हिंदी भाषा, शिक्षा और अनुशासन
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
(द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन की अन्तिम गोष्ठी में प्रातः स्मरणीय द्विवेदी जी का भाषण)
मेरे
प्यारे भाई-बहनों, साहित्य रसिको, भाषा प्रेमियो, मैं
आपका हार्दिक अभिनदंन करता हूँ। अभी मैं सोच रहा था कि
आप इतनी देर से इस धैर्य के साथ यह सब सुन रहे हैं ।
मुझे आश्चर्य हो रहा था और साथ-ही-साथ ईमानदारी की बात
तो यह है कि मुझे आप पर दया भी आ रही थी । मैं समझता
हूँ कि आपको मेरे ऊपर दया थोड़ी-थोड़ी आती होगी । काफी
देर से हम लोग बैठे सुन रहे हैं, बड़े गंभीर विचार
हमने सुने हैं। हमारा तो यह सौभाग्य था कि बगल में
दयानन्द लेटे हैं। इसलिए मेरा जी तो बहुत हल्का हुआ
लेकिन मैं जानता हूँ कि आप काफी थक चुके हैं। इस समय
भाषा के सूक्ष्म विचार और साहित्य की गंभीर समस्याएं
आपके सामने मैं नहीं रखना चाहता । पहली बात तो यह है
कि प्रायः ऐसा कुछ छूटा नहीं है जो विद्वानों ने आपको
बताया न हो । मुझे तो बड़ा आनंद मिला है । पठन-पाठन
वस्तुतः अध्ययन-अध्यापन की जो समस्याएं हैं उनके अनेक
पहलू हैं और हमारे विद्वानों ने उन पर प्रकाश डाला है।
कोई पहलू कदाचित ही छूटा हो, हालांकि समय बहुत कम था,
लोगों ने छू-छू कर छोड़ दिया है - सब विषयों को। लेकिन
हर विषय उठाए गए हैं, हर समस्याओं पर बातें की गई हैं।
मेरी हालत रामायण के लक्ष्मण की तरह है। आप जानते हैं तुलसीदास जी ने रामायण यह लिखा है कि जब राम, सीता और लक्ष्मण वन जा रहे थे, तो रामचन्द्र जी जिस रास्ते से जाते थे उनके चरण जहाँ-जहाँ पड़े उस पर सीता जी कैसे चरण रख सकती थीं। तो उन्होंने भरसक कोशिश की कि बीच-बीच में जहाँ उनके चरण का चिन्ह नहीं था वहाँ पर पैर रखकर चलें - नहीं तो उनके चरण चिन्हों पर अपना चरण रख देने से तो बहुत अच्छा नहीं होता, मर्यादा की हानि होती, सो सीता जी बचा-बचा के चलती रहीं। अब रास्ता तो भर गया एक रामजी चले, पीछे सीताजी बीच-बीच में जो जगह बची उस पर चलीं। बेचारे लक्ष्मण की आफ़त कि अब कहाँ चलें, वे एक बार दाहिना पैर रखते और एक बार बाएं पैर रखते - शायद कूद-कूद कर चलते थे। उससे भी कठिन अवस्था हमारी हैं । इतने श्रद्धेय, पूज्य विद्वानों ने ऐसी-ऐसी सब बातें कहीं हैं उन सबको छोड़कर और उनसे अछूती कौन-सी बात कहूँ, मुझे समझ में नहीं आ रहा है। मेरी समस्या लक्ष्मण से भी कठिन है।
अभी कमला बहन ने बड़ी अच्छी एक बात कही - सूर्योदय हो रहा है। उन्होंने बड़ी आशा का संदेश दिया। मुझे दुगुना सूर्योदय दिखाई दे रहा है। यह जो विश्व हिंदी सम्मेलन है, इसका अभी दूसरा ही वर्ष है । बहुत बालक भी नहीं, शिशु है। अभी तो यह पैदा ही हुआ है, एक-दो साल का बच्चा है। लेकिन इसको देखकर लगता है कि एक महान भविष्य का द्वार उन्मुक्त हो रहा है। ऐसा लग रहा है कि वे देश जो अब तक सताए हुए हैं, दबाए गए हैं, उनकी अंतरात्मा का विकास हुआ है और हमारे ऊपर उन संस्कृतियों का प्रभाव इतना नहीं रहेगा जो इस बात में विश्वास करते हैं कि लोगों को दबाकर, लोगों का शोषण करके उससे अपना फायदा उठाया जाए, बल्कि उनका होगा जिन्होंने यह देखा है कि संसार में जो कुछ दिखाई दे रहा है। भगवान का रूप है। इससे भी बड़ी चीज है छोटी-छोटी सम्पत्तियों से बड़ी चीज महान् भावना, बड़े मनुष्यत्व की कल्पना से मनुष्य बड़ा होता है। जब अदिति के दो बच्चे हुए थे, एक तो अरुण हुए उनको जल्दी में उन्होंने छोड़ दिया था, लेकिन वरुण बहुत देर बाद पैदा हुए और काफी मजबूत पैदा हुए । पैदा होते ही उन्होंने कहा कि माँ बहुत भूख लगी है। तो माता ने जाकर पिता कश्यप से कहा कि लगता है कि बड़ा कुलच्छनी बेटा पैदा हो गया। पैदा होते ही कहता है बड़ी भूख लगी है। महाभारत में ऐसा प्रसंग आया है, कश्यप ने कहा कि अदिति चिंता न करो, बड़ा बेटा पैदा हुआ है। क्योंकि इसकी भूख बड़ी है। जिसकी भूख बड़ी होती है वह बेटा बड़ा होता है। हमारा यह जो विश्व हिंदी साहित्य सम्मेलन विराट भूख लेकर निकला है सारे संसार के किसी भी साहित्य से इसका विरोध नहीं है, सबको ग्रहण करना चाहता है और सबको ग्रहण करने के बाद एक ज्योति से संसार को आलोकित करना चाहता है। विश्व हिंदी सम्मेलन अभी छोटा दिखाई दे रहा है लेकिन बहुत बड़े भविष्य की कल्पना हमारे सामने रखता है।
दूसरा, यह जो मारीशस देश है उसे क्या सुन्दर देश विधाता ने बनाया है। विधाता ने तो शायद ऊबड़-खाबड़ ही बनाया होगा, लेकिन आपने अपने-अपने पसीने से, अपने खून से, अपने परिश्रम से, अपनी तपस्या से, इसको ऐसा सुंदर एक उद्यान बना दिया है कि जी नहीं करता कि यहाँ से जाया जाए। क्या करें कामकाज के बंधन में हूँ। बहुत ही सुन्दर देश। कई दिनों बाद जाता । रामचरित मानस आपका प्रिय ग्रंथ है इसलिए में उसी में से एकाध और बात कहना चाहता हूँ - जब रामचन्द्र जी धनुष तोड़ने के लिए आगे बढ़ने लगे तो सीता जी की माता बहुत व्याकुल हुईं कि अरे कोई आदमी ऐसा नहीं कि- “काउ न बुझाई कहइ गुर पाहीं, ए बालक असि हठ भव नाहीं।” ये छोटा सा बच्चा इसको कह रहे हैं कि धनुष तोड़े, शिव का धनुष, जिसको बड़े-बड़े लोग आकर उठा न सके, हजार-हजार लोगों ने कोशिश की, “भूप सहस दस एक हि बारा” हजार राजाओं ने मिलकर उठाने की कोशिश की, नहीं उठा और इस बालक को कह रहे हैं कि धनुष उठाएगा, तो कोई राजा से समझा कर कहो बाबा यह हठ ठीक नहीं है। तो उनकी साथी ने कहा कि नहीं बहन ऐसा मत कहो, “ तेजवंत लघु गनि अनृप रानी” जो तेजवंत होता है उसको छोटा न समझना और उसी प्रसंग में उन्होंने कहा कि “रवि मंडल देखत लघु लागा, उदय तासु त्रिभुवन तम भागा”। सूर्य का मंडल कितना छोटा सा, एक थाली जैसा उगता है लेकिन जिस दिन सूर्य का मंडल उदय हो जाता है, उसी क्षण संसार का अंधकार दूर हो जाता है। तो ये दो सूर्य उदय हो रहे हैं, हमारे सामने मारीशस को देखने में छोटा लेकिन अपार तेजस्वी रूप है। यह देखें हमारे सामने है जो संसार को निश्चित रूप से नया संदेश दे रहा है। और यही नया संदेश आगे चलकर कदाचित विश्व संस्कृति का एक आदर्श रूप बनेगा।
यह हिंदी सम्मेलन जो देखने में छोटा लग रहा है अपार भविष्य का संदेश लेकर आया है । कोई नहीं जानता कि कितनी दूर तक यह बढ़ेगा । सारे संसार के मनीषी यहाँ एकत्र हुए हैं और हिंदी के प्रति अपने प्रेम की चर्चा कर रहे हैं। आपने तो सिर्फ एक सूर्य देखा था, मुझे दो सूर्य दिखाई दे रहे हैं। मारीशस देश का सूर्य और विश्व हिंदी सम्मेलन का सूर्य - दोनों की छोटे दिखाई दे रहे हैं। मारीशस भी बहुत कम दिनों में स्वाधीन हुआ है, लेकिन दोनों की अपार संभावनाएं हैं। मनुष्य अपार संभावनाओं से बढ़ता है। आप जानते हैं। हमारे देश में आत्मा की बड़ी महिमा है। कई बार सुनते-सुनते समझ में नहीं आता है कि आखिर यह आत्मा है क्या ? बहुत बार तो ये भी बताते हैं कि “अंगुष्ठ मात्रः मुरुष” । यह तो कहने का ढंग है। असल में मनुष्य के भीतर जो अपार सम्भावनाएं छिपी पड़ी हैं, उनका द्वार है आत्मा। मनुष्य देखने में इतना छोटा लग रहा है, लेकिन इसके भीतर कितनी अपार शक्ति है वह हम आत्मा शब्द से प्रकट करना चाहते है। शब्द से, कहने से ही चीज़ ज़रा छोटी जो जाती है, सीमाओं में बंध जाती है क्योंकि उसका एक अर्थ होता है। तो यह जो एक आत्म-तत्व है, उसके भीतर का जो तत्व देखा जाता है कि वह कितना प्रभावशाली है, वह क्या दूसरों को दबाने के लिए है, क्या दूसरों के ऊपर आधिपत्य जमाने की लालसा से निकला है या शांति का संदेश देने के लिए निकला है। इस समय सारे संसार की यह आशा है कि हमारा देश और आपका देश इस क्षेत्र में नेतृत्व करे क्योंकि यहाँ से आत्मज्योति का संदेश उठा है। यह संसार के छोटे-छोटे पदार्थों पर जो आसक्ति है उसके विपरीत मनुष्य की जो गहन और छिपी हुई अनंत संभावनाएं हैं, उसके ऊपर बल देता है और आज का विश्व हिंदी साहित्य सम्मेलन उसी बल का साधन बनने वाली भाषा को आगे बढ़ाना चाहता है। इसलिए मैं, बहुत ज्यादा आपको नहीं कहूँगा, ऐसी बातें नहीं बताऊँगा जिससे कि आपको, आपके दिमाग को और अधिक परिश्रम करना पड़े लेकिन दो-तीन छोटी-मोटी बातें मैं अवश्य कहना चाहता हूँ।
एक तो यह कि अध्यापन, इसकी समस्या पर हमें विचार करना था। तो यह अध्ययन और अध्यापन साहित्य का भी का होगा, और-और विषयों की भी चर्चा हुई। हर विषय की अलग-अलग समस्याएं हैं। देश-विदेश के सामने भिन्न-भिन्न भाषाओं के बोलने वालों के सामने भाषा के सिखाने की भी अनेक समस्याएँ है। व्यावहारिक क्षेत्र में आकर ही उसको समझा जा सकता है।
साहित्य के बिना भाषा भी नहीं चल सकती है। लेकिन बहुत अधिक इधर-उधर न जाकर मैं भाषा के संबंध में थोड़ा सा आपको बताऊँगा और उसी की उंगली पकड़ कर एकाध बात अगर साहित्य के बारे में भी आ गई तो उसे भी आपके सामने रखूँगा । बहुत ज्यादा समय नहीं लूँगा । पहली बात यह है कि मनुष्य जाति मात्र की भाषा कई प्रकार के अनुशासनों ने बंधी दिखाई देती है। ऐसा साधारणतः समझा जाता है कि भाषा के दो प्रकार के अनुशासन, मर्यादा या डिसिप्लिन हैं - एक तो शब्द और अर्थ का जो व्याकरणसम्मत प्रयोग है, व्याकरण है उसकी, वाक्य-विन्यास की पद्धति है। उसके मुहावरे हैं, कहने का ढंग है इन सब बातों में मुख्य रूप से आप कहें कि व्याकरण और वाक्य-विन्यास का अनुशासन । उसके बिना भाषा नहीं चलती। दूसरा एक अनुशासन उसको और लेना पड़ता है। व्याकरण से शुद्ध होने पर भी भाषा गलत हो सकती है। वह ऐसा है कि जैसे आज अगर आप कहें कि वह “आदमी आग से खेत सींच रहा है” तो व्याकरण की दृष्टि से कोई गलती इसमें ही है। वाक्य-विन्यास की दृष्टि से भी कोई गलती नहीं है। कर्ता अपनी जगह पर ठीक है, क्रिया अपनी जगह पर ठीक है, कर्म, करण सब ठीक है आदमी आग से खेत सींच रहा है। लेकिन एक और दूसरा अनुशासन भाषा का होता है। वह अनुशासन तर्क- सम्मत व्यवस्था है, बाह्य-जगत को उसके अनुकूल होना चाहिए। नहीं तो व्याकरण सम्मत भाषा तो पागल लोग भी बोलते हैं। लेकिन उनकी भाषा बाह्य-जगत की तर्क-सम्मत व्यवस्था के अनुकूल नहीं होती। ये दो तो ऊपरी अनुशासन भाषा के लिए है। जो कुछ भी आप कहेंगे, भाषा के संबंध में आप सिखेंगे, या दूसरे देश के लोगों को सिखाएं, यह दूसरी बोली बोलने वालो को सिखाएं, आपको इन दो अनुशासनों को तो अवश्य मानना पड़ेगा। तीसरा अनुशासन भी है। और वह अनुशासन भी बहुत मह्त्वपूर्ण है लेकिन हमने भाषा को पाकर बहुत कुछ खो भी दिया है। वस्तुतः भाषा हमारे पास पड़ा कमजोर साधन है इस बात को न भूलें । बहुत-सी बात कहने में, भाषा के कहने में हम लोग हाथ, मुँह, नाक, कान के द्वारा अभिनय करके, तरह-तरह का स्वर बदल कर नाना प्रकार की भाव-भंगिमा के माध्यम से हम अपने भाव को आपके हृदय में प्रवेश करा पाते हैं। अगर इन चीज़ों को हटा दिया जाए तो भाषा थोड़ी और कठिन हो जाएगी। तो एक तीसरा अनुशासन भी होता है जो कि इस व्याकरण के नियम, अनुशासन और तर्क सम्मतता के अनुशासन - इन दोनों से थोड़ा ऊपर जाता है।
तीसरा अनुशासन वस्तुतः अध्यापकों के लिए विशेष रूप से माननीय है। पहले तो व्याकरण सम्मत दो अनुशासन, जिनके बिना तो भाषा चल ही नहीं सकती और विशेष करके परिनिष्ठत भाषा, जिसका आप सबके लिए सर्वसामान्य भाषा बनाना चाहते हैं उसके लिए व्याकरण और वाक्य-विन्यास का अनुशासन होना ही चाहिए । तर्कसम्मत जगत की व्यवस्था भी होनी चाहिए। लेकिन एक तीसरा और अनुशासन है जो दिखाई नहीं देता । साहित्य में तो उसके बिना कोई कारोबार चल ही नहीं सकता । यह तीसरा अनुशासन तर्कम्मत व्यवस्था के प्रतिकूल जाता है, लगता है कि प्रतिकूल जा रहा है। अभी जब मैंने आपसे कहा कि आग से खेत सींचना यह बाह्य जगत की तर्कसम्मत व्यवस्था के अनुकूल नहीं पड़ती। लेकिन कवि को कैसे रोकेंगे आप । कवि कह सकता है कि वह आग से खेत सींच रहा है और आपको उसका अर्थ निकालना पड़ा क्योंकि अगर साधारण आदमी ऐसा कहता तो हम कहते कि पागल है। “हमही बोरी बिरह बस, कै बौरो सब गाँव, कहा जानिए कहत है शशी शीत कर नाम।” क्या मैं ही पागल हो गई हूँ या सारा गाँव पागल हो गया है, क्या जान कर यह लोग कहते हैं कि चंद्रमा ठंड़ा होता है। वस्तुतः चंद्रमा ठंडा होता है ही है। यह कोई पागल नहीं कह रहा है। लेकिन उसको क्या कहेंगे, क्या उसको पागल कहेंगे ! जो व्याकुलता उसके अन्दर में ही, भीतर की जो वेदना उसके मन में आ रही है इसी से वह कह रही है कि लोग क्या समझकर चंद्रमा को शीतल कहते हैं क्योंकि यह तो जला रहा है। तो वहाँ सोचना पड़ता है कि एक तीसरा अनुशासन भी है। वस्तुतः हमारे देश के सबसे बड़े महान कवि इस देश में तो यह कहना मुश्किल है कि सबसे बड़ा कौन था - व्यास थे कि वाल्मीकि थे, कौन थे ? लेकिन बहुत बड़े महान कवि कालिदास थे। जिनकी चर्चा आप लोग सुन चुके होंगे, पढ़ चुके होंगे, बहुतों ने उनका ग्रंथ पढ़ा होगा और जिन लोगों न न पढ़ा हो उनसे मेरा अनुरोध है कि अवश्य पढ़ें । कालिदास जैसा महान नाटकककार, महान कवि ऐसी बात कह जाता है, जो बाह्य जगत् की तर्कसम्मत व्यवस्था के प्रतिकूल है।
