हिंदी भाषा, शिक्षा और अनुशासन
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
(द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन की अन्तिम गोष्ठी में प्रातः स्मरणीय द्विवेदी जी का भाषण)
जब
दुष्यंत राजा शकुंतला को देखता है। कि बहुत सुन्दर,
कोमल, कमनीय मूर्ति शकुंतला पेड़ों को पानी से सींच
रही है। राजा का मन छटपटा उठता है, व्याकुल हो उठता है
कि कौन ऐसा पागल ऋषि है जिसने इस लड़की को, इतनी
सुकुमार लड़की को इस काम में लगा दिया है।
“इंद लिव्याजमनोहरं वपुस्तपःक्षमं साधयितुं य इच्छति।
धुवं सेनीलेत्पलपत्रधाराया शमीलता छेत्रुमृर्ष्व्यिवस्पति।”
इस कमनीय कांति, अव्याजमनोहर वपु, अव्याज मनोहर यानी उसके सौंदर्य को कहने के लिए कोई बहाना, कोई उपमा, अलंकार बगैरह की जरूरत नहीं, अव्याजमनोहर वपु, स्वयं स्वाभाविक, ये जो सौदंर्य है, इस सुकुमार बालिका को जो तपस्या कराने के योग्य बनाना चाहता है। वह ऋषि निश्चय ही कमल की पंखुड़ियों से शमी के पेड़ को काटना चाहता है। आप समझिए बबूल के पेड़ को काटें । यह वैसा ही प्रयोग है जैसे आग से खेत सींचना। लेकिन आपको एक तीसरे अनुशासन की बात सोचनी होती है, वह है जो कि भाषा के इन सब बंधनों से परे है जब कि कवि के शब्दों में जब छंद की भाषा आती है उसके पास तो सप्तस्वर के सप्त पंख लग जाते हैं और उसमें विशाल विपुल व्योम में उड़ने की शक्ति आ जाती है। वह नई ताकत है जो कि पद्य की भाषा में नहीं आती, वह छंद की भाषा में, राग की भाषा में आती है वह कवि का कार्य है, वहाँ पर उसको समझना पड़ता है, वहाँ प्रसंग समझना पड़ता है कि आखिर क्या बात है। दुष्यंत कोई ऐसा नासमझ आदमी तो था नहीं, ऐसी बात क्यों कहता है ? तब वहाँ समझ में आता है कि एक और भी व्यवस्था है जो कि साहित्य जगत की व्यवस्था है और उसकी हम उपेक्षा नहीं करते हैं।
सर्वप्रथम शिक्षण के लिए सबसे बड़ी बात यह है कि अध्यापक अच्छा हो । शिक्षक के हृदय में प्रेम हो इस देश में आपने बहुत परिश्रम किया। अधिकांश ऐसे लोग नहीं थे जो किसी प्रकार से प्रशिक्षित शिक्षक कहे जा सकते हों, ट्रेंड टीचर नहीं था लेकिन अपार प्रेम और उत्साह था उनके भीतर। जिसके भीतर अपार प्रेम और अपार उत्साह न हो, बच्चों के साथ जिसका हृदय बच्चा न बन जाए, वह अध्यापक क्या सिखाएगा। अध्ययन-अध्यापन की सबसे पहली शर्त है कि हृदय में अपार प्रेम हो तुलसीदासजी ने इस प्रसंग में बड़ी मजोदार बात कही है। तुलसीदासजी बालक थे और सौभाग्य से नरहरिदास उनके गुरु थे। ऐसा लोग कहते हैं कि नरहरि उनके गुरु का नाम था क्योंकि उन्होंने साफ तो नहीं कहा लेकिन इतना कहा है कि ‘कंज, कृपासिंधु पर रूपहरि’ नर रूप में हरि उनको कहा इससे अनुमान किया जाता है कि नरहरिदास उनका नाम रहा होगा।
बड़े महान अध्यापक रहे होंगे, तुलसीदास को आप जानते हैं। जिस तुलसीदास को लेकर हम इतना कहते हैं वे बड़े ही गरीब, बड़े ही दीनहीन थे, “बारे ले ललातविललातद्वार-द्वार फिरौ” बचपन से ही ललात विललात द्वार-द्वार चक्कर लगाते थे और यदि कोई उठाके हाथ में चार चने के दाना रख देता था तो समझते थे कि चारों फल मिल गए, चारों पदार्थ मिल गए । ऐसा कि, कूकर टूकर लागि, कुत्ते के लिए जो टुकड़ा फेंका जाता है उसके लिए भी ललक, इतनी भूख ओर दरिद्रता से मारा हुआ वह बालक, भगवान की कृपा थी अच्छे गुरु का उसको स्पर्श मिल गया। उन्होंने इन बात को स्वतः स्वीकार किया है कि बालकपन में समझ में नहीं आया, गुरु ने बहुत समझाने की कोशिश की, समझाया लेकिन लड़कपन था, बुद्धि इतनी नहीं थी, ‘समझी नहीं तस बालपन तब अति रहों अचेत’ उस समय बड़ा ही अचेत था। लेकिन गुरु ने हार नहीं मानी। ‘तदपि कही गुरु बारही बारा’ बारंबार उसको कहते रहे ‘समझु परि कछु मति अनुहारा’।
आजकल हम देखते हैं कि विद्यार्थियों पर दया करने की एक पद्धति चली हुई है, कि इसको समझ में नहीं आएगा इसलिए इसको कम दो। कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपने जीवन पर अपने बाल्यकाल की एक कहानी लिखी है कि उनके पिता ने कोई नौकर उनके लिए रखा था उनकी देखरेख के लिए तो वह आधा गिलास दूध ले आता था और उसको फेटता रहता था फेटते-फेटते फेन से जब पूरा गिलास भर जाता था तो उनके सामने रख देता था। आजकल शिक्षा में कुछ यही विधि अपनायी जा रही है। स्वयं गुरुदेव ने कहा है कि आजकल ये लोग फेट-फेटकर फेन से भर देना चाहते हैं गिलास को और बच्चे को कहते हैं –लो, पियो। क्योंकि तुम ज्यादा नहीं पी सकते। ज्यादा पीने से तुम को अपच हो जाएगा। ऐसी बात नहीं है। धैर्य होना चाहिए उसके भीतर “तदपि कही गुरु बारहिंबारा, समझि कछु मति अनुहारा” तो पहली शर्त तो यह है कि जो आध्यापक है उसके बीतर अगाध प्रेम होना चाहिए, स्नेह होना चाहिए । नहीं तो गुरुदेव की एक कविता है,
“तोरा फरबिनागो, पारबिना फोटा ते,
जतोई करिश जतोई मरिश, आघात
करिश, फोटा ते, तोरा पारबिनागो”
अरे तू फूल नहीं खिला सकेगा। बड़ी कोशिश करेगा, बहुत वैज्ञानिक विश्लेषण करने के बाद तुमको पता लगेगा कि इतना आक्सीजन चाहिए, इतना हीट होना चाहिए, इतना हाइड्रोजन होना चाहिए । और एक पात्र लगातार उसके नीचे, एक लैंप जलाकर और अनेक प्रकार के यंत्रों का प्रयोग कर नीचे आक्सीजन दोगे लेकिन कली फूल नहीं बनेगी। कली को फूल बनाने वाला कोई और होता है। “जे पारेशे अपनी पारे शे फूल फोटाते।” जो खिला सकता है वो खिला सकता है।
हम कोशिश में रहतो हैं कि हथौड़ा लेकर कली को चीर-चीर करके उसको विकसित पुष्प बना दें, लेकिन नहीं होगा। फूल बन भी जाएगा किसी प्रकार आपके हाथों के अत्याचार को सहकर कली के फूल के रूप में अपने को छितरा भी दे, रंग नहीं आएगा, गंध नहीं आएगी। मेरे मित्रो, बड़े धैर्य की आवश्यकता है। अध्ययन और अध्यापन का प्रथम मूल मंत्र है अगाध प्रेम और बच्चे पर अगाध निष्ठा।
इसके बाद देश-विदेश में हमने देखा है अपने देश में और बाहर भी। बाहर देखा है थोड़ा ही देखने का मौका किला है, कुछ जगह तो है, कुछ स्थानों पर तो है, लेकिन अधिकांश स्थानों पर जो चीज़ नहीं है वह है शिक्षण के लिए, अध्ययन-अध्यापन के लिए उपयुक्त वातारवरण। अपने देश में विश्वविद्यालयों में और विद्यालयों में हम बड़ा परिश्रम करते है। यहाँ आप भी ऐसा ही करते होंगे। पाठ्यक्रम बनाने में कोई गलती नहीं करते भरसक बाहर के विद्वानों को बुलाकर सलाह लेकर हम पाठ्यग्रंथ बनाते हैं। कोई त्रुटि भरसक नहीं होने देते । पढ़ाने वालों की नियुक्ति देकर दुनिया भर के अध्यापकों को बुलाते हैं, कैंडिडेट्स आते हैं। उनमें से हम अच्छा पढ़ाने वाला चुनते हैं। हम पढ़ने वालों के चुनने में भी गलती नहीं करते । भरसक हम फर्स्ट क्लास वालों को लेते हैं, उसके बाद फिर द्वितीय श्रेणी या अधम श्रेणी के लोगों को भी लेने की कोशिश करते हैं। लेकिन भरसक हम अच्छे-से-अच्छे विद्यार्थियों को लेते हैं। तो गलती कहाँ हो रही है। न हम अध्यापक चुनने में गलती करते हैं, बड़ी सावधानी बरतते हैं, न हम अध्यापक यानी विद्यार्थी चुनने में गलती करते हैं. बड़ी मेहनत करते हैं। फिर भी शिक्षा का स्तर बढ़ नहीं रहा है।
हमारे देश में विश्वविद्यालयों में प्रथा है कि कोई बड़ा आदमी आता है, कनवोकेशन ऐड्रेस देता है। उपाधि वितरण के समय बड़े-से-बड़े विचारक देश के आते हैं, महान् विद्वान् और ज्ञाता एक भाषण देते हैं। मैंने देखा है कि सन् 1899 से लेकर 1914 तक के दीक्षांत समारोहों के भाषणों में हर साल एक बात जरूर कही जाती है कि शिक्षा का स्तर गिर रहा है। गिर रहा है। गिर रहा है, गिरते-गिरते न जाने किस पाताल में पहुँचा है और कोशिश हम कम नहीं कर रहे हैं, हर जगह गलती, किस प्रकार हो रही है। पाठ्यक्रम चुनने में सावधानी बरतते हैं और ऐसे बड़े-बड़े सम्मेलनों में हम चर्चा करते हैं कि अगर कोई त्रुटि रह गई हो तो उसका परिमार्जन किया जाए। सब कहते हैं लेकिन कहीं कुछ गड़बड़ हो जाती है। ऐसी ही घटना एक बार और घटी थी।
मैं फिर आपका ध्यान कालिदास के शकुंतला नाटक की ओर ले जाना चाहता हूँ। दुष्यंत अच्छा प्रेमी था यह तो आप जानते ही हैं, गलती हो गई थी, उससे अंगूठी खो गई और उसने गलती कर दी, शकुंतला का त्याग कर दिया। लेकिन वह कम्बख्त अंगूठी फिर मिल गई, और ऐसे अवसरों पर जैसा होता है प्रेमी का हृदय व्याकुल हो उठा और अंगूठी को लेकर विलाप करने लगा। पुराने ज़माने में भले आदमियों का एक अच्छा काम था, एक तो वे राजकाज सब छोड़ देते थे। प्रेम का ज्वर चढ़ा नहीं कि राजकाज छुटा । दुष्यंत ने भी ऐसा ही किया होगा लेकिन एक काम उनका अच्छा होता था कि ऐसे अवसरों पर वे चित्रकर्म द्वारा मनोविनोद किया करते थे। सब भले आदमियों के घर में चित्रकर्म की सामग्री रहती थी। अच्छी-अच्छी तुलिका, बछड़े के काम के रोएं से बनी हुई तुलिकाएं, और बढ़िया रंगदानी, अनेक रंगों का बना हुआ और बढ़िया कागज वगैरह होता होगा। कागज न भी हो तो कोई ओर वस्तु तो होती ही होगी जिस पर वे चित्रकर्म करते थे। तो दुष्यंत ने भी सोचा कि अब इस समय तो एक मात्र साधन यह है कि शकुंतला का चित्र बनाया जाए और बनाया। अच्छा चित्रकार था, बढ़िया चित्र उसने बनाया शकुंतला की सखियां अप्सराएं थीं। वे छिप कर देख रही थीं। उनको दुष्यंत नहीं देख रहे थे लेकिन वे देख रही थीं। वे आपस में बातें करके कहती हैं कि वह क्या सूंदर चित्र बनाया है जैसे लगता है कि सखी मेरे आगे ही बोल रही है। उनका एक साथी था विदूषक-वही एकांत का साथी था उनका विदूषक ने कहा मित्र इसे देखकर तो ऐसा लगता है कि अब बोली, अब बोली इस तरह का चित्र बना दिया तुमने, बहुत सुन्दर चित्र बनाया। लेकिन दुष्यंत परेशान था कि तस्वीर, बनी नहीं ठीक। कुछ गड़बड़ लग रहा है, कहीं जैसे हमारी शिक्षा व्यवस्था में हम लोग कहते हैं वैसे ही कहीं कुछ गड़बड़ है। कुछ ठीक नहीं हो रहा है उन्होंने कहा कि बहुत बढ़िया चित्र बनाहै, इससे बढ़िया क्या हो सकता है। कहने लगे - नहीं कुछ गड़बड़ है। फिर थोड़ी देर में उसको याद आया और बोले - नहीं मित्र, ये तो शुकंतला बहुत ही अधूरी रह गई।
कृतं नं कर्मार्पितबन्धन सखे शिरीषमागण्डविलमिबिकेसरम्।
न वा शरच्चन्द्रमरीचिकोमलं मृणालसूत्र रचितं स्तनान्तरे।।
वो झूमका तो बनाया ही नहीं, शिरीष के फूल का झुमका जो वह पहने हुए थी जो गंडस्थल तक लटक रहे थे। कपोलप्रांत तक लटके हुए झुमके तो बनाना ही भूल गया। फिर “न वा शरच्चंद्रमरीचिकोमलं” शरद काल के चंद्रमा की किरणों के समान कोमल अब आप लोग सोच लीजिए कैसा कोमल होता होगा। लेकिन सुनने में अच्छा लगता है। “शरच्चंद्रमरीचि” इस कविता का अर्थ समझने में चाहे छोड़ा-बहुत भटकें आज, लेकिन सौंदर्य शब्द ही बता देगा आपको। शरच्चंद्रमरीचिकोमलं, मृणालसूत्र, जो मृणाल की माला को उसने धारण किया था वह तो बना ही नहीं। नहीं-नहीं मित्र इसमें शकुंतला ठीक नहीं बनी और उसने तूलिका ली, अच्छी तूलिका थी, उसने बढ़िया से शिरीष पुष्पों का झुमका भी बना दिया और मृणालसूत्रों की माला भी बना दी। कहने लगा अब ठीक हुआ। विदूषक ने कहा दोस्त अब मत छूना । अब बिलकुल ठीक हो गया, अब इससे बढ़कर कुछ नहीं होगा। लेकिन राजा कहता है नहीं दोस्त फिर कुछ गड़बड़ हो गया है तो बहुत सिर-विर खुजलाके उसने कहा - मित्र ये तो आधी शकुंतला भी नहीं बन पाई है। जो शकुंतला अपने वातावरण से विच्छिन्न है वह शकुंतला पूरी शकुंतला कैसे होगी।
‘कार्य सैकतलीनहंसमिथुना स्त्रोतावहा मालिनी’
‘पादास्तामभितो निषण्णहरिणा गौरीगुरोः पावना’
वह हिमालय की जो भूमि है, नीचे वाली तलहटी की भूमि जिसमें विश्रव्ध भाव से हरिण बिना डर बैठे-बैठे जुगाली किया करते थे, उन हरिणों का चित्र तो बना ही नहीं, और वे जो बड़े-बड़े पेड़ थे वहाँ पर:-
‘शाखालम्बितवल्कंलस्य च तरोर्निर्मातुमिच्छाम्यधः’
उसके नीचे बड़े पेड़ के नीचे, मैं उस हरिण को बनाना चाहता हूं। आप देखिए अभी तक वह विद्ध चित्र था, जिसको पोरट्रेट पेंटिग कहते हैं, जिसका आजकल दुनिया में बड़ा मान है। हमारे देश में उसको मह्त्व नहीं देते, विद्वचित्र या पोरट्रेट पेंट को, यथावत् चित्रण को महत्व नहीं देते । उसमें रस होना चाहिए। तो अभी तक शकुंतला का चित्र तो विद्ध चित्र था। ज्यों-का-त्यों था आर्टिस्ट उसमें नहीं आता है। उसने अपना हृदय गार के उसमें नहीं डाल दिया था। तो कहता है मित्र, मैं पेड़ भी बनाना चाहता हूँ। आपने देखा होगा, हरिण को और मारीशस के भाइयों से सुना है कि हरिण नहीं होता यहाँ, हमारे देश में यानी आपके देश में भी बहुत बड़ा सींगों की एक जहाज, जहाज ही समझिए इत्ता बड़ा-बड़ा वह नुकीली निकली हुए बड़ी सींग, बड़ी-बड़ी होती है, तो वैसा ही मैं हरिण बनाना चाहता हूँ और उसकी सींग, पर अपनी बाई आंख खुजलाती हुई मृगी को बनाना चहाता हूँ । आप सोचें कि बारहसिंगा महाराज जरा सा ऐसे झटक दें तो वो आँख फूट जाए उस मृगी की । मृगी की आँख संसार में दुर्लभ है। संसार में अगर सबसे सुन्दर वस्तु है तो मृगी की आँख है और मृगी अब इतने विश्वास के सभी उसके सींग के कोने पर अपने आँख का कोना खुजला रही है कितना विश्वास है और वे अपने समाधिस्थ अवस्था में जरूर बैठे होंगे और उसके प्रेमी उसका आस्वादन कर रहे होंगे। राजा के मन में यही तो डर है, यही तो वेदना है, यही व्याकुलता है कि उस मृगी की तरह शकुंतला भी तो मेरे पास विश्वास के साथ आई थी। ये मृग जितना उस आश्रय का समझते हैं उतना भी तो मैं नहीं समझ सकता। ‘तो मित्र मैं श्रंगे कृष्णामृगस्य वामनयन कण्डुयमानं मृगीम्’ बनाना चाहता हूँ वातारण जब नहीं होगा जिस हद तक तब तक तो शकुंतला आधी है उसमें शकुंतला फूल की तरह खिलेगी, जो विशिष्ट वातावरण उसके भीतर है वह खिलेगा।
मित्रो, मैं और ज्यादा कुछ भी नहीं कहना चाहता । शिक्षारूपी शकुंतला अभी अधूरी पड़ी हुई है, उसे भी वातावरण चाहिए। उसे पढ़ाई-लिखाई का वातावरण चाहिए जो पुस्तकालयों से बनता है, जो प्रयोगशलाओं से बनता है, लेकिन जो सबसे अधिक आदमियों से बनता है, सच्चे गुरुओं से बनता है, महान विद्वानों से बनता - जिन्होंने समर्पित जीवन जिया है। वे जब आते हैं तो वातावरण बनता है और उसके भीतर शिक्षा फूल की तरह खिलती है। तो मित्रो, ये मूल बातें है। और तो व्यावहारिक बातें है। सूरीनाम में आप कैसे हिंदी सिखलाएंगे, यह आप यहाँ मंच पर व्याख्यान देकर नहीं सूरीनाम के लोगों की भाषा जानकर, उनकी प्रकृति जानकर, उनकी अवस्थाएं जानकर, आप उस विषय को तय कर सकते हैं व्याकरण की हमें बहुत ही जरूरत है। अभी तो मैंने कहा न कि हमारी भूख बहुत है। हमने तो अभी प्रारम्भिक काम भी नहीं किया। हम लोग तो इतना भी नहीं जानते बड़े-बड़े लोग अभी यह अंतर नहीं समझते कि स्नेह किसको कहते है ? बहुत से छोटे-छोटे लड़के भी सस्नेह लिख देते हैं। स्नेह में और प्रेम में अंतर है। बहुत छोटी-छोटी बालों का भी विभेद करने वाले जो समानार्थक शब्द है श्वारस है मैं उनकी सार को कहता हूँ श्वारस, जो शब्द की बहनें हैं इसको थेसारस अँगरेज़ी में कहते हैं लेकिन मैं समझता हूँ सूंदर शब्द है श्वसारः। तो ऐसी चीजें हमने अभी बनाई कहाँ ? अच्छा व्याकरण हमने नहीं बनाया। हमारे व्याकरण में अनेक प्रकार की त्रुटियाँ रह गई। किन कारणों से कौन-सा प्रयोग होता है जो कि हमें अच्छा लगता है। व्याकरण को शुद्ध होना चाहिए और तर्कसम्मत भी होना चाहिए ।
मेरी एक छात्रा थी। वह मुझसे मिलने आई एम.ए. की परीक्षा देने के बाद । संयोग से मैं नहीं था। तो मेरी पत्नी से मिल-मला कर वह चली गई। लौटकर उसने बहुत बढ़िया पत्र लिखा। उसमें उसने एक वाक्य लिखा था कि आपसे तो मुलाकात नहीं हो सकी लेकिन आपकी सुपुत्र कहते हैं, अब सुपत्नी नहीं कहते। कुपुत्र ओर सुपुत्र तो कहते हैं लेकिन कुपति या सुपति नहीं बोलते। ये शब्द भाषा में है ही नहीं ।पति, पति है। कुपति का क्या अर्थ है। लेकिन नालायक पति। पत्नी है उसमें कुपत्नी या सुपत्नी होने का सवाल ही कहा उठता है।लेकिन अगर तर्कसम्मत दृष्टि से देखें तो बिलकुल ठीक था। अगर सुपुत्र और सुपुत्री कहा जा सकता है तो सुपत्नी कहने में या सुपति कहने में क्या नुकसान है ? लेकिन देख रहे हैं सब लोग हंस रहे हें । हंसने की क्या बात है भाई। भाषा तर्कसम्मत केवल नहीं होती व्यवहार की अपेक्षा रखती है। लोग कहाँ, क्यों बोलते हैं, विशेष प्रकार की भाषा बोलने वालों का विशेष प्रकार का संस्कार होता है। वह उस भाषा पर चढ़ा रहता है। बहुत-सी बातें हैं, जो वैसे तो तर्कसम्मत नहीं हैं लेकिन हमारे प्रयोग में चली आ रही है। उनको हम पढ़ते है, पढ़ाते हैं और भाषा में वे आ ही जाती हैं तो हमें एक परिनिष्ठित नई भाषा सीखनी ही होगी । इसमें कोई संदेह नहीं कि भिन्न-भिन्न प्रदेशों में, भिन्न-भिन्न देशों में वहाँ की परिस्थिति के अनुसार भाषा में भिन्न-भिन्न रूप होंगे। सब जगह का स्तर भी एक नहीं होगा।
एक परिनिष्ठित भाषा हमारे सामने अवश्य होनी चाहिए, जिसको किंग्ज इंन्लिश या क्वींस इंग्लिश कहते हैं। एक शुद्ध, परिनिष्ठित भाषा का एक आदर्श हमारे सामने रहना चाहिए। प्रयत्न करना अपना काम है हर प्रदेश के लोगों को, हर देश के लोगों को उस शुद्ध भाषा को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। बाकी जो थोड़ी-बहुत कमियाँ रहेंगी, हिंदी भाषा बहुत उदार है, बहुत कमियाँ, बहुत गलतियाँ बर्दाश्त करने की शक्ति उसमें है हम उसकी परवाह नहीं करते । गलतियाँ भी होगी। लिंग की गलतियाँ होती है। विभक्तियों की गड़बड़ियां होंगी, हो सकती हैं। उसकी हम परवाह नहीं करते । लेकिन हर विद्यार्थी का प्रयत्न यह अवश्य होना चाहिए कि एक परिनिष्ठित शुद्ध भाषा है, जो हमारा ध्रुव-तारा है उसके निकट हमें जाना चाहिए। भिन्न-भिन्न देशों, भिन्न-भिन्न प्रांतों, भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वाले को हिंदी सिखाते समय शिक्षक इनका ध्यान रखें और तदनुसार व्यावहारिक निर्णय करें। भाषा-ज्ञान के लिए द्विभाषी कोश बहुत आवश्यक है। शब्द-भंडार बहुत आवश्यक है। इसी तरह से भाषा संबंधी मुहावरों का कोश बहुत आवश्यक है। इन सब चीजों की रचना होती रहनी चाहिए। अच्छी-से-अच्छी रचना होनी चाहिए। भिन्न-भिन्न प्रदेशों में उनकी जो व्यावहारिक कठिनाइयाँ है उनको समझकर उन देशों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के कोशों का हमें निर्माण करना पड़ेगा। मुझे कोई संदेह नहीं है कि विश्व हिंदी सम्मेलन आगे चलकर इन महान कार्यों को भी अपने हाथ में लेगा और हिंदी निरंतर शुद्धरूप में परिष्कृत रूप ओर परिनिष्ठित रूप में सारे संसार में प्रतिष्ठित होगी।
