दक्षिण एशिया में लोकतंत्र की धरातलीय स्थिति?
तनवीर जाफ़री
संसदीय
लोकतांत्रिक व्यवस्था को नि:संदेह शासन चलाने की सबसे
उत्तम एवं कारगर
व्यवस्था के
रूप
में स्वीकार किया जाता है। लोकतंत्र अथवा जनतंत्र
दरअसल केवल एक शासन प्रणाली मात्र न होकर एक ऐसा जीवन
दर्शन भी है जोकि समाज में समानता,
स्वतंत्रता,
सहिष्णुता, शांति,
प्रेम व सद्भाव का संदेश भी देता है।
इस प्रणाली के अन्तर्गत जनता अपना शासन अथवा शासक
स्वयं चुनती है। तभी तो लोकतंत्र को दूसरे शब्दों में
जनता द्वारा, जनता के लिए,
जनता के शासन के रूप में भी परिभाषित
किया जाता है। लोकतंत्र अथवा जनतंत्र का शब्द
लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा लोकतांत्रिक राज्य दोनों के
लिए प्रयुक्त किया जाता है।
लोकतंत्र शब्द का प्रयोग हालांकि आमतौर पर राजनैतिक संदर्भ में ही किया जाता है परन्तु इसके सिद्धान्त अन्य समूहों व संगठनों के लिए भी संगत हैं। यह सत्य है कि साधारणतः लोकतंत्र विभिन्न सिद्धान्तों के मिश्रण से बनते हैं परन्तु मतदान को लोकतंत्र की अधिकांश क़िस्मों का चरित्रगत लक्षण स्वीकार किया जाता है। लोकतंत्र अथवा जनतंत्र को हम तीन अलग-अलग भागों में देख सकते हैं। प्रथम प्रतिनिधि लोकतंत्र, दूसरा उदार लोकतंत्र तथा तीसरा प्रत्यक्ष लोकतंत्र।
प्रतिनिधि लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था का नाम है जिसमें सरकारी अधिकारियों को जनता द्वारा सीधे तौर पर चुना जाता है। इसमें लोक प्रतिनिधि किसी ंजिले अथवा संसदीय क्षेत्र से चुने जाते हैं या कई समानुपातिक व्यवस्थाओं में सभी मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रतिनिधि लोकतांत्रिक शासन प्रणाली चलाने वाले कुछ देशों में मिश्रित व्यवस्था प्रयोग में लाई जाती है। हालांकि इस प्रकार के लोकतंत्र में प्रतिनिधि जनता द्वारा ही निर्वाचित किए जाते हैं। परन्तु जनता के हित में कार्य करने की नीतियों का निर्धारण स्वयं निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा ही किया जाता है।
उदार लोकतंत्र इसी प्रकार की शासन प्रणाली का एक और उत्तम तरीक़ा है। उदार लोकतंत्र एक प्रकार का ऐसा प्रतिनिधि लोकतंत्र है जिसमें स्वच्छ एवं निष्पक्ष चुनाव कराए जाने की व्यवस्था होती है। इसके चरित्रगत् लक्षणों में राज्य में रहने वाले अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, कानून व्यवस्था बनाए रखना, शक्तियों का वितरण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, भाषा, धर्म, सभा व सम्पत्ति आदि की आजादी वग़ैरह प्रमुख हैं। जबकि प्रत्यक्ष लोकतंत्र उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का नाम है जिसमें राज्य के सभी नागरिक समस्त महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों पर सीधे तौर पर स्वयं मतदान में हिस्सा लेते हैं। इसे प्रत्यक्ष मतदान भी कहा जाता है क्योंकि सैद्धान्तिक रूप से इसमें कोई प्रतिनिधि या मध्यस्थ नहीं होता। साधारणतः ऐसे प्रत्यक्ष लोकतंत्र छोटे समुदायों अथवा नगर राष्ट्रों में होते हैं।
दुनिया में लोकतांत्रिक व्यवस्था पर जब भी बहस छिड़ती है तो दक्षिण एशिया में लोकतांत्रिक व्यवस्था सर्वप्रथम चर्चा का विषय बनती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि दक्षिण एशियाई देश के रूप में भारत ही विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश माना जाता है। ज़ाहिर है जब बात भारतीय लोकतंत्र की हो तो भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान व बंगलादेश आदि देशों की शासन व्यवस्था पर भी नजर डालना जरूरी हो जाता है। स्वतंत्रता के 6 दशकों के दौरान भारत ने संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनेकों चेहरे देखे। इनमें जहाँ निष्पक्ष रूप से होने वाले चुनाव, अभिव्यक्ति की आजादी, धार्मिक स्वतंत्रता आदि लोकतंत्र के वास्तविक प्रतीकों की प्रखरता नजर आई वहीं इन्हीं 6 दशकों में दुर्भाग्यपूर्ण रूप से कुछ ऐसे हादसे भी घटित हुए हैं जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को हिलाकर रख दिया। देश में फैलती साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद तथा भाषावाद, गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगे, 6 दिसंबर 1992 की अयोध्या घटना, कश्मीर से अल्पसंख्यकों का पलायन, अनेकों बार कई राज्यों में जनता द्वारा निर्वाचित सरकारों को भंग कर राष्ट्रपति शासन लगाया जाना, राजनीति के क्षेत्र में परिवारवाद का फैलता जाल, अपराधियों व बाहुबलियों का राजनीति पर कसता शिकंजा, भ्रष्टाचार की गहरी होती जड़ें आदि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ऐसा बदनुमा दाग हैं जिन्हें देखकर विशेषकों द्वारा अब यह सोचा जाने लगा है कि दक्षिण एशियाई देशों में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली वास्तव में कारगर है भी या नहीं?
गत दिनों रेडियो वॉइस ऑंफ अमेरिका द्वारा इसी विषय को लेकर एक चर्चा आयोजित की गई थी। इस चर्चा में भाग ले रहीं राज्यसभा की पूर्व उपसभापति नजमा हैपतुल्ला ने मेरी उपरोक्त चिंताओं के उत्तर में यह फरमाया कि भारत में परिवारवाद भी कम हुआ है। अपनी इस बात के समर्थन में उन्होंने उत्तर प्रदेश के ताजा चुनावों के परिणामों का हवाला दिया। उन्होंने भारत में साम्प्रदायिकता व जातिवाद में भी कमी आने की बात कही। जबकि हकीकत में मेरे विचार से ऐसा नहीं है। भारत की राजनीति में न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि क्षेत्रीय दलों में भी परिवारवाद अभी भी सिर चढ़कर बोल रहा है। साम्प्रदायिकता व जातिवाद फैलाने वाले नेता सत्ता में बैठे हैं तथा अपने गुप्त नापाक मिशन में सत्ता का पूरी तरह दुरुपयोग कर रहे हैं। कई जगहों पर अभिव्यक्ति का गला घोंटने का भी समाचार प्राप्त होता रहता है। और तो और नजमा हैपतुल्ला ने स्वयं अपना पूरा जीवन एक परिवार विशेष का गुणगान करने में बिता दिया तथा वे स्वयं भी एक बड़े राजनैतिक परिवार का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके अतिरिक्त चूंकि देश का बहुसंख्य मतदाता अशिक्षित है इसलिए उसके मत बड़ी आसानी से या तो पैसों से खरीद लिए जाते हैं अथवा जाति धर्म का वास्ता देकर अपने पक्ष में मतदान करा लिया जाता है। कहीं बाहुबलियों द्वारा डरा धमकाकर इनसे अपने पक्ष में मतदान कराया जाता है तो कहीं फतवा जैसे तथाकथित धार्मिक दिशा निर्देशों के चक्कर में फँसकर यह सीधे-सादे अशिक्षित मतदाता अपने मतों का सदुपयोग करने के बजाए इनका दुरुपयोग कर बैठते हैं। क्या ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था को एक स्वच्छ व निष्पक्ष सफल लोकतांत्रिक प्रणाली कहा जा सकता है?
दक्षिण एशिया का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण देश पाकिस्तान भी भारत जैसी ही सभी विडम्बनाओं का शिकार है। पाकिस्तान में तो सेना को भी यह अधिकार प्राप्त है कि वह जब चाहे तब लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई जन प्रतिनिधि सरकार को अपदस्थ कर स्वयं सत्ता पर कब्जा जमा सकती है। कहा जा सकता है कि पाकिस्तान के अलग राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा सैन्य शासन लगभग समान रूप से अमल में रहा है। यहाँ भी परिवारवाद की बेल को फलते-फूलते, साम्प्रदायिकता व जातिवाद पर आधारित खतरनांक दंगे फसाद, आतंकवादी गिरोहों के फलने-फूलने में शासकीय संरक्षण, भुखमरी के दौर से गुज़र ने के बावजूद सैन्य सामग्री के भंडारण में गहन दिलचस्पी, कट्टरवाद के बढ़ते हाथ, अभिव्यक्ति का गला घोंटना आदि सब कुछ विस्तार से देखा जा सकता है।
बंगलादेश जोकि अपनी आंजादी के 38वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है का भी कमोबेश यही हाल है। कहने को तो यह भी लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है। परन्तु पाकिस्तानी लोकतंत्र की तरह बंगलादेश में भी उसके अस्तित्व में आने से लेकर अब तक काफी बड़ा समय सैनिक शासन के रूप में गुजरा है। राजनीति में परिवारवाद के हावी होने के लक्षण वहाँ भी साफ देखे जा सकते हैं। भारत व पकिस्तान की तरह ही बंगलादेश में भी साम्प्रदायिकता व जातिवाद निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। साम्प्रदायिक संगठन तथा सम्प्रदाय आधारित आतंकवादी संगठन बेखौफ़ सिर उठा रहे हैं तथा निरन्तर मजबूत भी होते जा रहे हैं। एक बार फिर सेना द्वारा बंगलादेश की सत्ता पर गहरी नज़र रखी जा रही है। गरीबी व भुखमरी से जूझ रहे इस बंगलादेश में नोबल पुरस्कार विजेता प्रोफैसर मोहम्मद युनुस ने जब बंगलादेश की राजनीति में सक्रिय होने का एक सही व भावनात्मक निर्णय लिया तो चंद दिनों के भीतर ही उन्हें ऐसी मायूसी हाथ लगी कि वे राजनीति में सक्रिय होने के अपने निर्णय से पीछे हट गए। आखिर लोकतंत्र जैसी सर्व स्वीकार्य व्यवस्था में उस महान अर्थशास्त्री को ऐसा क्या नकारात्मक नज़र आया कि उन्होंने अपने कदम मात्र तीन महीनों के भीतर ही पीछे हटा लिए? आज वहाँ आपातकाल की स्थिति लागू है। बंगलादेश में जन प्रतिनिधियों द्वारा सरकार का संचालन नहीं किया जा रहा है। बजाए इसके इन जन प्रतिनिधियों को देश छोड़कर चले जाने या देश के बाहर ही बने रहने का निर्देश दिया गया है। क्या यही है एक स्वच्छ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लक्षण?
दरअसल लोकतंत्र के किसी एक अंग को स्वयं सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शित करना हरगिज़ मुनासिब नहीं होता। इस व्यवस्था में धरातल पर यह नज़र आना चाहिए कि आम जनता द्वारा, आम जनता के लिए, आम जनता की सरकार चुनी गई है। यह भी स्पष्ट रूप से नज़र आना चाहिए कि इस व्यवस्था में सबको बराबर न्याय मिल रहा है। धर्म व अभिव्यक्ति आदि का प्रयोग रचनात्मक व सकारात्मक होना चाहिए। नकारात्मक व विध्वंसात्मक हरगिज़ नहीं। अल्पसंख्यकों को सुरक्षा के वातावरण में रहना चाहिए, दहशत व आतंक के साए में कतई नहीं। अपराधियों व बाहुबलियों का इस व्यवस्था में कोई स्थान हरगिज़ नहीं होना चाहिए। जातिवाद व साम्प्रदायिकता जैसे नासूर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अपना प्रभाव हरगिज़ न छोड़ें, इस बात का भी पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि एक सच्चे लोकतंत्र में इन बातों का ध्यान रखा जाता है तभी इस व्यवस्था को एक वास्तविक लोकतांत्रिक व्यवस्था कहा जा सकता है अन्यथा नि:सन्देह न सिर्फ़ भारत में बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था रखने वाले समस्त दक्षिण एशियाई देशों में इस विषय पर पुर्नविचार की गहन आवश्यकता है।
