लिखना,
लिखे को
संपादित करना और जब चाहे उसकी प्रति छाप कर निकाल लेना
–
कितना
आसान हो
गया था। उसके बाद सीडॅक का जिस्ट आया,
जिसमें
भारत की कई भाषाओं में
कम्प्यूटर पर काम किया जा सकता था। परंतु उसके उपयोग
हेतु एक अलग से हार्डवेयर
कार्ड लगाना होता था जो बहुत मंहगा था,
और मेरे
जैसे आम उपयोक्ताओं की पहुँच से
बाहर था। शीघ्र ही विंडोज का पदार्पण हुआ और उसके साथ
ही विंडोज आधारित तमाम तरह के
अनुप्रयोगों में हिन्दी में काम करने के लिए ढेरों
शार्टकट्स उपलब्ध हो गए और मेरे
सहित तमाम लोग प्रसन्नतापूर्वक कम्प्यूटरों में हिन्दी
में काम करने लगे।
इसी अवधि में मैंने विंडोज पर हिन्दी में काम करने के
लिए उपलब्ध प्राय: सभी
प्रकार के औज़ारों को आजमाया। मैंने मुफ़्त उपलब्ध
शुषा फ़ॉन्ट को आजमाया,
परंतु
उसमें हिन्दी के एक अक्षर को लिखने के लिए जरूरत से
ज्यादा (दो या तीन) कुंजियाँ
दबानी पड़ती हैं। मैंने लीप आजमाया,
परंतु
हिन्दी की पोर्टेबिलिटी लीप तक ही सीमित
थी और विंडोज के दूसरे अनुप्रयोगों में इसके लिखे को
काट-चिपका कर उपयोग नहीं हो
सकता था। ऊपर से,
लीप से
लिखे गए दस्तावेज़ों को अगर आप किसी दूसरे के पास
भेजते
थे,
तो वह
तभी उसे पढ़ पाता था,
जब उसके
पास भी लीप संस्थापित हो। इसी वजह से यह
लोकप्रिय नहीं हो पाया। इन्हीं वज़हों से मैंने कभी भी
श्रीलिपि का भी उपयोग नहीं
किया। कम्प्यूटर पर हिन्दी लेखन के लिए मैं कृतिदेव
फ़ॉन्ट पर निर्भर था,
जो मूलत:
अंग्रेजी (ऑस्की) फ़ॉन्ट ही है,
परंतु
उसका रूप हिन्दी के अक्षरों जैसा बना दिया
गया था। कृतिदेव अब भी डीटीपी के लिए अत्यंत लोकप्रिय
फ़ॉन्ट है,
परंतु
अन्य
दस्तावेज़ों में इसका उपयोग सीमित है।
यह समय डॉट कॉम की दुनिया के फैलाव का था
और हर कोई इंटरनेट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में
लगा हुआ था। हिन्दी अखबार नई
दुनिया ने अपने अख़बार को इंटरनेट पर लाकर इसकी शुरूआत
कर दी थी। धीरे से प्राय:
सभी मुख्य हिन्दी अख़बार इंटरनेट पर उतर आए। परंतु इन
अख़बारों में उपयोग किए जा
रहे फ़ॉन्ट अलग-अलग ,
एक दूसरे
से भिन्न हैं। एक अख़बार का लिखा उसी अख़बार के
फ़ॉन्ट से ही पढ़ा जा सकता है। डायनॉमिक फ़ॉन्ट से कुछ
समस्याओं को दूर करने की
कोशिशें की गईं,
मगर वे
सिर्फ इंटरनेट एक्सप्लोरर तक सीमित रहीं। अन्य
ब्राउज़रों
में यह
काम नहीं आया। इससे परिस्थितियाँ पेचीदा होती गईं,
चूँकि एक
आम कम्प्यूटर
उपयोक्ता
से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वह किसी खास साइट
को पढ़ने के लिए खास
तरह के
फ़ॉन्ट को पहले डाउनलोड करे फिर संस्थापित भी करे।
इन्हीं कारणों से मैंने
इंटरनेट
पर अपने हिन्दी साहित्य को प्रकाशित करने के लिए अपनी
व्यक्तिगत साइट
पीडीएफ़
फ़ॉर्मेट में बनाकर प्रकाशित की ताकि पाठकों को फ़ॉन्ट
की समस्या से मुक्ति
मिले।
परंतु इसमें भी झमेला यह था कि जब तक उपयोक्ता के
कम्प्यूटर पर एक्रोबेट रीडर (या
पीडीएफ़ प्रदर्शक) संस्थापित नहीं हो,
वह इसे
भी नहीं पढ़ पाता था। ऊपर से
पीडीएफ़ फ़ाइलें बहुत बड़ी होती हैं,
और
इन्हें पढ़ने के लिए पहले इसे कम्प्यूटर पर
डाउनलोड करना होता है। अत: इंटरनेट पर समय अधिक लगता
है।
इस तरह से हिन्दी के लिए बेहतर समर्थन की मेरी खोज
जारी ही रही। ऐसे ही किसी
अच्छे दिन जब मैं इंटरनेट पर हिन्दी साइटों की खोज कर
रहा था,
तो
इंटरनेट पर सैर के
दौरान
अचानक इंडलिनक्स से टकरा गया। उसमें यह दिया गया था कि
कैसे,
यूनिकोड
हिन्दी
फ़ॉन्ट
के जरिए न सिर्फ हिन्दी फ़ॉन्ट की समस्या का समाधान हो
सकता है,
बल्कि
हिन्दी भाषा में लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम का सपना भी
साकार हो सकता है। वे स्वयंसेवी
अनुवादकों की तलाश में थे। इंडलिनक्स डॉट ऑर्ग की
संस्थापना व्यंकटेश (वेंकी)
हरिहरण तथा प्रकाश आडवाणी द्वारा की गई थी और उसमें
जी। करूणाकर को-ऑर्डिनेटर सह
तकनीकी विशेषज्ञ के रूप में कार्य कर रहे थे।
इंडलिनक्स कोई व्यवसायिक संस्था नहीं
थी,
बल्कि
स्वयंसेवी व्यक्तियों के सहयोग से ओपन सोर्स माहौल में
कार्य करने के लिए
प्रतिबद्ध थी। मुझे लगा कि यूनिकोड हिन्दी द्वारा आज
नहीं तो कल,
हिन्दी
फ़ॉन्ट की
समस्याओं
का समाधान संभव है। यूनिकोड हिन्दी को विंडोज का
समर्थन भी था और बाद में
गूगल में भी यूनिकोड हिन्दी समर्थन उपलब्ध हो गया। मैं
तुरंत ही इंडलिनक्स में एक
स्वयंसेवी सदस्य –
हिन्दी अनुवादक के रूप में शामिल हो गया।
शुरूआती समस्याएँ:
जब मैं इंडलिनक्स में स्वयंसेवी अनुवादक के रूप
में शामिल हुआ तो उस वक्त लिनक्स में सिर्फ ग्नोम
डेस्कटॉप पर यूनिकोड हिन्दी
समर्थन उपलब्ध था। लगभग 4-5हजार
वाक्यांशों का अनुवाद मुख्यत: भोपाल के अनुराग सीठा
तथा स्वयं जी। करूणाकर द्वारा किया गया था,
जो उस
वक्त तकनीकी समस्याओं,
यथा उचित
फ़ॉन्ट रेंडरिंग इत्यादि से भी जूझ रहे थे। हमें कुल
20
हजार
वाक्याँशों का अनुवाद
करना था,
और कम से
कम उसका 80
प्रतिशत
अनुवाद तो आवश्यक था ही ताकि हिन्दी भाषा का
समर्थन ग्नोम लिनक्स पर हासिल हो सके। उन दिनों मैं
म।प्र।विद्युत मण्डल में
अभियंता के रूप में कार्यरत था। कार्य और घर परिवार के
बाद बचे खाली समय में मैं
अनुवाद का कार्य करता और इस प्रकार प्रत्येक माह लगभग
एक हजार वाक्याँशों का अनुवाद
कर रहा था। उस समय तक मैं हिन्दी में कृतिदेव फ़ॉन्ट
का अभ्यस्त हो चुका था,
और
यूनिकोड हिन्दी फ़ॉन्ट का इनस्क्रिप्ट कुंजी पट,
कृतिदेव
के कुंजी पट से बिलकुल अलग
था। उस वक्त हिन्दी कुंजीपट को मैप कर बदलने के औजार
भी नहीं थे। अत: यूनिकोड में
हिन्दी अनुवादों के लिए मुझे एक नए हिन्दी कुंजीपट
–
इनस्क्रिप्ट को शून्य से सीखना
पड़ा,
जो कि
कृतिदेव से पूरी तरह भिन्न था,
और जिसे
मैं इस्तेमाल करता था। छ: महीने
तो मुझे अपने दिमाग से कृतिदेव हिन्दी को निकालने में
लगे और लगभग इतना ही समय
इनस्क्रिप्ट हिन्दी में महारत हासिल करने में लग गए।
शुरूआती चरणों में हमारे पास कोई हिन्दी आईटी
टर्मिनलॉजी नहीं थी। ऑन-लाइन /
पीसी आधारित शब्दकोश भी नहीं थे,
जिसके
कारण हमारा कार्य अधिक उबाऊ,
थका देने
वाला
हुआ करता
था। अनुवादों में संगति की समस्याएँ थीं। उदाहरण के
लिए,
अंग्रेज़ी के Save
शब्द के
लिए संचित करें,
सुरक्षित
करें,
बचाएँ,
सहेजें
इत्यादि का उपयोग
अलग-अलग
अनुवादकों ने अपने हिसाब से कर रखे थे। फ़ाइल के लिए
फाईल,
सूचिका,
संचिका
और कहीं कहीं रेती का उपयोग किया गया था। इस दौरान
हिन्दी भाषा के प्रति लगाव रखने
वाले लोग इंडलिनक्स में बड़े उत्साह से स्वयंसेवी
अनुवादकों के रूप में आते,
दर्जन
दो दर्जन वाक्यों-वाक्याँशों का अनुवाद करते,
अपने किए
गए कार्य का हल्ला मचाते और
जब उन्हें पता चलता कि अनुवाद - असीमित,
उबाऊ,
थकाऊ,
ग्लैमरविहीन,
मुद्राहीन,
थैंकलेस
कार्य है,
तो वे
उसी तेज़ी से ग़ायब हो जाते जिस तेज़ी और उत्साह से वे
आते
थे। कुल
मिलाकर हिन्दी ऑपरेटिंग सिस्टम का सपना साकार करने के
लिए मेरे अलावा जी।
करूणाकर
ही लगातार और निष्ठापूर्वक कार्य कर रहे थे। हमारे
हाथों में मात्र कुछ
हजार
वाक्यांशों के अनुवाद थे,
जिस वजह
से हम किसी को हिन्दी में ऑपरेटिंग सिस्टम
कार्य करता हुआ नहीं दिखा सकते थे। फिर,
जो माल
हमारे पास था,
वह बहुत
ही कच्चा था,
निहायत
असुंदर था और काम के लायक नहीं था। इंडलिनक्स कछुए की
रफ़्तार से चल रहा था,
सिर्फ एक
व्यक्ति- जी। करुणाकर के समर्पित कार्यों से जो तकनीकी
पहलुओं को तो देख
ही रहे
थे,
मेरे
जैसे स्वयंसेवी अनुवादकों को (हिन्दी के इतर अन्य
भारतीय भाषाओं के
भी)
अनुवाद कार्य के लिए आवश्यक तकनीक सिखाने-पढ़ाने का
कार्य भी करते थे और इस बीच
समय मिलने पर अनुवाद कार्य भी करते थे।
अंतत: पहिया घूम ही गया:
सन् 2003
में
इंडलिनक्स की
गतिविधियों में कुछ तेजी आई। इसी वर्ष मैंने नौकरी से
स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति
प्रमुखत:
अपनी अस्वस्थता की वजह से ली और बच्चों को घर पर
कम्प्यूटर पढ़ाने लगा।
मैंने
अनुवाद का मासिक दर लगभग 2000
वाक्याँश
कर दिया था। अंतत: हमारे पास ग्नोम 2।2/2।4
के
60-70%
वाक्यांश
अनूदित हो चुके थे। करूणाकर ने फरवरी 03
में
लिनक्स का
प्रथम
हिन्दी संस्थापक इंडलिनक्स संस्करण मिलन 0।37
जारी कर
दिया था। इस संस्करण की
लोगों
में अच्छी प्रतिक्रिया रही। लोगों ने इसे अपने मौजूदा
अंग्रेजी लिनक्स के ऊपर
संस्थापित कर पहली मर्तबा हिन्दी में ऑपरेटिंग सिस्टम
के माहौल को देखा। इंडलिनक्स
के प्रयासों की हर तरफ सराहना तो हो ही रही थी,
अब लोगों
ने इसकी तरफ ध्यान देना भी
शुरू किया। इस दौरान,
सराय के
रविकान्त ने एक महत्वपूर्ण योगदान हिन्दी लिनक्स को
दिया। उन्होंने सराय,
दिल्ली
में एक हिन्दी लिनक्स वर्कशॉप का आयोजन किया जिसमें
साहित्य,
संस्कृति
और मीडिया कर्मी सभी ने मिल बैठ कर हिन्दी अनुवाद में
अशुद्धियों
को दूर
करने का गंभीर प्रयास किया,
जिसके
नतीजे बहुत ही अच्छे रहे। बाद में सराय से
ही हिन्दी अनुवादों के लिए साठ हजार रुपयों की एक
परियोजना भी स्वीकृत की गई जिसके
फलस्वरूप मैं सारा समय अनुवाद कार्य में जुट गया।
रविकान्त,
सराय की
पहल के नतीजे तेज़ी से आने लगे। दिसम्बर 03
आते आते
केडीई 3।2
में
पूर्ण हिन्दी समर्थन प्राप्त हो चुका था अत: मैंने
उसका अनुवाद हाथ में लिया।
अप्रैल आते आते केडीई 3।2
के
जीयूआई शाखाओं का 90+%
अनुवाद
कार्य मैंने पूरा कर
लिया था।
इस अनुवाद को चूंकि सराय द्वारा प्रायोजित किया गया था,
अत:
रविकान्त की
पहल पर
इसकी समीक्षा वर्कशॉप फिर से आयोजित की गई। इस वर्कशॉप
में पहले से अधिक लोग
शामिल
हुए और सबने वास्तविक कार्य माहौल में हिन्दी अनुवादों
को देखा और सुधार के
सुझाव
दिए। इसके नतीज़े और भी ज्यादा अच्छे रहे। अनुवाद के
50
हजार
वाक्याँश तथा
समीक्षा
उपरांत 20
हजार
वाक्यांशों के सुधार कार्य के उपरांत केडीई डेस्कटॉप
इतना
अच्छा
लगने लगा कि बहुतों ने अपने कम्प्यूटर का अंग्रेजी
माहौल हटाकर हिन्दी में कर
लिए जिसमें होमी भाभा साइंस सेंटर मुम्बई के डॉ।
नागार्जुन भी शामिल हैं। इसकी
प्रशंसा पूर्वक घोषणा उन्होंने भारतीय भाषा सम्मेलन
में मुम्बई में की थी।
एक बार फिर,
सराय ने
एक अतिरिक्त परियोजना स्वीकृत की जिसके तहत केडीई
3।3/3।4
के हेड
शाखाओं के कुल 1।1
लाख
वाक्यांशों के 90%
हिन्दी
अनुवाद का कार्य मेरे
द्वारा
पूरा किया गया। इस बीच एक्सएफ़सीई 4।2,
गेम,
डेबियन
संस्थापक,
पीसीक्वेस्ट 2005
संस्थापक इत्यादि के अनुवाद कार्यों का कार्य भी किया
गया।
नतीजतन,
अब हमारे
पास रेडहेट फेदोरा तथा एन्टरप्राइज़ संस्करण,
मेनड्रेक,
डेबियन,
पीसीक्वेस्ट लिनक्स 2005
इत्यादि
प्राय: सभी लिनक्स वितरणों में हिन्दी
पूर्ण समर्थित है। इंडलिनक्स का बहुभाषी,
रंगोली
जीवंत सीडी भी जारी किया जा चुका
है जिसमें हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के वातावरण
में लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम
है। लिनक्स के आकाश पर हिन्दी अब दमक रहा है।
अंतत: अब मैं बिना किसी फ़ॉन्ट समस्या के,
विभिन्न
अनुप्रयोगों में हिन्दी में
तो काम कर ही सकता हूँ,
मेरे
हिन्दी के कार्य विश्व के किसी भी कोने में इंटरनेट पर
यूनिकोड सक्षम ब्राउजर द्वारा देखे जा सकते हैं,
तथा
यूनिकोड सक्षम अनुप्रयोग
द्वारा उपयोग में लिए जा सकते हैं। अब मेरा यूनिकोड
हिन्दी आधारित व्यक्तिगत ब्लॉग (http://www।hindini।com/ravi
) तो चल
ही रहा है,
यूनिकोड
हिन्दी आधारित सैकड़ों
अन्य
हिन्दी साइटें भी अस्तित्व में आई हैं। धन्यवाद
यूनिकोड,
और
धन्यवाद
इंडलिनक्स।