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वर्ष- 2, अंक - 14, जुलाई 2007

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    प्रवासी-कविता

 

खोया मुसाफिर

 

बहुत खुश हूँ फिर भी न जाने क्यूँ

ऑखों में एक नमीं सी लगे

मेरी हसरतों के महल के नीचे

खिसकती जमीं सी लगे

 

सब कुछ तो पा लिया मैने

फिर भी एक कमी सी लगे

मेरे दिल के आइने पर

यादों की कुछ धूल जमीं सी लगे

 

जिंदा हूँ यह एहसास तो है फिर भी

अपनी धडकन कुछ थमीं सी लगे

खुद से नाराज होता हूँ जब भी

जिंदगी मुझे अजनबी सी लगे

 

कुछ चिराग जलाने होंगे दिन मे

सूरज की रोशनी अब कुछ कम सी लगे

चलो उस पार चलते हैं

जहॉ की हवा कुछ अपनी सी लगे

 

 

 समीर लाल

जन्म-29 जुलाई, 1963

पिता-श्री पी.के.लाल 

शिक्षा-चार्टड एकाउंटेट

42, सत्यानंद विहार, रामपुर, जबलपुर, मध्यप्रदेश छोड़कर कनाड़ा में विगत 7 वर्षों से रह रहे हैं। अब तक विभिन्न वेब पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। ई-कविता और अनुभूति याहू ग्रुप के सक्रिय सदस्य। इधर हिंदी में चिट्ठाकारी में साधनारत। उड़नतश्तरी नामक निजी चिट्ठा के लेखक ।

 

संपर्कः

३६, ग्रीन हाफ़ ड्राइव, एजेक्स, ओंटारियो, कनाडा-एल एस एन (L1S 7N7)

 -मेल

sameer.lal@gmail.com  

टेलीफोन--९०५-४२६-२०८५



कविताएः

1.सुनामीः भगवान से सवाल 2. बेबस वतन

3. गीत ख़ुशी के 4.  खोया मुसाफ़िर

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