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वर्ष- 2, अंक - 14, जुलाई 2007

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   सॉनेट

 

 

जीवन की गति


कात्यायनी

 

जीवन है गतिमान दृष्टि को गतिज बनाओ ।

मत बाँधो सुंदरता को जड़ मानक द्वारा

नैतिकता के मूल्य भी भला कैसे थिर हों ?

अपनी दृष्टि-उड़ान-लक्ष्य तुम क्षितिज बनाओ ।

 

निखिल चराचर विश्व सदा से ही गतिमय है

इसकी सबसे सूक्ष्म इकाई में भी गति है

मानव जगत मात्र विस्तार पृक्रति का ही है

नियमबद्ध, गतिमय है, सुंदर और सलय है ।

 

यह पदार्थमय जगत द्वंद्वमय गति संचालित

और तज्जनित जगत विचारों का भी गतिमय

पर पदार्थ से चिंतन, चिंतन से शब्दों की

दुनिया पीछे - इसी नियम से जग है चालित ।

 

चिंतन का, शब्दों का व्यापक क्षितिज बनाओ

जीवन है गतिमान, दृष्टि को गतिज बनाओ !

 

 

 

  कात्यायनी

3/274, विश्वास खंड, गोमती नगर

लखनऊ, उ.प्र. - 226010

 

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