जापान में हिंदी
डॉ. राज बुद्धिराजा
‘यूजि इचिहाशि साना’
‘उपस्थित’
इकुमि सान।
‘उपस्थिति’
‘यूको हिरायशि सान।’
‘उपस्थित।’
उपस्थित, उपस्थित और उपस्थित। तोक्यो विश्वविद्यालय के कक्ष में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति की श्रृंखला। यह एक विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय है यहाँ हिंदी विदेशी भाषा के रूप में पढ़ायी जाती है। चार वर्ष का स्नातकीय और छः वर्ष का स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम। जापानी और भारतीय प्रोफेसरों के सहयोग से हिंदी की यह यात्रा वर्णमाला से प्रारंभ होकर महादेवी वर्मा, डॉ. हरिवंशराय बच्चन और मोहन राकेश के साहित्य के अंतिम पड़ाव को छू लेती है।
“आप अध्यापक हैं और हम सब छात्र हैं।”
“यह क्या है ?”
“वह शब्ददोष ।” वाक्यों द्वारा अधयापक और छात्रों का परिचय प्रगाढ़ से प्रगाढोत्तर होता चला जाता है। पन्द्रह छात्र-छात्राओं का समूह है यह । विश्वप्रसिद्ध तोक्यो विश्वविद्यालय में प्रवेश पाना बहुत कठिन हैं जिनमें से पाँच सौ का चयन होता है और उनमें से पन्द्रह विद्यार्थी हिंदी विभाग में दाखिला लेते हैं । हिंदी के अतिरिक्त, संस्कृत, बंगला और उर्दू में से किसी एक भाषा का अध्ययन और भारत भ्रमण भी पाठ्यक्रम में सम्मिलित है। जापान में रहते समय लिखने-पढ़ने और भारत में रहकर इनका बोलने पर भी अधिकार हो जाता है।
“कहाँ गये वे चालीस-चालीस लोग ?”
“यह क्या हो रहा है ? सब अपनी अपनी कहते हैं।”
विश्वविद्यालय के प्रांगण में श्री विष्णु प्रभाकर के “टूटते परिवेश” का मंचन। भारत में बदलते मूल्य, टूटते परिवेश, परिवार, बेकार युवकों की मानसिकता को प्रस्तुत करने में व्यस्त, त्रस्त छात्र-छात्राएं और दर्शकों के रूप में प्रोफेसर, बुद्धिजीवी, लेखक और पत्रकार । जापान में भला कोई कैसे स्वीकार कर ले कि नौकरी के लिए अर्जियाँ लिखते फाड़ते-फेंकते जीवन का बहुमूल्य समय गुजर जाता है, नौकरी है कि मिलने का नाम नहीं लेती । दूसरे वर्ष के छात्र वार्षिक समारोह में भारतीय रसोई का पूरी, चावल, चाय, समोसा का स्वाद चखते-चखते अन्नपूर्णा में विद्यार्थियों के झुंड के झुंड। पढ़ने का यह कक्ष कुछ दिनों के लिए भोजनालय में परिवर्तित हो जाता है। वस्तुतः भाषा के माध्यम से ये छात्र भारतीय राजनीति, सामाजिक, सास्कृतिक ढांचे तक पहुँचना ही इनका प्रमुख उद्देश्य होता है।
आखिर क्यों विश्व से अलग-थलग रहने वाले जापान को यह आवश्यकता जा पड़ी कि विदेशी भाषा का अध्ययन अध्यापन किया जाए। बहुत समय तक लगातार दूसरों देशों से कटकर वह रह नहीं सकता था इसलिये नागासाकी के द्वार से पश्चिम की संस्कृति प्रविष्ट हुई और सैन्य-द्वार से भारतीय संस्कृति की। फ्रांस की तरह जापान में भी लेखकों, कवियों और बुद्धिजीवियों को सेना से जुड़े रहना पड़ता था।
बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि हिंदी के सुप्रसिद्ध विद्वान प्रोफेसर के. दोई किसी ज़माने में वर्मा की सेना में भरती थे। उन्होंने भारतीयों से हिंदी के कुछ शब्द सीखे, संस्कृति की जानकारी ली और युद्ध समाप्ति के बाद इस कदर भारतमय हो गये कि हिंदी और भारत को प्रतिष्ठित करने के लिये पूर्ण मनोयोग से जुट गए और हिंदी विभाग को शिखर तक पहुँचा दिया। हिंदी की प्रारंभिक स्थिति यह थी कि किसी भी प्रवासी भारतीय को आमंत्रित कर लिया जाता और साधारण कामचलाऊ बोलबाली, भाषा सीख ली जाती । आज स्थिति यह है कि अनुपलब्ध, दुर्लभ पांडुलिपियाँ पत्र-पत्रिकाएँ और हजारों दुर्लभ ग्रंथों का संग्रह करते प्रो. तोशियोतनाका काजुहिकि माचिदा।
भाषा के अतिरिक्त धर्म, इतिहास, संगीत और संस्कृति के प्रति भी छात्रों में गहरी रूचि होती है। कुछ मेहनती छात्र जापान के विदेश मंत्रालय में प्रवेश पा जाते हैं और दो वर्ष तक हिंदी का अध्ययन कर नयी दिल्ली स्थित राजदूतावास में सचिव के रूप में काम करने लगते हैं। श्री तागा, सातों ऐसे ही परिश्रमी व्यक्तित्व है।
इसी तरह ओसाका विश्वविद्यालय में भी हिंदी एक विभाग रूप में प्रतिष्ठत है। प्रो. कोगा और प्रो. मालवीय की हिंदी सेवा से कौन परिचित नहीं है। पाठ्यक्रम तैयार करते समय कैसेट, हस्तलिपि को महत्व दिया जाता है, विद्यार्थियों का योग्यता का आधार वर्ष भर का कार्य है, परीक्षा नहीं। इसलिये तोक्यो विश्वविद्यालय में परीक्षा की परम्परा नहीं है।
विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त हिंदी के विकास में रेडियो जापान का भी महत्वपूर्ण योगदान है। यहाँ से नियमित रूप से हिंदी प्रसारण होता है। भारत-पाकिस्तान के कवियों, लेखकों, साहित्यकारों और पत्रकारों से भेट-वार्ताएं ज्ञानवर्द्धक कार्यक्रमों में मानी जाती है । यहीं मेरी भेंट फैज अहमद फैज से होती है। इनकी दास्तां दिल्ली-कराँची के इदगिर्द घूमती रही है और ये भारत की यादों को हमेशा के लिये सहेज कर रखते हैं।
जनगण मन अधिनायक जय है भारत भाग्यविधाता।
असाकुसा के पास तीन चार जापानी युवक समवेत स्वर में गाते- नमस्कार करते निकल जाते हैं। हम लोग जापान का “किमिगायो” राष्ट्रगीत जानें या न जानें लेकिन भारत के बारे में जानकारी रखने वाला हर जापानी हमारे प्रसिद्ध गीतों को बखूबी जानता है।
रेडियो जापान के अतिरिक्त हिंदी फिल्में भी जापान में बहुत लेकप्रिय है। हिंदी सीखने वाले वर्ग विशेष में भी एक ऐसा वर्ग है जो फिल्मों के प्रति गहरा लगाव रखता है। हिंदी फिल्मों का जापानी अनुवाद वार्षिक समारोह रूप में छायांकन आम बात है। सिनेमा हॉल के बाहर लंबी-लंबी कतारें अवसर मिलने पर वीडियो पर भी फिल्मों देखने चली जाती हैं। आलथी-पालथी और भारतीय चाय की चुस्कियाँ। कुछ लोग वार्षिक फिल्मोत्सव का आनंद लेते हर वर्ष भारत आते हैं। इस माध्यम से सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ सागर पार पहुँच ही जाती है।
भारतीय राजनीति समाज-संस्कार अर्थव्यवस्था और हि्दी में गहरी रूचि रखने वाले प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तितत्व ही राजदूतावास में नियुक्ति पा सकते हैं। यही कारण है कि यहाँ का प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हमारे आस-पास हमसे ज्यादा दिलचस्पी लेता है। महामहिम राजदूत की पत्नी श्रीमती नोदा टीप-वर्ष पर पूजा साड़ी पहने द्वार पर रंगीली और हाथों पर मेंहदी रचाती है वे भारतीय आत्मीयता-आतिथ्य से प्रभावित है। चिड़ियों को दाना-चुगाते हाथ कुबेर से कम नहीं हैं। “लाइए में हाथ बटाती हूँ” यह पत्र पुष्प हैं, स्वीकार कीजिए कहकर आसपास को भी आत्मीयता से भर देती हैं।
जब हमारे नवयुवक हिंदी के नाम पर नाक भोंह सिकोडते हैं तो ऐमी आयोगी देवनागरी लिपि के प्रति बेहद आकर्षित है क्योंकि यह सुंदर और आकर्षक लिपि है । कोशिश करती है कि सड़कों-चौराहें पर लिखा सभी कुछ पढ़ डालें।
आर-पार आना जाना लगा ही रहता है । श्रीमती तबाता ने भारत में रहकर दो वर्ष हिंदी सीखी है, यदि मौका मिला तो फिर से हिंदी सीखेंगी । क्योंकि हिंदी सम्मानसूचक और मानवतापूर्ण भाषा है । श्रीमती सुगियामा और उनकी दो वर्षीया बेटी में होड़ लगी रहती है । बेटी है कि माँ को हरा देती है । हाथ जोड़ नमस्ते करती, और माँ की गलतियाँ निकालती है ।
श्रीमती साइगो जब नमस्कार करती अपनी बात हिंदी में समझाती है तो उनकी सहेलियाँ खुश हो जाती हैं । कामचलाऊ स्थिति से जा पहुँचती है संस्कृति की ओर । दिल्ली में हिंदी के अध्ययन, अध्यापन की बात करते समय श्रीमती इवासाकी को याद रखना बहुत जरुरी है उन्हें यह बताया गया कि भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेज़ी है यहाँ पहुँचने पर पता चला कि राष्ट्रभाषा हिंदी ही है । इसी भाषा के माध्यम से ये भारतीय परिवारों से जुड़ गयी है ।
मैसूर हिंदी प्रचार परिषद् के स्वर्ण जयन्ती समारोह के अवसर पर इन जापानी महिलाओं का उल्लेख करना मेरे लिए आवश्यक हो गया है । जापान के उच्चवर्ग को पृष्ठ भूमि में भारतीय अभिवादन आतिथ्य के संस्कार तो देने ही हैं। (अध्यापक के नाते) क्योंकि यह भाषा संस्कार पूर्ण है । धीरे-धीरे इस भाषा के संस्कार लुप्त होने लगे हैं, कौन-सी भाषा इन विदेशियों को सिखायी जाए ? वर्ष साल मास-महीना सप्ताह-हफ्ता में से कौन सा शब्द, कौन-सी हिंदी ? रेलवे प्लेटफार्मों, बाजारों फुटपाथों, गलियारों और पुस्तकालयों में बोली जाने वाली हिंदी का यह कौन-सा रुप ? ठीक है । कोशिश करने पर एकमानिक रुप सिखा भी दिया जाए तो हमारे यहाँ बोली जाने वाली खिचड़ी बोली का प्रभाव क्या होगा ? सेब को ‘एप्पल’ के माध्यम से पढ़ाना तो रोकना ही होगा । नहीं तो लज्जित होने की सीमा बहुत पीछे छूट जाएगी । यदि इसी प्रकार विदेशी शब्दों और अंग्रेज़ियत की घुसपैठ जारी रहेगी तो वह दिन दूर नहीं जब अपने ही घरों में अपने ही कान “नमस्कार” सुनने को तरसे जायेंगे । जाना तो सभी को स्टेशन ही है । चाहे “इसटेसन” कह लो या “सटेशन”, कहने से काम नहीं चलेगा । संस्कारगत भाषा के अभाव में कोई भी साहित्य ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह सकता । यदि हमें जीवित रहना है तो सबसे पहले भाषा को जीवित रखना होगा । कम से कम इस अवसर पर यह संकल्प तो कर ही लें । यदि पाँच नये शब्द रोज़ हम सीख लें और दो नये शब्द विदेशियों को सिखा दें तो हिंदी का शब्द कोष समृद्ध हो जाएगा ।
हमारे यहाँ के कुछ सरकारी और ग़ैर सरकारी प्रतिष्ठान हिन्दी के प्रचार-प्रसार में प्राणप्रण से जुटे हैं । हिंदी अकादमी, साहित्य अकादमी, साहित्य कला परिषद का हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है । अन्य कार्यक्रमों के अतिरिक्त विदेशी छात्र-छात्राओं के लिये यदि शब्दावलियाँ तैयार की जाएं तो सोने में सुहागा होगा । प्रारंभिक शिक्षण में करीब-करीब पाँच हजार शब्द आसानी से सिखाये जाते हैं उन्हें यदि पुस्तक बद्ध कर दिया जाये तो यह महत्वपूर्ण कार्य होगा । जाने-माने हस्ताक्षरों से यह ज्ञान यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हो सकता है । आज जबकि शिक्षण प्रणाली में परिवर्तन की गुंजाइश है । राष्ट्रभाषा को विदेशी अध्येताओं तक पहुँचने के लिए ऑडियो वीडियो भी तैयार कर लिए जाएं तो सोने में सुहागे का काम होगा।
डॉ. राज बुद्धिराजा
जी-233, प्रीत विहार, दिल्ली-110092
