कई-कई अर्थोवाला ग्रीन चैनल
विश्वनाथ सचदेव
कोई
व्यक्ति विदेश से कुछ ऐसा सामन लेकर आता है जिस पर
नियमतः आयात कर लगना चाहिए, लेकिन वह कर न चुकाने के
लिए हवाई अड्डे पर ग्रीन चेनल से बाहर निकलना चाहता
है। कस्टम वालों की निगाह उस पर पड़ जाती है। उसकी
जाँच होती है । प्रमाणित हो जाता है कि वह बिना कर
चुकाए बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था। अदालत उसे दोषी
पाकर जुर्माना लगाती है। वह जुर्माना भरकर छूटता है ।
ऐसे किसी व्यक्ति को यदि अपराधी कहा जाए तो इसमें गलत
क्या है ?
एक और व्यक्ति अपने रसूख के बल पर गैरकानूनी तरीके से कुछ ज़मीन हथिया लेता है । वह ज़मीन खेती की है। इस ज़मीन के बल पर वह स्वयं को किसान सिद्ध करता है और इस प्रमाण के बल पर कोई ऐसी ज़मीन भी प्राप्त कर लेता है, जो नियमतः किसी किसान को ही मिल सकती है । इस कृत्य को अपराध कहा जाए तो इसमें गलत क्या है ?
और यदि अवैध तरीके से ग्रीन चैनल से माल निकालने वाला और गलत बयानी करके ज़मीन पाने वाला व्यक्ति समाज के ‘श्रीमंत’ तबके के हों तो क्या यह अपराध अधिक गंभीर नहीं हो जाता ? और क्या यदि इनमें से एक को इसलिए अपराधी न कहा जाए कि वह एक विशिष्ट भाषा-भाषी व्यक्ति है और दूसरे को समाज का प्रतिष्ठित नागरिक होने के नाते अपराध-मुक्त मान लिया जाए तो क्या एक सही मिसाल होगी ?
शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को शिकायत है कि ग्रीन चैनल से बाहर आने की कोशिश करने वाले के मामले को मीडिया क्यों उछाल रहा है। उनका वह भी कहना है कि अपने कौशल और योग्यता के बल पर ‘श्रीमंत’ बनने वाले ऐसे व्यक्ति के प्रति मराठी माणूस को अभिमान होना चाहिए होना चाहिए । इस तरह सोचने वाले बाल ठाकरे अकेले नहीं है। देश के कृषि मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार तक उनके भतीजे और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद के एक दावेदार अजीत पवार भी कुछ इसी तरह का सोच रखते हैं। उनका कहना है कि इस तरह का अपराध पहली बार तो हो नहीं रहा, फिर इतना हो-हल्ला क्यों ? बात सही भी है। सचमुच ऐसा पहली बार नहीं हो रहा। न जाने कितने लोग ग्रीन चैनल से गलत तरीके से निकल जाते हैं और न जाने कितने लोगों को पकड़ा भी जा चुका है। ऐसा करते हुए और न जाने कितनों ने दंड भी भरा होगा। जहाँ तक गलत तरीके से स्वयं को किसान साबित करने का सवाल है, तो यह भी हमारे देश में कोई पहली बार नहीं हो रहा। शायद ही कोई ऐसा राजीतिक दल होगा देश का, जिसमें ऐसे नेता न हों जो किसानी भी करते हैं-फिर भले ही उन्होंने कभी खेत देखा भी न हो ! फिर किसी अविनाश भोसले या अभिताभ बच्चन के मामले में ही मीडिया इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा है ? मैं किसी भोसलें या किसी बच्चन के समर्थन या विरोध में कुछ नहीं कहना चाहता, मैं सिर्फ इस बात को रेखांकित करना चाहता हूँ कि ऐसे विशिष्ट व्यक्ति, जो समाज में अपना विशिष्ट व्यक्ति, जो समाज में अपना विशिष्ट स्थान बना लेते हैं समाज का गौरव होते हैं और इन नाते उनके कंधों पर दायित्व का बोझ भी बढ़ जाता है । वे नायक होते हैं । समाज के जाने-अनजाने लोग उनका अनुसरण करते हैं । इसलिए उन्हें हर कदम फूँक-फूँककर रखना होता है-कहीं कोई गलती न हो जाए ।
ऐसे किसी मामले में मीडिया कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी दिखाता है तो उसका एक कारण यह भी होता है कि ऐसे व्यक्तियों में समाज को अपेक्षाएँ ज्यादा होती हैं । अपनी क्षमता से ‘बड़ा’ बनना बहुत अच्छी बात है, लेकिन यदि कोई अपने आचरण से इस ‘बड़ेपन’ को बनाए रखता है तो यह और भी अच्छी बात हो जाती है और जब कोई श्रीमंत ड्यूटी के कुछ पैसे बचाने के लिए ग्रीन चैनल से निकलना चाहता है तो यह काम उसके बड़प्पन को बौना बना देता है; जब कोई श्रीमंत खेती की ज़मीन खरीदने के लिए गलतबयानी का सहारा लेता है, तब उसका बड़प्पन भी बौना हो जाता है ।
लेकिन, ऐसे किसी गलता आचरण की वकालत करने वाले अथवा उसकी गंभीरता को कम आँकने वाले नेता कैसे उदाहरण पेश करते हैं ? क्यों जरुरी लगता है उन्हें ऐसे किसी व्यक्तित्व के बचाव में आना ? यह सवाल सिर्फ किसी भोसलें या किसी बच्चन तक ही सीमित नहीं है । इस सवाल का फलक बहुत व्यापक है । अपराध छोटा हो या बड़ा, व्यापक है । अपराध छोटा हो या बड़ा अपराध होता है । अपराध की सजा भी होती है, अपराध का प्रायश्चित भी होता है, लेकिन, दुर्भाग्य से, हमारे यहाँ सजा या प्रायश्चित के बजाय ‘बच निकलने की प्रवृत्ति’ ज्यादा दिखाई देती है। इसलिए किसी अपराध के बचाव में जब तर्क दिए जाने लगते हैं तो आश्चर्य से ज्यादा दुःख होता है । बचाव में दिए जाने वाले तर्कों से कहीं बेहतर है अपराध से बचना । उदारहण इस बचने का प्रस्तुत किया जाना चाहिए, बचाव का नहीं । यही अपेक्षित है, यही उचित भी ।
विश्वनाथ सचदेव
संपादक, नवनीत,
मुंबई, महाराष्ट्र
