए नयी-नयी खोज कर रहे हैं । यह दीगर बात है कि हमारे अपना पडौसी जगदीप डांगी जैसे अति महत्वपूर्ण हिदी सॉफ्टेवेयर रचयिता भी उपेक्षित पड़े हुए हैं जिनकी कोई उसकी सुधि लेने वाला नहीं है ।
ऐसे मौके पर जब हम 8 वे विश्व हिंदी सम्मेलन करने जा रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र संघ के कामकाज की भाषा के रूप में हिंदी की प्रतिष्ठा दिलाने के लिए संकल्प दोहराने वाले हैं, जरूरी होगा कि अपने आस-पास में विकृत होती हिंदी की भी सुधि लें । अब तक उपेक्षित संकल्पों को याद करें । जिसे बापु ने कहा था । जिसे भारतेंदु जी ने कहा था । ठीक है कि भाषा बहता नीर है । पर जब कभी वह नीर प्रदुषित हो जाये तो उसकी शुद्धता भी आवश्यक होती है । जिस तरह से नई पीढ़ी में रूझान बदल रहा है और वह हिंदी को लगातार बिसारने पर तुली हुई है वह गंभीर संकट का संकेत है । इसमें नया मीडिया – वेब की सफाई या आत्मनियंत्रण जैसा आचार संहिता भी आवश्यक है । क्या ये हमारी छवि उस रूप में समूचे विश्व में नहीं प्रसारित कर रहे हैं जिस रूप में न हम हैं न ही वैसा कहलाना पंसद करते हैं । हिंदी ब्लॉग की भाषा और उसके चरित्र पर अभी चिंतन होना शेष है फिर भी उसकी शुरूआत कहीं न कहीं से होना चाहिए । ऐसे समय में यह और भी जरूरी है जब वह हिंदी को विश्वव्यापी बनाने में ज्यादा कारगर साबित हो रही है - जब उसे विश्व भाषा बनाने का संकल्प दोहराया जा रहा है ।
हिंदी चिट्ठे और चिट्ठेकार- इधर के कुछ वर्षों में ब्लॉगिंग की मुफ़त तकनीक और भाषायी सक्रियता से अंतरजाल पर हिंदी पृष्ठों की संख्या में गणनात्मक वृद्धि परलक्षित हुई है । इधर कुछ उत्साही लोग हिंदी ब्लॉग का इतिहास लेखन पर भी उतर आये हैं । शुभ है । इसमें कोई बुराई भी नहीं । पर कहीं से उसकी शुचिता के लिए भी आगे आना होगा । जैसे कि मुक्तिबोध कहा करते थे कि बेहत्तर समाज के लिए एक मेहत्तर भी चाहिए । जाने क्यों, पर मुझे लगता है शिशुओं का इतिहास नहीं लिखा जाता उनका भविष्य संवारा जाता है । सुधार में ही उसका भविष्य अपने-आप सुरक्षित होते चलता है । उसका इतिहास बनते चलता है ।हिंदी ब्लॉगिंग का समकालीन परिदृश्य बयान देता है कि इतिहास से कहीं ज़्यादा उसके वर्तमान को संवारने की जरूरत है । क्योंकि वह तो अभी कच्चा शिशु मात्र है ।
हम ब्लॉगर आत्ममुग्धता से ग्रस्त हैं । हम ठीक वैसा ही हरकत कर रहे हैं जैसा हिंदी साहित्य में होता चला आया है कि विधा के जन्म लेने और नामकरण संस्कार से पहले ही उसके जनक-दायी पडौसी आदि के दावे-प्रतिदावे शुरू हो जाते हैं । कोहराम-सा मच जाता है । यह प्रश्न इसलिए भी उठ खड़ा होता है कि जब हिंदी का कोई विश्व प्रसिद्ध सॉफ्टवेयर निर्माता बदहाल और संघर्ष से गुजरता है तो सिर्फ उसके पक्ष में सिर्फ 30-35 ब्लॉगर सामने आते हैं । उसमें से भी कुछ ऐसे स्वरों को भावुकता करार देते हैं । मानो बुद्धि के बल पर वे अब तक ऐसे रचयिता के लिए खुब आवाज़ उठाते रहे हों । यह बुद्धि का कौन सा कोण है ? क्या ऐसे बुद्धिजीवी इन प्रतिभावान के लिए कभी अपना पुरस्कार त्यागने की सोचते हैं या अनुशंसा करते हैं ? कदापि नहीं । हिंदीभाषी कब परमार्थी बनेगें । हिंदी से कब परमारथ सिद्ध होगा ? कुछ तो देखते ही देखते इतने अमीर बन जाते हैं कि आर्थिक मदद के लिए पता ढूंढने लगते हैं । वे भूल जाते हैं कि ऐसी आवाज़ों या लेखन का उद्देश्य केवल आर्थिक मदद नहीं बल्कि ऐसी विडम्बनाओं के प्रति रचनात्मक स्तर पर समाज का ध्यान आकृष्ट करना होता है जिसकी ही जरूररत डांगी को थी । यह विचारों का तदर्थवाद है । कि चलो अभी तो यह समस्या निपटे । ब्लॉगरों का विशुद्धतः मन हिंदी का मन होता तो समस्या की जड़ पर जाता । समस्य़ा की मीमांसा करता । निष्कर्ष देता समाज को - ताकि भविष्य में फिर कोई जगदीप डांगी जैसा संत्रास झेलने को विवश न हो । मुझे नहीं लगता कि किसी हिंदी ब्लॉगर ने उसकी प्रतिभा के सम्मान के लिए ऐसा कुछ किया हो जिससे श्री डांगी का सॉफ्टवेयर कोई उनकी तासीर में खरीदने को आगे आया हो । खैर..... ये 30-35 भी कम नहीं हैं । इनके लिए साधुवाद ।
हिंदी चिट्ठों की शासकीय मान्यता- मैं इस व़क्त हिदीं सेवी पत्रकार और टेक्नोक्रेट बालेन्दु दाधीच का नाम लेने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ जिनके व्यक्तिगत कौशल और प्रयास से पहली बार हिंदी ब्लॉगिंग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शासकीय मान्यता मिली । वह भी भारत जैसे महादेश के विदेश मंत्रालय की वेबसाइट में । यह मात्र सरकार की जागरुकता नहीं बल्कि यह उनकी (बालेन्दु जी की )असरकारी उद्यमिता की निशानी है । क्या उनकी तारीफ़ नहीं होनी चाहिए ! मुदित होना चाहिए । कम से कम उन ब्लॉगरों को जो हिंदी को वैश्विक बनाने के लिए स्वप्न देखा करते हैं, जिनसे संपूर्ण हिंदी समाज की अपेक्षा बनी हुई है । कदाचित् यह पहली बार हुआ है जब हिंदी के चिट्ठों को किसी सरकार द्नारा शीर्षस्थ माना गया है । बहुत ही दुख होता है कि ऐसे प्रयासों को केवल सूचनात्मक स्तर पर लिया गया। 100 करोड़ की आबादी वाले देश में, भले ही वहाँ केवल 5-6 सौ चिट्ठाकार सक्रिय हैं, एक भी अनुशंसात्मक टिप्पणी किसी ब्लॉग मैं न आ पाना संकेत है इस तथ्य का कि अभी हिंदी का चिट्टाकार आत्ममुग्धता के दौर से निकल ही नहीं सका है । सभी की पीठ में जैसे खुजली मची है और सभी एक दूसरे को खुजलाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री में विश्वास करते हैं । कभी-कभी तो लगता है यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी विधा के रचनाकार आपस में कुनबा गढ़कर एक दूसरे की अनुशंसा को साहित्य सेवा मान बैठते हैं । भारतीय मीडिया ने भी उसे बहुत हल्के ढंग से लिया है । किसी भी अखबार में इसका जिक्र नहीं दिखाई दिया । अजीब आत्मक्रेंद्रित दौर है हिंदी वालों के यहाँ । हो-हल्ला नहीं मचता पर ऐतिहासिक कार्यों का स्वागत तो जरूर हो सकता था चिट्ठाकारों द्वारा... जो किसी निहायत निरर्थक प्रसंग पर कई दिन चर्चा कर गुजार देते हैं ।
इस शुष्कता और उदासीनता का जिक्र मैं इसलिए करना चाहता हूँ कि यदि यह केवल सरकारी अफ़सरों द्वारा तैयार वेबसाइट होता तो तरह-तरह के प्रश्न खड़े किये जाते । नोट-शीट चलती रहती । और कदाचित् तर्कों के कुहांसे में ये हिंदी चिट्ठे यहाँ समादृत नहीं हो पाते । हिंदी चिट्ठों के लिए यह केवल एक लिंक नहीं है । यह चिट्ठाकारों के लिए एक सौगात है । एक रिकोगनाइजेशन भी है । वह इसलिए कि यहाँ भले ही विष्णु प्रभाकर, नामवर सिंह, विनोद कुमार शुक्ल आदि-आदि का उल्लेख नहीं है पर हिंदी के नौसिखिए लेखन-कर्ताओं के कार्यों की चर्चा तो की गई है ना ! हो सकता है कि कुछ चिट्ठाकारों को मुगालते में यह उपकार जैसा नज़र न आये पर चार साल के भीतर जिस तरह से विदेश मंत्रालय यानी कि भारत सरकार ने हिंदी चिट्ठों को उदारता पूर्वक तव्वजो दी है वह वैधानिक मान्यता और विधागत मान्यता जैसी घटना भी है । और इस रूप में यह ऐतिहासिक भी है । ऐतिहासिक इसलिए भी कि इन्हीं में से उभरकर आने वाले चिट्ठों से हिंदी का मूल चरित्र और प्रभामंडल विश्व-पटल तक पहुँचेगा । यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि यहाँ उद्धृत कई चिट्ठे ऐसे भी है जिन्हें पढ़कर हिदीं भाषा पर रोना भी आ सकता है । हिंदी भाषा की अस्मिता पर प्रश्नचिन्ह भी उठ सकता है कि यदि यही हिंदी है तो इस भाषा में क्योंकर विश्वभाषा की क्षमता और योग्यता होगी । यह भारत सरकार की उदघोषणा भी है - चिट्ठाकारी के पक्ष में । जिसका अर्थ यह भी है कि हिंदी को विश्व भर में फैलाने हमारे चिट्ठेकार कमर कस चुके हैं । भले ही वहाँ शिशु स्वर ही सुनाई देता है पर लगातार सयाना होने की कोशिश भी है । व | ||||||||||