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वर्ष- 2, अंक - 14, जूलाई 2007

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   कहानी

जापानी कथा

चीचीन और खागे ओकुरी


आमान खीमीको

 

चाचान को खागे ओकूरी सिखाने वाले बाबूजी थे । जंग में जाने से एक दिन पहले बाबूजी सपरिवार पूर्वजों के क़ब्रिस्तान को गये । वापसी में बाबूजी नीले आसमान की ओर देख बोले- खागे ओकूरी के लिए अच्छा दिन है ।

खागे ओकूरी ? वह क्या ? भैया पूछा बैठा ।

हाँ, बताओ न, क्या है ? छोटी बहन चीचीन ने भी उत्सुकता दिखाई ।

ज़मीन पर परछाई को देखते हुए दस गिनना पड़ता है । दस होते ही ऊपर आसमान की ओर देखें तो ज़मीन की परछाई आसमान में नज़र आती है । इसी को खागे ओकूरी कहते हैं । - बाबूजी ने समझाया ।

मैं या माँ जब तुम्हारी उम्र के थे तो ख़ूब इस खेल का आनंद उठाते थे ।

चलो न, अबी करती हैं । - माँ ने सुझाव  दिया ।

बच्चों को बीच में खड़ा करके चारों ने एक दूसरे का हाथ थामा ।

पलकें न झपकाना माँ ने बच्चों से कहा ।

नहीं झपकाएंगे बच्चों ने वादा किया ।

एक, दो, तीन बाबूजी ने गिनना शुरु किया ।

चार, पाँच, छह माँ ने गिनती आगे बढ़ाई ।

सात, आठ, नौ भैया और चीचान ने जोड़ा

दस ।

 

आँखों को उठाते ही चार सफे़द परछाइयाँ आसमान की तरफ़ उड़ते हुए स्थानांतरित नज़र आईं ।

वाह, क्या बात है- भैया आश्चर्य से मुग्ध था ।

जादू ! चीचान भी विस्मित थी ।

यादगार फो़टो है यह आज की बाबूजी बोले ।

बहुत सुंदर यादगार फ़ोटो है, माँ ने स्वीकार किया ।

गले ही दीन बाबूजी उभरते सूरज वाली पताका को लहराते हुए, युद्ध की पोशाक में, ट्रेन में बैठ कहीं दूर चले गये ।

कमज़ोर बाबूजी को भी आख़िर जाना पड़ा । युद्ध किसी को बख़्शता नहीं । छिः...., धीमी आवाज़ में प्रकाशित माँ की चिंता जीचान के कानों को भी साफ़ सुनाई  पड़ी ।

 

बाबूजी के जाने के बाद चीचान भैया के साथ हर रोज़ 'खागे ओकूरी' खेला करती थी । कभी दोनों हाथ उठाए बान्ज़ाई का पोज़ खागे ओकूरी खेला करती थी । कभी दोनों हाथ उठाए बान्ज़ाई  का पोज़, तो कभी एक हाथ उठाए, पैर फैला के कमर मटका के.....तरह-तरह की परछाइयाँ आसमान तक पहुँचाई ।

युद्ध की स्थिति गंभीर होती गई और खागे ओकूरी का खेल असंभव-सा होता गया । उस छोटे से शहर में भी शत्रु के हवाईजहाज़ मंडराने लगे । ऐसा ही हुआ । खुला नीला अंबर मौजमस्ती का नहीं, बल्कि बहुत डरावनी जगह में परिवर्तित हो चुका था ।

 

गर्मी के महीने की एक रात चीचान की आँख शत्रु के हवाई आक्रमण के साइरेन की आवाज़ से खुली ।

जल्दी करो- माँ कह रही थी ।

बाहर आग ही आग का दृश्य था । चीख़ना-चिल्लाना, भाग दौड़ । हवा उस रात तेज़ थी ।

आग इधर फैली रही है । नदी की ओर चलो।

हवा गरम होती गयी । चारों ओर आग का तांडव नृत्य ।

 

माँ चीचान को गोदी में लिये दौड़ रही थी कि अचानक भैया गिर पड़ा । पैर से खू़न बह रहा था । चोट गहरी थी । माँ ने उसे पीठ पे लिया और चीचान को साथ दौड़ने को कहा । पर उस भीड़-बाड़ में चीचान माँ से अलग हो गयी ।

माँ, माँ वह चीख़ती रही ।

माँ बाद में आएँगी, तुम हमारे साथ चलो किसी अनजान व्यक्ति ने चीचान को बाहों में उठा दूर सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया । अँधेरे पुल के नीचे बहुत लोग आश्रय लिये थे । चीचान की माँ जैसी किसी को देख पुकार उठी।

ओह मिल गयी क्या ? अच्छा हुआ । भगवान् बड़े दयालु हैं यह कहते हुए अनजान अंकल ने चीचान को नीचे उतारा । पर वह महिला माँ न थी । उदास मन चीचान उस रात सिसकती रही । सुबह हुई । रातों-रात शहर मानो बदल ही चुका था । जल के राख़ हो चुका था । काले धुएँ की चादर नज़र आता था सब ।

 

-अरे ! मेरा घर कहाँ है ?

-अरे चीचान

चीचान को आवाज़ पहचानी-सी लगी । मुड़ के देखा तो पड़ोस की आँटी थी ।

-बेटा माँ कहीँ है ? और भैया ?

-मैं घर को ही लौट रही हूँ । तुम आओगी ?

आँटी ने इस प्रस्ताव से चीचान को सांत्वना मिली । परंतु घर आग का शिकार बन चुका था ।

-माँ, भैया आएँगे न यहाँ ?

चीचान ने प्रश्न का उत्तर सिर हिलाके हाँ में जवाब  दिया ।

-ठीक है । तो फिर मैं अपने घर जाऊँ ? आँटी ने पूछा, चीचान ने एक बार फिर सिर हिलाया ।

उस रात चीचान ने थोड़ी-सी चावल की मठरी खाई और टूटे हुए बंकर में सोई ।

-माँ और भैया ज़रुर लौट आएँगे ।

 

सूर्योदय हुआ । दोपहर में भी बादल घिरे रहे । सूर्यास्त हुआ । उस अँधेरी रात चीचान ने फिर चावल की मठरी का  सेवन किया और बंकर में ही सोई । सूर्य की किरणों ने जब उसके गाल चूमे तब जाके चीचान ने आँखें खोली ।

-कितनी कड़क धूप है ।

प्यास भी काफ़ी लगी थी ।  सूरज तेज़ चमक रहा था । तभी,

-खागे ओकूरी के लिए अच्छा दिन है बाबूजी की आवाज़ गूँजी ।

-चलो न, अभी करते हैं माँ की आवाज़ ।

चीचान सँभलते हुए खड़ी हुई और परछाई को देख गिनना शुरु किया ।

-एक, दो, तीन

चार, पाँच, छह बाबूजी की आवाज़  ।

सात, आठ, नौ माँ की आवाज़ ।

भैया का हँसना ।

-दस ।

चीचान ने ऊपर देखा तो आसमान में चार सफे़द परछाईयाँ थी । चीचान ने बाबूजी, माँ और भैया को आवाज़ लगायी । उस क्षण चीचान को ऐसा अनुभव हुआ कि आसमान ने उसे अपने में मिला लिया हो । आसमान का वह अनोखा दृश्य । चीचान ने अपने आपको आसमानी रंग के बगीचे में पाया । चारों और नीचे आसमानी फूल खिले हुए थे । यह शायद स्वर्ग होगा । हां याद आया । कुछ खाया नहीं दो दिनों से, इसलिए हल्की होके उड़ आयी हूँ यहाँ तक तभी चीचान को बाबूजी, माँ और भैया दिखाई पड़े ।

ओह आप सब यहाँ थे, इसलिए नहीं आ रहे थे चीचान हँसते हुए सबसे मिलने को भागी ।

इस तरह गर्मी की उस सुबह एक छोटी-सी बच्ची आसमान में खो गयी ।

 

कई साल बीत चुके  हैं । उस शहर में नये घर बसे । जिस जगह चीचान ने अकेले खागे ओकूरी खेला था, वहाँ आज एक पार्क है । नीले आसमान के तले बच्चे आज भी खेलते हैं और उनकी खिलखिलाती हँसी गूँजती है ।

अनुवादः जनश्रुति चंद्रा

 

 

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