ई-पताः srijjangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 14, जुलाई 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

   पुस्तकायन

 

एक समकालीन आध्यात्मिक तलाश


लाल्टू

 

"त्थर हो जाएगी नदी" नव्यतम पीढ़ी के कवि मोहन राणा का पाँचवाँ कविता संग्रह है, हिन्दी कविता में ताजगी का नया मुहावरा लेकर आए मोहन राणा की नवीनतम कविताएँ पाठक पर उनकी पिछली कविताओं जैसा ही प्रभाव छोड़ती हैं, एक ऐसे समय में जब युवा कवियों ने रूप और कथ्य के पुराने विवाद से हटकर संवेदना के धरातल पर कविता को जमीन दी, मोहन राणा अपनी पीढ़ी के प्रतिनिधि कवि बनकर सामने आए हैं।

 

  इस संग्रह में कुल 31 कविताएँ हैं  हर कविता में कवि ने शब्दों को परिपक्वता के साथ सजाया है।  समकालीन रचना-संसार में यह संग्रह एक अनूठा उदाहरण है जहाँ एक भी शब्द बेवजह नजर नहीं आता, ये कविताएं कई अर्थों में  अपने समय का प्रतिनिधित्व करती हैं, वैश्वीकरण के इस काल

 पत्थर हो जाएगी नदी

 (कविता संग्रह)

कवि

मोहन राणा

 

 

प्रकाशक

सूर्यास्त्र प्रकाशन

नई दिल्ली

मूल्य

45 रुपये

 संस्करण

2007

में अगर बौद्धिक स्तर पर कोई सार्वभौमिक हुई है, वह मानव संत्रास की भावना का सार्वभौमिक स्वरूप है।  अपने आप को पहचानने और समझने की लगातार कोशिश में हर कोई हर जगह उलझा हुआ है, यह संकट देश काल से परे सर्व-व्याप्त है।  कवि स्वयं ग्रह का सार्वभौमिक निवासी है, यूरोप के भिन्न देशों में वह भ्रमण करता है और हर जगह अपने अतीत को तलाशता है, सार्वभौमिक अस्मिता के बनने और जड़ों से बिछुड़ने की तकलीफ के बीच मानव-मानव के सम्बंधों के बनने और मजबूत बनाने का संघर्ष कविता का धर्म है, मोहन की इन कविताओं में मानव और प्रकृति के अनंत रहस्यों में से गुजरते हुए हम इसी भटकन, इसी तकलीफ और इसी संघर्ष से रूबरू होते हैं, इसलिए यहाँ हर बात निजी दायरे की है, पर कुछ भी निजी दायरे में सिमटा नहीं है - यह विरोधाभास कवि के समय की व्यथा है, यहाँ प्रेम सघन है, जिसमें खिड़की और जंगल जैसे शास्त्रीय तत्व हैं, पर 'इस वृत्तांत में' 'साथ-साथ न' चलने का संत्रास है, यह संत्रास व्यापक है और बार-बार मुखर होता है - "उतरते हुए मुखौटों को/ छनती हुई रोशनी रोशनी के आर-पार/ जो पहुँच जाती है मेरी जड़ों में भी"  देखता हुआ कवि चीखता है - "क्यों चला आया मैं यहाँ/अकेले ही/जो नहीं था उसे/ ले आया यहाँ" गौरतलब है कि 'यहाँ' कहीं भी हो सकता है, वह 'लिज़बन की गीली सड़कों पर' से लेकर ' कई बरस पहले अपने स्कूल' में कहीं भी हो सकता है, कवि सचेत हैं कि उसके रचना-संसार में जो कुछ वह है, उसके होने का समाजशास्त्र, स्वतः कविता में आए, इसलिए 'अंत में' वह 'अपने को सुनना' बंद  कर देता है और  "बिना किताबों के / बिना उपदेशों के/ बिना ईश्वर के/ बस जानना"  शुरू करता है, इस प्रक्रिया में वह 'सार्वभौमिक और चिरंतन क्रंदन को अक्षरों में रूपांतरित करता है।

 

  ये कविताएं एक अर्थ में नाजुक कविताएँ हैं, 'नाजुक से तात्पर्य यहाँ किसी कमजोरी से नहीं, पर एक ऐसी संवेदना से हैं जो हृदय में बेचैनी पैदा करती हैं, कविताओं को पढ़ते हुए आँखें भर आती हैं, एक - एक पंक्ति पढ़ बंद आँखों और भरपूर अहसास के बाद दुबारा पढ़ने की कोशिश करनी पड़ती हैं, जो रूकती नहीं और आगे पढ़ते रहने को तत्पर रहती है।

 

ये कविताएँ प्रेम की पुर्नप्रतिष्ठा में भी अपनी पीढ़ी की पहचान बनाती हैं, प्रेम की 'भूल-भुलैया' में 'अधजागा मैं बढ़ाता हाथ और फिर "दूर होता जाता भूल-भुलैया में/ फिर  वहीं अपने संशय के साथ"  जैसे दार्शनिक विलाप के साथ कवि भरोसा दिलाता हैं-

"गिर पड़ो अगर तुम/ नहीं छोड़ूँगा मैं तुम्हें अकेला/ बेचैनी के अंतराल में..."

प्रेम की यातना "चलती रही तुम्हारी बैचैनी/मेरे भीतर/टूटती आवाज़ समुंदर के सीत्कार में/..."

 

  प्रवास और लगातार भ्रमण से उपजी तकलीफ भी इन कविताओं में व्याप्त है, ऐसी मनस्थिति को हम इन शब्दों में पाते हैं - " यह हवा का जहाज/ यात्रा/...मूँद लो अपनी आँखें तुम एक पल /यह आवाज तुम्हारे मन में/ जिसका नहीं कोई चेहरा/"। सारी दुनिया घूमने पर भी कुछ छूटगया जैसी अनुभूति और अकेलेपन का संत्रास हमें नहीं छोड़ता।  इसलिए कोई अनुभव अधूरा उसे नाम दे कर कहता हुआ पूरा यह जिया कहने भर के लिए"  और "डूबते और सूरज बीच/ दौड़ता किसी किनारे को छूने/ घूम कर पहुँचता वहीं" जैसे शब्द इन कविताओं में अक्सर आते हैं।

 

   इस संग्रह की कविताओं में मोहन के पिछले संग्रहों की तुलना में परिपक्वता है, कला और कथ्य दोनों पैमाने में ये बेजोड़ हैं, कवि का प्रभास संपूर्णतः कविता-कर्म पर केंद्रित है, सरल सुबोध शैली की ये कविताएँ हर वर्ग के पाठक को प्रभावित करेंगी।  अंतर्जाल और उपभोक्तावादी संस्कृति के इस युग में जब पठनीयता का प्रश्न जरूरी बन ग चुका है, ये कविताएँ आशा जगाती हैं और कविता के भविष्य के बारे में हमें आश्वस्त करती हैं, अपने भीतर कुछ छूने की कोशिश में मोहन हर के भीतर कुछ छू रहे हैं और उनका यह प्रयास निश्छल और अनुपम है।

 

  समय के संकट की चेतना ने मोहन को कविता के बारे में गंभीर में किया है, "तुम्हारा कभी कोई नाम  न था" शीर्षक कविता में "क्या तुम लिखती ना थी कविताएँ कभी / पूछता उससे/जैसे कुछ याद आ जाए उसे " कहते हुए एक तरह से वे लेखक -पाठक समूह को झकोरते हैं।  कविता के प्रति गहरा विश्वास उनके मन में है, वे कहते हैं "कि एक हाथ बढ़ा कहीं से / जैसे मेरी ओर आतंक से भीगे पहर में/कविता का स्पर्श/ मैं जागा दुस्वप्न से/..."

 

कुल मिलाकर इन कविताओं में जीवन का गान मुखर है , "मैं चिड़िया हूँ या पतंग/या दोनों ही हूँ एक साथ" में सुबहो-शाम रमे होने की घोषणा है,   ये कविताएँ अपने समय की आध्यात्मिक तलाश का दर्पण हैं।

 

संग्रह पेपरबैक में है, आवरण छायाचित्र कविताओं के मिजाज और संग्रह के शीर्षक से मेल खाता है, पॉकेटबुक आकार और सुंदर विन्यास में पुस्तक छपी है, सूर्यास्त्र प्रकाशन ऐसी सुंदर पुस्तक प्रकाशित करने के लिए बधाई का पात्र है।

  

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google
WWW http://www.srijangatha.com