भक्तिकाल के सन्त घीसादास
डॉ.
इन्द्र
सेंगर
भारतीय संस्कृति में अध्यात्म की दो चिन्तन-धाराएँ प्रवाहित होती दिखाई देती हैं, जिन्हें आर्ष परम्परा और श्रमण परम्परा के नाम से जाना जाता है। आर्ष परम्परा का प्रवर्त्तन यदि ऋषियों-मुनियों द्वारा किया गया तो श्रमण परम्परा का प्रवर्त्तन गौतम बुद्ध द्वारा किया गया। सिद्धों और नाथों से गुजरती हुई श्रमण परम्परा ने जब सन्त कबीर की चिन्तन-धारा का स्पर्श किया तो वह निर्गुण भक्ति की पावन गंगा के रूप में और भी तीव्र गति से बहने लगी। रूढयों और अंधविश्वासों के प्रदूषण से मुक्त। सन्त कबीर के उपरान्त इसे अनेक निर्गुण-साधक सन्तों ने प्रवाहमान बनाया, जिनमें सन्त घीसा दास का नाम भी उल्लेखनीय है।
सन्त घीसा दास का जन्म दिल्ली-शाहदरा रेलवे स्टेशन से
शामली जाने वाली
रेलवे लाइन पर बीस मील की दूरी पर अवस्थित मेरठ जनपद
के अन्तर्गत खेकडा नामक कस्बे
में हुआ था। यह कस्बा यदि एक ओर नेत्रा-ज्योति के
सुरमें के लिए विख्यात है तो
दूसरी ओर यह कस्बा अन्तर्चक्षुओं की ज्ञान-ज्योति के
सुरमें के लिए भी विशिष्ट
महत्त्व रखता है। इस ज्ञान के अंजन का रहस्य सन्त घीसा
दास ने ही बताया था,
जिसे
लगाकर उन्होंने स्वयं निर्गुण ब्रह्म की अनुभूति की थी
और दूसरों को भी ज्ञान अंजन
लगाकर ब्रह्म की सहजानुभूति करने की प्रेरणा दी थी।
आपकी जन्म की एक अनूठी कहानी
है। आफ पिता श्री सदासुख लाल कौशिक सन्त कबीर के अनन्य
अनुयायी और भक्त थे। उनके
हृदय में सन्तों के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा थी कि वे
जीविका द्वारा अर्जित धन भी
सन्तों की सेवा में अर्पित कर दिया करते थे। प्रति दिन
सन्तों और साधुओं को भोजन
कराने के पश्चात् ही स्वयं अन्न-जल ग्रहण करना उनकी
सहज प्रवृत्ति थी। एक दिन वह
आया कि एक सन्त के आशीर्वाद से सन् १८०३ ई. की आषाढ
मास की गुरू पूर्णिमा के दिन
उनके घर एक पुत्रा-रत्न उत्पन्न हुआ। यही बालक आगे
चलकर
’खेकडा
के कबीर‘
नाम से
विख्यात हुआ।
आपने शैशव काल से ही अपने चमत्कारों से लोगों को विस्मित करना प्रारम्भ कर दिया था। आप चौदह वर्ष की आयु से ही साखियों और पदों की रचना करने लगे थे। जब पिता ने जीविका के लिए कुछ कारोबार प्रारम्भ करने को कहा तो आपने लीक से हटकर अनूठा ही व्यवसाय शुरू कर दिया। यह व्यवसाय जातिवाद के विरोध की एक नई क्रान्ति का द्योतक था। यह कारोबार था एक जुलाहे का , परन्तु आफ अनुयायियों के अतिरिक्त इस रहस्य को कोई भी नहीं समझ सका कि यह युवा ब्राह्मण जुलाहे का धंधा अपनाकर आध्यात्मिक स्तर पर भी रहस्यमय ताना बाना बुन रहा है।
अनुयायियों की संख्या निरन्तर बढती चली गयी। उनका यश दूर-दूर तक फैलता गया। एक दिन वह आया कि आपने ’घीसापन्थ‘ नाम से अपने मत का प्रवर्त्तन किया ओर खेकडा में ’छतरी साहेब‘ की स्थापना कर दी। यह अष्टपहलू भवन ’सतगुरु घीसा सन्त दरबार‘ नाम से जाना जाता है। कालान्तर में यह भवन घीसा पन्थ के अनुयायियों के लिए एक पावन तीर्थ बन गया। इसमें सन्त घीसा दास और उनके शिष्यों के अनुपलब्ध चित्रा और उनके द्वारा रचित ’श्री ग्रन्थ साहेब‘ नामक वाणी संग्रह आज भी प्रतिष्ठित हैं। सन्त घीसादास सन् १८६८ ई. की मगशिर सुदी दशमी को पंच भौतिक शरीर का परित्याग कर निर्वाण पद को प्राप्त हो गये। इस सम्बन्ध में ये पंक्तियाँ अत्यन्त प्रचलित हैं-
संवत
उन्नीस
सौ
पच्चीसा,
शरीर अन्त
कीन्हा
गुरु घीसा।
मगसिर
शुदी
दसवीं
जाना,
गुरु
घीसा सन्त पद ही समाना।
इस पावन स्थली पर आज भी सन्त घीसा दास के जन्मदिन,
निर्वाण-दिवस और होली के पावन अवसर पर मेले लगते हैं,
जहाँ सहस्रों श्रद्धालुओं की
भीड उमडती दिखाई देती है।
’श्री
ग्रन्थ साहेब‘
नामक ग्रन्थ में सन्त घीसादास
द्वारा प्रणीत २०४ वाणियाँ एवं पद समाविष्ट हैं। ये
वाणियाँ गागर में सागर के सदृश
हैं। इनका प्रत्येक शब्द ब्रह्म की सहजानुभूति का
सशक्त साधन है। इसी ग्रन्थ में
सन्त घीसादास के अनन्य शिष्य जीतादास द्वारा सर्जित
३१२७ वाणियाँ भी संग्रहीत हैं।
सन्त घीसादास ने अपनी साखियों में सन्त कबीर जैसे
सतगुरु का उल्लेख किया है-
सकल
शरीरों रम रहे अवगत सन्त कबीर।
सन्त
रूप सतगुरु मिले
नीर-क्षीर
के
तीरड्ड
यही कारण है कि आपकी दार्शनिक मान्यताएँ कबीर-दर्शन से
बहुत कुछ साम्य
रखती हैं।
आपने अपनी वाणियों में सर्वाधिक महत्व सत्य और सतगुरु
को ही दिया है।
आफ अनुसार सत्य की तोप में अपार शक्ति है। इस तोप में
भक्ति का गोला डाला जाता है।
ज्ञान-पलीता से उसे स्फुरित किया जाता है,
जिससे भ्रम की दीवार छिन्न-भिन्न हो जाती
है और भक्त का हृदय अजस्र प्रकाश से आलोकित हो उठता
है। आपने ब्रह्म रूपी कस्तूरी
की प्राप्ति के लिए कबीर जैसे समर्थ गुरु का उल्लेख
किया है। आप अहिंसा के प्रबल
समर्थक हैं। जीव-हिंसा को आप सबसे बडा पाप मानते हैं।
हिन्दू और मुसलमान दोनों की
हिंसा-वृत्ति से खिन्न होकर आपने इन दोनों को इस
दुष्कृत्य के लिए दगाबाज कहा और इस
अमानवीय कृत्य के परित्याग हेतु आक्रोश भरे शब्दों में
कहा-
हिन्दू की दया मेहर
तुर्क की
दोनों घट से त्यागी।
वह हलाल वह झटका मारे,
आग दोनों पर लागी।
मुर्गी मारी बकरी मारी,
गऊ की पौपस काढी।
इन बातों म बहिस्त नहीं
है,
यह है सब दगाबाजी।
आपने जाति और रूढयों से मुक्त मानव-समाज की संकल्पना
की थी। आपकी मान्यता है कि सभी प्राणी हाड-माँस के
पुतले हैं। सभी की एक जैसी चमडी
है। सभी में एक ही अध्यात्म सत्ता व्याप्त है। न कोई
ऊँच है न कोई नीच। न कोई
ब्राह्मण है न कोई राजपूत। जातिवाद के खण्डन-मण्डन में
आपने सभी जाति के लोगों को
ऐसी डांट पिलाई है कि उनकी जुबान बन्द हो गई। आपने
मस्तक पर तिलक-छापा लगाने वाले,
हाथ में माला धारण करने वाले
,
गेरुआ वस्त्रा पहन कर झोली लटका कर माँगने वाले ढगी
साधुओं को बुरी तरह फटकारा-
साधो! साधु स्वांग ना भावे,
बाना पहर लजावे।
कंठी बांधे तिलक चढावे,
सिर पै टोपी पावेड्ड
इस बाणे ने जग ठग खाया,
पकडा जम
के जावे।
कंठा पहर हाथ ले झोली,
घर-घर अलख जगावेड्ड
बेचे चून दाम ही जोडे,
हरि का चोर कहावे।
इन बातों में नफा नहीं है,
जम का सोटा खावेड्ड
भारतीय संस्कृति की यह विशिष्टता रही है कि सन्त कबीर द्वारा प्रवर्तित निर्गुण परम्परा, ज्ञानाश्रयी राजमार्ग द्वारा हिन्दू और मुसलमानों में सदा-सर्वदा ऐक्य स्थापित करती रही है। आपने भी दोनों सम्प्रदयों को एकेश्वर का मूल मंत्रा देकर उनमें ऐक्य स्थापित करने का आशंसनीय प्रयास किया-
राम-खुदा एको है भाई,
हद क्यों दो
ठहराई।
एक हिन्दू एक मुसलमान,
ये कैसी रोल मचाईड्ड
इनमें
काजी
उनमें
पंडित,
दोनों
बडे
बनाये।
माया-मोह में भूल रहे हैं,
राम-खुदा नहीं
पायेड्ड
लालच खातर साँच न बोले,
मर्म उन्ह नहीं पाया।
घर में बस्तु बाहर
बतलावें नाहक जग भरमायाड्ड
सन्त घीसा दास की साधना का रथ सत्य,
अहिंसा,
शील और
सन्तोष के चार चक्रों पर गतिशील है। यह रथ धैर्य,
क्षमा,
ज्ञान,
नेह,
प्रेम और
पुण्य के अश्वों द्वारा जोता जा रहा है,
ज काम,
क्रोध,
माया,
मोह और अहंकार की सेना
को रौंदता हुआ परमार्थ के राजमार्ग पर अग्रसर है। उनका
सन्देश सच्चे अर्थों में
परमार्थ का सन्देश है। विश्व-मानव-मैत्राी का सन्देश
है,
जो वर्तमान और भावी
परिप्रेक्ष्य में भी उतना ही मूल्यवान है। निर्गुण
सन्त परम्परा में आपका नाम
चिरस्मरणीय रहेगा।
