हिन्दी की आस्तीन में पलनेवाले जीव
राजनंदन
चीन की राष्ट्रभाषा का नाम पुतूंग्हुआ है,जिसे स्थानीय तौर पर चीनी उच्चारण में फ़ुतूंघुवा कहा जाता है।चीन के सभी सरकारी काम-काज अनिवार्य रुप से एक मात्र इसी भाषा में निपटाए जाते हैं। अँगरेज़ी या किसी अन्य स्थानीय बोली-भाषा का कही कोई गुंजाईश नहीं होता। हालांकि क्षेत्रीयता के हिसाब से चीन में भी क्षेत्रीय बोली- उपबोली या उपभाषाएं हैं मगर उसे सरकारी मान्यता नहीं है। यहाँ के लगभग सभी सार्वजनिक स्थानों पर सरकार का निर्देश लिखा होता है कि सभी चीनी नागरिक बोल-चाल एवं अन्य काम-काजों के लिए अनिवार्य रुप से केवल फ़ुतूंघुवा का ही प्रयोग करें और लोग ऐसा ही करते हैं।
विदेशी नागरिकों के लिए कुछ खास काम जैसे वीसा आवेदन पत्र आदि भरने के लिए चीनी भाषा के साथ-साथ विकल्प के रुप में अँगरेज़ी रहता है मगर वहाँ भी अँगरेज़ी में भरे गये जानकारियों को संबंधित वीसा कर्मचारी द्वारा पहले चीनी भाषा में पूरी तरह से रुपांतरित कर दिया जाता है उसके बाद ही आवेदन-पत्र को विचार के लिए आगे बढाया जाता है। यह तो हुई चीन के सरकारी काम-काज में फ़ुतूंघुवा की अनिवार्यता।
चीन की निजी एवं सहयोगी क्षेत्र की बड़ी-बड़ी कंपनियाँ भी सिर्फ़ अंतर्राष्ट्रीय कागजातों को छोड़कर अपने सारे स्थानीय काम-काज पूर्ण रुप से चीनी भाषा में ही करती हैं। यहाँ तक कि कई बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ चाहकर भी अपने कामों में अँगरेज़ी का पूर्ण रुप से उपयोग नहीं कर पाती। उन्हे भी पूरी तरह से चीनी भाषा पर निर्भर होकर ही काम करना पड़ता है। अँगरेज़ी का उपयोग सिर्फ़ विदेशी ग्राहकों के साथ व्यापार संबंधी विचार-विमर्श एवं उत्पादों के गुणवत्ता नियंत्रण आदि के लिए दिशा-निर्देशन तक ही सीमित होता है, दो चीनी आपस में कभी भी अँगरेज़ी नहीं बोलते।
चीन में चूँकि प्राथमिक से लेकर उच्च एवं तकनीकी शिक्षा तक का माध्यम फ़ुतूंघुवा ही है इसलिए यहाँ सरकारी-गैर सरकारी दोनों ही क्षेत्रों में उच्च पद हासिल करने के लिए अँगरेज़ी का अज्ञान कभी बाधक नहीं बनता। मुझे अक्सर देखता हूँ कि यहाँ की बड़ी-बड़ी कंपनियों में जनरल मैनेजर, सी.ई.ओ. या वाइस प्रेसिडेंट जैसे उच्च पदों पर काम कर रहे लोगों को अँगरेज़ी का एबीसीडी भी नहीं आता और न ही उनके लिए अनिवार्य है। जहाँ अँगरेज़ी की जरुरत होती है वहाँ अँगरेज़ी जानने वाले चीनी उनके सहायक या दुभाषिये के रुप में काम करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि चीनीयों ने अपनी भाषा को कितनी प्राथमिकता दिया है। अँगरेज़ी भले ही विश्व भाषा है मगर चीनीयों ने इसे अपनी भाषा के ऊपर स्थान नहीं दिया बल्कि सहायक के रुप में अपनी भाषा के नीचे ही रखा है। जो अपने आप में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है।
हालाँकि चीन के तीव्र आर्थिक विकास ने चीनीयों के रहन-सहन एवं पहनावे-ओढावे को पूर्ण रुप से पश्चिमी ढंग में बदल दिया है। मगर अभी तक इनके खान-पान एवं भाषा पर दूर-दूर तक अँगरेज़ी का कही कोई प्रभाव नहीं है। दिखने के लिए खान-पान की के.एफ़.सी. एवं मेक्डोनाल्ड जैसी कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भले ही अच्छा व्यापार कर रही है मगर इससे चीनीयों के पारंपरिक खान-पान की रुचियों में कोई परिवर्तन नज़र नहींआता।
उसी तरह दुनिया के साथ बढ़ते व्यापार संबंधों एवं विश्व बाजारीकरण की विवशताओं ने चीनीयों को अँगरेज़ी पढ़ने पर मजबूर जरूर किया मगर चीनीयों ने अपने हृदय में अंगरेज़ी के लिए वह स्थान नहीं बनने दिया जो भारत सहित दुनिया के कई गैर अंगरेज़ी भाषी देश वासियों के मन में सहज रुप से अंगरेजी के लिए विद्यमान है।
आम भारतीयों की तरह चीनी लोग अपनी भाषा के प्रति कभी हीनमन्यता का प्रदर्शन नहीं करते। और ना ही अंगरेज़ी बोलकर अपने आप को ज्यादा पढा-लिखा या ज्यादा सभ्य साबित करने की कोशिश करते हैं।
विदेशी लोगों से भी चीनीयों की पहली अपेक्षा और कोशिश रहती है कि वे ही उनसे चीनी में ही बात करें। विदेशियों से इनका सबसे पहला सवाल यही होता है "क्या तुम चीनी बोल सकते हो ?"
इससे पहले कि कोई विदेशी इनसे पूछे " क्या तुम अंगरेज़ी बोल सकते हो ?" और इन्हें यह एहसास कराए कि शायद तुम अंगरेज़ी नहीं जानते।
विदेशियों से यही पूछ बैठते हैं "क्या तुम चीनी भाषा बोल सकते हो ?" और यह एहसास करा देते हैं कि शायद तुम चीनी नहीं जानते।
ऐसा है चीनीयों का अपने भाषा पर गर्व और अपनी भाषा के प्रति प्रेम!
चीनीयों के निज भाषा प्रेम पर लंबी-चौड़ी बातें करने का मेरा उद्देश्य इनके भाषा प्रेम की व्याख्या करना नहीं है। बल्कि इसके पीछे मेरा वास्तविक उद्देश्य चीनीयों की तुलना में भारतीयों का निज भाषा प्रेम और भारत में हिन्दी कि स्थितियों पर चर्चा करना है।
कहने का मतलब अपनी भाषा को समर्पित एक तरफ ये चीनी लोग हैं जो शान से अपने अंगरेज़ी अज्ञान को खा़रिज करते हैं और साफ-साफ मना करने के अंदाज में अपने दोनों हाथ हिलाकर यह कहते हुए नजर आते हैं " वो पूतोंग यिनइयूऽ " ( मै अंगरेजी नहीं जानता) और दूसरी तरफ़ विश्वगुरु होने का दावा करने वाले हम भारतीय लोग हैं, जो अंगरेजी बोलने में गर्व का अनुभव करते हैं, अपनी शान समझते हैं और जहाँ अंगरेजी के अज्ञान की बात आती है वहाँ हीन मानसिकता से भरकर मुरझा जाते हैं, दब्बु बन जाते हैं। यहाँ तक कि अपनी भाषा का उच्च ज्ञान होते हुए भी अपने ही देश में एक साधारण सेल्स-बॉय तक कि नौकरी से वंचित रह जाते हैं।
भारत के सरकारी, गैर-सरकारी,निजी या कॉरपोरेट हर क्षेत्र में अंगरेजी भाषा को ही प्राथमिकता मिलती है। कहने के लिए हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है। सरकारी संस्थानों में बड़े-बड़े महपुरुषों के नाम से उनके चित्र सहित हिन्दी कि वकालत में स्लोगन एवं सूत्रवाक्य प्रचारित- प्रसारित किये गये हैं और समय-समय पर किये जाते रहते हैं। बड़े-बड़े गैर सरकारी संस्थानों और कई प्रमुख सरकारी विभागों द्वारा हिन्दी-माह, हिन्दी-पखवाड़ा, हिन्दी-सप्ताह, हिन्दी-दिवस आदि मनाया जाता रहता है। कई बार तो देखने-सुनने में आता है कि इन हिन्दी आयोजनों के कार्यक्रम एवं विचार-विमर्श कि कार्यवाही अंगरेजी भाषा में संपन्न करा दिया जाता है और भारतीय अंगरेजी परस्तों की धृष्टतापूर्ण इन गलतियों को फिर किसी न किसी तर्क-कुतर्क से उचित भी ठहरा दिया जाता है।
लाख प्रयासों के बाद भी मेरी तुच्छ समझ में ये बात नहीं आती कि जहाँ/ जिस देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी है वहाँ/उस देश में फिर हिन्दी के लिए अलग से दिवस, सप्ताह, पखवाड़ा,माह आदि मनाने का क्या औचित्य है। जिस अंगरेज़ी को शुरू के पन्द्रह वर्षों तक के लिए जहाँ है जैसे रहेगा के रुप में स्वीकार किया गया था, उसे साठ वर्षों वाद भी क्यों नहीं हटाया गया ? सुनने में आता है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय में कभी किसी मुकदमे की बहस या सुनवाई अंगरेजी के अलावे हिन्दी में नहीं होती। प्रश्न उठता है कि जब संवैधानिक राष्ट्रभाषा एवं लिपि का प्रयोग संविधान की सर्वोच्च न्यायायिक संस्थान में ही पूर्ण रुप से नहीं होता तो सरकार के अन्य विभागों से तो हिन्दी की अपेक्षा सिर्फ वही पर की जा सकती है जिन सरकारी विभाग के कर्मवारियों को अंगरेजी नहीं आती।
दिल्ली जैसे महानगरों में तो कुछ जाहिल किस्म के लोगों को हिन्दी का उपहास उड़ाते भी देखा जा सकता है। जो लोग "प्रश्न" शब्द का उच्चारण "परशन" करते हैं। "स्कूल" को "सकूऽल" कहते हैं। हिन्दी के सम्मान जनक शब्दों का ज़िन्दगी मे जिन्होंने कभी प्रयोग नहीं सीखा वे शुद्ध हिन्दी का मजाक उडा़ते हैं। राष्ट्रभाषा का अपमान भारत की राष्ट्रीय राजधानी में होता है। सरकार को सबकुछ पता है मगर क्या करती है ? चुप है !
वास्तव में भारत की संवैधानिक रुप से घोषित राष्ट्रभाषा हिन्दी जरूर है मगर भारत की सरकारी, गैर-सरकारी सभी क्षेत्रों में अंगरेजी की सत्ता कायम है। हिन्दी के नाम पर होनेवाले करोड़ों रुपयों के व्यय-अपव्यय हिन्दी भाषा का पेंशन है। ठीक उसी तरह जैसे गुलाम भारत में अंगरेज उपनिवेशवादियों ने उस समय के राजाओं के सारे अधिकारों पर कब्जा कर लिया था और राजाओं को उनके राज्य एवं अधिकारों से वंचित रहने के बदले में पेंशन देता था।
भारत में राज एवं सत्ता अंगरेजी भाषा की ही है और सरकार की तरफ से हिन्दी पर होनेवाले करोडो़ रुपयों के व्यय-अपव्यय हिन्दी का पेंशन है। जिससे गाहे-बेगाहे हिन्दी का मान भी बना रहता है और जो समय-समय पर हिन्दी भाषा के हृदय में उठने वाले अपने अपमान की पीडा़ पर मरहम का काम भी करती रहती है। ठीक गुलाम भारत के अपने अधिकारों से वंचित पेंशनधारी उन राजाओं की तरह।
भारत में हिन्दी की उपेक्षा, अनदेखी और अपमान की गाथा बहुत लम्बी हो सकती है। चीनीयों के निज भाषा प्रेम की बाते मैने इसलिए की, कि शायद उसकी जरूरत थी मगर भारत विश्वगुरु होने का दावा करता है, संभव है दुनिया से कुछ अच्छी बातें सीखने में(पश्चिमी छिछोड़ेपन और चत्तुरबाजारी को छोड़कर) हमारी मानहानि हो और हमारे स्वाभिमान को कोई ठेस पहुँच जाय।
सच पूछिये तो उपरोक्त शब्दों मे हिन्दी का पक्ष रखते हुए मुझे भी एक अजीब सी अनुभूति हो रही है। इससे पहले भी न जाने ऐसी बातें कितनी बार लिखी-पढी गई होंगी। मुझे लगता है कि इस मामले में पुन: ऐसी बातें करने वाला मै किसी लकीर का सबसे नया, अनाड़ी और मूर्ख फ़कीर हूँ। जो यह जानते हुए भी कि ऐसी बातों का कोई भी असर भारतीय राष्ट्रभाषा विभाग या भारत की आम जनता पर कभी नहीं होता फिर भी ऐसी बातें करता हूँ। शायद अपने मन को समझाने के लिए। खैर....!
भारत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार, संरक्षण, एवं समृद्धि के लिए अधिकृत तथाकथित योग्य लोग भले ही हिन्दी के साथ छल कर रहे हों। हिन्दी के नाम पर मिलनेवाली मोटी सरकारी रकम से हिन्दी के कल्याण की जगह अपने तोंद का कल्याण कर रहे हों। ऐसे अंगरेजी दास लोग वास्तव में हिन्दी की आस्तीन में पलनेवाले जीव हैं। उनकी योग्यता ही उनका विष है। जिन्हे उनकी विषों की गुणवत्ता के आधार पर अलग-अलग उपयुक्त नाम दिया जा सकता है।
हिन्दी के लिए सबसे सौभाग्य एवं संतोष की बात यह है कि हिन्दी के कुछ कर्तव्यनिष्ठ सपूत नि:स्वार्थ भाव से, जहाँ भी है, जैसे भी है, बिना किसी लालच के अपनी फटेहाली में भी, अपनी जेब से पैसे खर्च करके भी हिन्दी की सच्ची सेवा और समृद्धि में वृद्धि कर रहे हैं। हिन्दी किसी सरकार के संरक्षण में प्रतिष्ठित न सही, अपने धरती पुत्रों के हृदय और संस्कार में संरक्षित है।
संस्कृत की तरह हिन्दी पुस्तकों में नहीं सिमटेगी। एक अमर-वेल(इंटरनेट) सारी दुनिया में फैल चुकी है। जिसकी जड़ भारत में है। जहाँ से सारी दुनिया में हिन्दी पुष्पित, पल्लवित और सुवासित होती रहेगी।
