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वर्ष- 2, अंक - 14, जुलाई 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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   लंदन की डायरी

 

लंदन में हिंदी पत्रकारिता


राकेश बी. दुबे

 

प्रि‍य पाठको,

      जून, 2007 के अंक में आपके समक्ष न आ पा सकने के लि‍ए क्षमाप्रार्थी हूं । हि‍न्‍दी भाषा की व्‍याप्‍ति‍ और प्रभाव के बारे में अनेक सुधी वि‍द्वानों द्वारा पहले ही कही जा चुकी बातों को दोहराना नहीं चाहता क्‍योंकि‍ आप जैसे जागरुक और सचेत पाठक इस बारे में अद्यतन होंगे ही, ऐसा वि‍श्‍वास है ।

 

मैं आपके सामने कुछ ऐसे पक्ष लाने का प्रयास करुँगा जो सम्‍भवत: अल्‍प चर्चित रहे हैं ।

 

      अपने पहले स्‍तम्‍भ में मैंने लन्‍दन के सार्वजनि‍क स्‍थलों पर हि‍न्‍दी की प्रति‍ष्‍ठा के संबंध में कुछ सूचनाएं दी थीं । इसी श्रंखला को आगे बढ़ाता हूँ ।

 

राकेश बी. दुबे

 

स्तम्भकार भारतीय उच्चायोग, लदन में अताशे, हिंदी और संस्कृति, अताशे के रूप में कार्यरत हैं। वे ब्रिटन में न केवल शासकीय तौर पर अपितु आत्मीय ढंग से हिंदी और हिंदी की संस्कृति के उन्नयन के लिए सक्रिय हैं । उत्तरप्रदेश के एटावा जिले में जन्में श्री दुबे की प्राचीन भारत के इति‍हास पर एक पुस्‍तक प्रकाशि‍त है और एक अनूदि‍त पुस्‍तक पॉलीप्रोपि‍लि‍न के उपयोग, लाभ एवं हानि‍यों पर पढ़िए ब्रिटेन में विकासमान हिंदी की सरस पड़ताल करता उनका नियमित आलेख

अभी हाल ही में भारत से लन्‍दन उच्‍चायोग में आए हमारे साथी और पड़ोसी श्री एन चारी को हृदयरोग के उपचार के लि‍ए लन्‍दन के वेलिंग्‍टन अस्‍पताल में भर्ती होना पड़ा । उनके परि‍वार के सदस्‍यों के साथ मैं भी अस्‍पताल के वि‍जि‍टर लाउंज में बैठा हुआ हूं । व्‍हील चेयर पर एक अरब युवक सॉफ्ट ड्रिंक मशीन से कोक लेकर वि‍जि‍टर लाउंज में ही रुक जाता है । एक बुर्काधारी महि‍ला भी उसके पास ही रुक जाती है और सामान्‍य से ज्‍यादा स्‍वस्‍थ एक दूसरा युवक उससे अरबी लहज़े में कुछ बात करता हैं । व्‍हील चेयर वाले युवक की आवाज सामान्‍य नहीं है और जबाब में जब वह बोलता है तो एक अज़ीब तरह की ध्‍वनि‍ उसके गले से नि‍कलती है....आं...आं...ओं....ओं जैसी । बात भी बहुत घसीटकर पूरी कर पाता है । उनकी तरफ बहुत ध्‍यान देकर देखने की आवश्‍यकता ही नहीं थी और यहां तो क़ायदा ही कुछ ऐसा है कि‍ कि‍सी को भी आप बार बार देखें तो असभ्‍यता मानी जाती है और उनकी प्राइवेसी में बाधा भी । इसलि‍ए बस एक दो बार देखकर मैं कमलेश्‍वर के कहानी संग्रह मांस का दरि‍या में डूब जाता हूं । चारी साहब की बेटी अभी पूछकर आई है कि‍ अभी ऑपरेशन चल रहा है । चि‍न्‍ता तो नहीं लेकि‍न एक तनाव भरी खामोशी में सभी बैठे हुए हैं कि‍ अचानक लता मंगेश्‍कर की सदाबहार आवाज ..... हमने देखी है उन आंखों की महकती खुशबू ...हाथ से छूके इसे रि‍श्‍तों का इल्‍जाम न दो.... । मैं चौंककर सि‍र उठाता हूं । लता जी यहां कहां । चारी जी के परि‍वार के कि‍सी सदस्‍य को तो ऐसे तनाव भरे माहौल में गाना सुनने की नहीं सूझेगी । फि‍र कौन । आवाज आ रही है व्‍हील चेयर पर बैठे अरब युवक के मोबाइल से । लगता है उसने स्‍पीकर खोल रखा है । सि‍र्फ अहसास है ये रुह से महसूस करो .... प्‍यार को प्‍यार ही रहने दो कोई नाम न दो... । ये तो अरब हैं .... हि‍न्‍दी गाना क्‍या समझते होंगे ।

 

      तब बड़े जोर से यह अहसास हुआ कि‍ हि‍न्‍दी फि‍ल्‍मों ने कि‍तना बड़ा काम कि‍या है हि‍न्‍दी को दुनि‍यां भर में ले जाने का । यह काम कोई भी संस्‍था नहीं कर पाई है अभी तक और न ही कर पाएगी । हि‍न्‍दी फि‍ल्‍में उन अरब देशों में भी देखी जाती हैं जहां भारतीय आबादी नाममात्र को है और आश्‍चर्य की बात है कि‍ इजरायल जैसे देश में भी हि‍न्‍दी फिल्‍मों के गाने आप सुन सकते हैं । ब्रि‍टेन की तो बात ही छोड़ दीजि‍ए क्‍योंकि‍ यहां तो रहते हैं 15 लाख भारतीय और भारत से बाहर हि‍न्‍दी फि‍ल्‍मों की कमाई का प्रमुख स्‍थान है ब्रि‍टेन ।

 

फि‍ल्‍मों के अति‍रि‍क्‍त जि‍स एक अन्‍य माध्‍यम पर हमारा ध्‍यान जाता है वह है समाचार माध्‍यमों का । एक समय था जब सुरेन्‍द्र प्रताप सिंह ने दूरदर्शन के लि‍ए आधा घंटे का समाचार कार्यक्रम शुरु कि‍या था: आज तक । पता ही नहीं चलता था कब आधा घंटा पूरा हो गया । खि‍चड़ी दाढ़ी और चश्‍मे के पीछे से झांकती चमकती आँखों का जादू तब टूटता था जब वे कहते थे .... ये थी ख़बरें आज तक .... इन्‍तज़ार कीजि‍ए कल तक... । और सच में ही हम इन्‍तजार करते थे कल का ... आज तक को देखने सुनने के लि‍ए ।

 

      ऐसा ही इन्‍तजार रहता होगा ब्रि‍टेन वासि‍यों को श्री नरेश अरोड़ा की पत्रि‍का चेतना का । साठ के दशक में उन्‍होंने तीन साल तक इस पत्रि‍का का प्रकाशन कि‍या । प्रवासि‍नी भी प्रकाशि‍त हुई, चली, फि‍र बन्‍द हो गई,  उन्‍हीं कारणों से जि‍न कारणों से दि‍नमान, सारि‍का, धर्मयुग बन्‍द हुए होंगे । फि‍र आया अमरदीप, सन् 1971 में । सम्‍पादक, प्रकाशक, स्‍वामी सभी कुछ श्री जगदीश मि‍त्र कौशल । लगातार 32 वर्षों तक वे इस साप्‍ताहि‍क पत्र को चलाते रहे । बहुत सहयोग मि‍ला उन्‍हें हि‍न्‍दी प्रेमि‍यों का, मन्‍दि‍रों का, संस्‍थाओं का । लेकि‍न धीरे धीरे वे अकेले पड़ते गए और सन् 2003 में यह हि‍न्‍दी साप्‍ताहि‍क बन्‍द हो गया । अमरदीप और श्री जगदीश मि‍त्र कौशल को भारतीय उच्‍चायोग की ओर से हि‍न्‍दी पत्रकारि‍ता के लि‍ए वर्ष 2007 के  वि‍श्‍व हि‍न्‍दी दि‍वस पर आचार्य महावीर प्रसाद द्वि‍वेदी यू के हि‍न्‍दी पत्रकारि‍ता सम्‍मान से सम्‍मानि‍त कि‍या गया ।

 

 एक अन्‍य हि‍न्‍दी साप्‍ताहि‍क जि‍सकी चर्चा शायद ही कहीं होती हो और जो अमरदीप के प्रकाशन से पहले अर्थात् 1970 से छप रहा है वह है नवीन वीकली । इसके सम्‍पादक हैं श्री रमेश सोनी । हि‍न्‍दी क्षेत्र में इसकी चर्चा सम्‍भवत: इसलि‍ए अधि‍क नहीं हुई कि‍ इसका उर्दू संस्‍करण भी इसी के साथ प्रकाशि‍त होता है मि‍लाप वीकली के नाम से और वह भी सन् 1965 से । अभी भी ये दोनों संस्‍करण हर सप्‍ताह प्रकाशि‍त होते हैं और इस प्रकार आज की तारीख में नवीन वीकली हि‍न्‍दी का सबसे पुराना साप्‍ताहि‍क समाचार पत्र है ब्रि‍टेन का ।

 

नवीन वीकली तो हि‍न्‍दी और उर्दू में ही एक साथ प्रकाशि‍त होता है लेकि‍न एक अनूठा प्रयोग कि‍या गया पि‍छले वर्ष अर्थात् सि‍तम्‍बर, 2006 में । एक नया साप्‍ताहि‍क समाचार पत्र जो अंग्रेजी, पंजाबी और हि‍न्‍दी, तीनों में एक साथ प्रकाशि‍त कि‍या जाता है । सबसे आश्‍चर्य की बात है कि‍ यह समाचार पत्र बि‍ल्‍कुल मुफ्त है । साप्‍ताहि‍क का नाम है : परदेश वीकली और इसके सम्‍पादक है श्री जसकरण सिंह । तीन तीन भाषाओं में प्रकाशि‍त यह समाचार पत्र नई ऊंचाइयां छुएगा, ऐसी आशा है ।

 

ये सभी प्रयास कि‍ए प्रवासी भारतीयों ने, कुछ अपनी भाषा एवं संस्‍कृति‍ के प्रति‍ लगाव के कारण और कुछ अपनी रचनात्‍मक प्रति‍भा के सदुपयोग के लि‍ए । आर्थि‍क रुप से हो सकता है कि‍ ये उपक्रम इतने सफल न रहे हों । लेकि‍न भारत तेजी से आर्थि‍क प्रगति‍ की सीढ़ि‍यां चढ़ रहा है और उससे भी तेजी से प्रवासी भारतीय भी । यहाँ मैं लक्ष्‍मी मि‍त्‍तल, अनुराग दीक्षि‍त, हिन्‍दुजा बंधुओं या फि‍र लार्ड स्‍वराज पॉल जैसे उद्योगपति‍यों की चर्चा नहीं करुंगा, बल्‍ि‍क कि‍सी और संदर्भ में चर्चा करुंगा लार्ड करन बि‍लि‍मोरि‍या की ।

 

2006 से लन्‍दन में दो समाचार पत्र प्रकाशि‍त कि‍ए जा रहे हैं, जो वैसे तो सांध्‍य दैनि‍क कहे जा सकते हैं लेकि‍न वास्‍तव में वे पूरे अखबार हैं और दूसरे अखबारों से अलग केवल इसी अर्थ में हैं कि‍ उनका वि‍तरण, दोपहर के बाद, हजारों स्‍थानों पर खड़े एजेंटों द्वारा कि‍या जाता है बि‍ल्‍कुल मुफ्त । ये हैं : लन्‍डन लाइट और दि लन्‍डन पेपर । मुफ्त वि‍तरण संभवत: इसलि‍ए करना पड़ा क्‍योंकि‍ सुबह के समय एक दूसरा अखबार मुफ्त मि‍लता है । नाम है मेट्रो । आप सोच रहे होंगे कि‍ मैं इन मुफ्त अखबारों का वि‍ज्ञापन क्‍यों कर रहा हूं तो इसका उत्तर बड़ा ही खुशग़वार है । भारत भवन से शाम को घर लौटते हुए, चैरिंग क्रॉस स्‍टेशन तक पैदल आते हैं हम लगभग 10 लोग । रास्‍ते में जगह जगह खड़े ये एजेन्‍ट हाथों में कोई न कोई अखबार पकड़ा कर ही दम लेते हैं । इन एजेन्‍टों में से कुछ भारतीय दि‍खते हैं तो स्‍वाभावि‍क रुप से ही उन्‍हें नि‍राश न करके हम लोग कम से कम एक नहीं तो दोनों ही अखबार ले लेते हैं। कभी कभी जल्‍दी में होते हैं तो नहीं भी लेते हैं । ट्रेन छूटने का डर रहता है । एक दि‍न देखता हूँ कि‍ डि‍ब्‍बे में सामने बैठे हमारे पड़ोसी दि‍ लन्‍डन पेपर पढ़ रहे है, पढ़ क्‍या रहे हैं बल्‍ि‍क चक्षुशोधन कर रहे हैं । अचानक पृष्‍ठ पलटते हैं तो मुझे ऐसा लगता है जैसे अखबार अंग्रेजी की बजाए हि‍न्‍दी में छपा हो । सावन के अन्धे को हरा ही हरा सूझता है, यह सोचकर मैं सकुचा गया और अखबार से नि‍गाह हटाकर वापस रवीन्‍द्र कालि‍या के गली कूचे में गड़ा ली। लेकि‍न मन नहीं माना और फि‍र देखा उसी तरफ तो इस बार सन्‍देह की कोई गुंजाइश नहीं थी । लॉर्ड करन बि‍लि‍मोरि‍या मुस्‍करा रहे थे कोबरा बि‍यर के गि‍लास के सामने बैठे और मोटे टाइप में शीर्षक था : किंग कोबरा । मैंने लगभग झपटते हुए उनसे अखबार लि‍या और देखने लगा ।

 

अरे यह तो वास्‍तव में हि‍न्‍दी में छपा था : आप भी देखि‍ए । बहुत प्‍यार आया किंग कोबरा पर, लॉर्ड बि‍लि‍मोरि‍या पर और क्‍वीन हि‍न्‍दी पर।

 

 

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  संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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