|
|
|
||||||||
|
|
|||||||||
|
◊अपनी बात◊कविता◊छंद◊ललित निबंध◊कहानी◊लघुकथा◊व्यंग्य◊संस्मरण◊ कथोपकथन◊ भाषांतर◊संस्कार◊ मूल्याँकन◊हस्ताक्षर ◊ पुस्तकायन◊ विचार-वीथी◊प्रसंगवश◊ इनदिनों◊हिंदी-विश्व◊ लोक-आलोक◊व्याकरण◊तकनीक◊बचपन◊शेष-विशेष◊ हलचल◊विशेषांक ◊सृजनधर्मी◊लेखकों से◊ संपादक बनें◊चतुर्दिक्◊पुरातनअंक◊अभिमत◊मुख्यपृष्ठ |
||||||||||
|
अपनी बात |
||||||||||
|
।। हिंदी का भविष्य।।
संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाये जाने को लेकर चारों दिशाओं में फैले हिन्दी-भक्त सक्रिय होने लगे हैं। हिन्दी को प्रोत्साहित करने वाली संस्थाएं एवं भाषा सेवक भी अनेक देशों में अपनी भूमिका से चौकाने लगे हैं। हिन्दी के नाम पर रोजी-रोटी जुटाने के नये द्वार भी खुलते दिखाई देने लगे हैं यानी कि वह बाजार की भाषा बनने जा रही है । विश्व की दो-दो महान शक्तियाँ - अमेरिका और यू.के हिन्दी की प्रभविष्णुता से अचंभित होकर सतर्क होने लगी हैं। कुल मिलाकर हिंदी अब वैश्विक भाषा की छवि में दिखाई देने लगी है । इसमें सच्चाई है – इसके बावजूद कुछ ऐसी सच्चाईयाँ भी उससे चिपकी हुईं हैं जो एक विशुद्ध हिंदी मन को निराशा की खाड़ी में धकेल देती है - और वे दिखाई देती हैं हिन्दी-दुनिया के अंतरदृश्यों में । विचार उस पर भी होना लाज़िमी है । लाजिमी इसलिए कि इस माह हम भारतीय लोग न्यूयार्क में विश्व हिंदी सम्मेलन करने जा रहे हैं । ऐसे में मात्र केवल उत्सवधर्मी चिंतन से काम नहीं चलेगा । विंहगावलोकन के बजाय सिंहावलोकन से ही हिंदी का भविष्य दिख सकता है।
इसे भारतीय राजनीति का दोगलापन ही कहें कि हिन्दी, जिसे हम वैश्विक भाषा बनाने के लिए संकल्पित हैं, अपने ही मुल्क की राजभाषा बना नहीं सके हैं। राजनीतिक मानसिकता की धूर्तता ही वह कारण है जिससे भारतीय उपमहाद्वीप के प्रभू वर्गों में अंगरेज़ी शिक्षा और अंग्रेज़ियत की वकालत बदस्तूर जारी है। हिंदी सेवाटहल में लगी हुई है और अंगरेज़ी राज कर रही है । दरअसल इसके पीछे वर्चस्ववाद और सत्ता सुख के स्थायित्व के लिए कुटिल चालें की काम कर रही हैं – और सिर्फ इतना ही नहीं - अन्य भारतीय भाषाओं को नेस्तनाबूत करने का अदृश्य षडयंत्र भी सम्मिलित है इसमें । पाश्चात्य दृष्टिकोण से नीति एवं नियत तय करने का खामियाज़ा सारा विश्व जानता है । यह सर्वज्ञात है - एक देश एक भाषा के सिद्धांत को अमली जामा पहनाने से लाखों भाषाएं गायब हो चुकी हैं । आज से दस हजार पहले की दुनिया की तहकीकात करें - जब समूचे विश्व में मनुष्यों की संख्या लगभग दस लाख थी, तब भाषाओं की संख्या 15,000 थी । आज जबकि दुनिया की आबादी लाखों गुना हो चुकी है तो भाषाओं की संख्या घटकर 6000 से 7000 के बीच रह गई हैं । सैकड़ों भाषाएं मरणासन्न हैं । यह केवल राजनीतिक एवं सांस्कृतिक दबाबों का दुष्परिणाम है जिससे प्रभुत्वशाली भाषाएं शेष भाषाओं को लील चुकी हैं । भाषाशास्त्री तो यह भी भविष्यवाणी करने लगे हैं कि 21 वीं सदी के अंत तक मात्र 600 भाषायें ही बची रह जायेंगी । हम अफ्रीका और आस्ट्रेलिया पर केंद्रित होते हैं तो बड़े चौंकाने वाले आंकड़े हमारे सम्मुख आने लगते हैं – अफ्रीका की 1000 में से 220 भाषाएं अदृश्य हो चुकी हैं । विगत 200 वर्षों में आस्ट्रेलिया की 250 भाषाओं में से केवल 25 भाषाएं ही शेष बची हैं । इन देशों की शासन प्रणालियों में यही माना जाता रहा है कि भाषाएं जितनी कम होंगी, समस्याएं भी उसी अनुपात में कम होगी । ये देश यह भी भूल गये कि जैसे ही कोई भाषा जमींदोज़ होती है, मनुष्य की एक अस्मिता, एक छवि भी जमींदोज़ हो जाती है । यही मूर्खता और आत्मघाती क्रियाकलाप हमारे अपने देश में भी हो रहा है। बैरी गोरे लोगों ने इसके बीज बोये थे, मित्रभावी काले लोग उसके पेड़-पौधों को तन मन से सींच रहे हैं । सोचें तो ज़रा - आजादी के इतने वर्षों बाद हमारी भाषाओं का भविष्य कहीं दिखाई देता है क्या ? वास्तविकता तो यही है कि एक विदेशी भाषा-अंगरेज़ी लगातार मंच पर छाती चली जा रही है और हमारी अपनी भारतीय भाषाएं निरंतर दूर पार्श्व की ओर सरकती जा रही हैं।
आम भारतीय हिन्दी या मातृ-भाषा में ही धरती पर आता है । उसी में जीता है । जाना जाता है । जागता है । जगाता भी है और ये सारे बोध उसे उसी भाषा में एक सौगात के रूप में होता है । उसे दुनिया, समय और समूची अवधारणाओं को जानने-परखने के लिए और उसके बरक्स अपने जीवन-संघर्ष में सफल होने की दृष्टि उसकी अपनी भाषा में ही उपलब्ध होती है पर जिस तरह से समकालीन भारतीय परिवेश गवाही देती हैं - आम जरूरतों की शासकीय कार्यप्रणालियाँ उसके दुख दर्द का अनुवाद ही जान पाती हैं। आजादी के 6-7 दशक बाद भी हमारे न्यायालय, केंन्द्रीय कार्यालयों में कामकाज की भाषा हिन्दी नहीं बन सकी है । जिस अंगरेज़ी को जनता-समझती नहीं- उस भाषा में उसे सामाजिक न्याय कैसे मिल सकता है। उसका मन भयमुक्त रह सकता है ? भले ही उसे रोटी जुगाड़ की भाषा के रूप में देखा क्यों न जाय । ऐसे समय में जब आर्थिक शोषण के हिडन एजेंडे वाले विश्वग्राम और विश्व बाजार का सिद्धांत सभी देशों में लादे जाने का दुष्चक्र चल रहा हो भारतीयों, विशेष कर हिंदी भाषियों के लिए जटिल और कठिन संघर्ष का दौर शुरू हो चुका है । क्योंकि हम सभी जानते हैं कि वैश्विकता के बहाने कुछ शक्तियाँ अपनी भाषा, और उस भाषा के माध्यम से अपनी संस्कृति को ही सभी देशों में थोपने की विश्वव्यापी बिसात बिछाने लगे हैं ।
क्या शिक्षाशास्त्रियों एवं लेखकों को इस समय धिक्कारने का मन नहीं होता- जिनकी कोताही से अब तक हमारी युवा पीढ़ी को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के पाठयक्रम उसकी अपनी भाषा या हिन्दी में सुलभ नहीं हो सके हैं। हमारे अनुवादक इतने वर्षों में आखिर करते क्या रहे हैं ? यदि चिकित्सा शास्त्र, गणित, तकनीक को बिना अंगरेज़ी के नहीं समझा जा सकता हैं तो यह अंगरेज़ी की ताकत का नहीं वरन हमारी भाषिक अक्षमता व कोढ़ीपन का जीवंत प्रमाण है और जिस कलंक से उबरने के लिए न तो हमारी पुरानी पीढ़ी ने दबाब बनाया न ही हमारे प्रजातांत्रिक आकाओं ने अपने समर्पणभाव और ईमानदारी को शिद्धत से साबित किया । भारतीय शिक्षा का समकालीन भाषिक सच है कि उच्च शिक्षा के लिए अंगरेज़ी अनिवार्य शर्त्त बन चुकी है। क्या यह शुभ है ? सुखद है भारतीय मनीषा के लिए ? यह कुतर्क कौन लगातार हमारी मनीषा में बैठाये जा रहा है कि अंगरेज़ी ही ज्ञान-विज्ञान की भाषा है, वही विश्वभाषा है । और रोजी-रोटी भी अंगरेज़ी से ही सम्भव है । आधुनिकता और विकास का रहस्य अंगरेज़ी के पिटारे में ही बंद पड़ा है । और उसे भारतीयों को जितना जल्दी हो सके खोल लेना चाहिए । यह कैसी मंदमति है, कैसा दर्शन है कि अंगरेज़ी को त्याग देने से भारत पिछड़ जायेगा । आधुनिकीकरण और विकास के पहिये थम जायेंगे या भारत सभी प्रतिस्पर्धात्मक क्षेत्रों में दुनिया का मुकाबला नहीं कर पायेगा । क्या यह सच है कि जिस देश में अंगरेज़ी नहीं है, वहाँ के लोग-बाग पिछड़े हैं या भारत से कम शिक्षित और कम सम्पन्न हैं ? शायद नहीं । कदापि नहीं । फिर भी विडम्बना देखिए कि अंगरेज़ी जो पहले सिर्फ राजधानियों और शहरों में विराजमान थी अब गाँव-गली-चौपालों में पालथी मार कर जा बैठी है । नयी पीढ़ी उसकी चपेट में जा चुकी है । इसे देखकर क्या हिंदी का भविष्य दिखाई नहीं देता ? जहाँ तक देश में हिंदी में उच्च शिक्षा की स्थिति का है वह दयनीय है । कहने में बड़ा शर्म होता है - हमारे विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में हिंदी और भाषा- विज्ञान की कक्षाओं में प्रवेशार्थियों की संख्या निरंतर सिकुड़ रही है । लगभग राज्यों में प्राथमिक शालाओं में कक्षा पहिली से अंगरेज़ी की अनिवार्यता लादी जा रही है । चतुर्दिक अंगरेज़ी माध्यम के स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह पनप रहे हैं । वर्तमान की इन प्रवृतियाँ क्या साबित नहीं करती कि हिंदी का भविष्य ज्यादा दिन सुरक्षित नहीं है ?
लेखन और प्रकाशन के कोण से हिंदी का अनुशीलन करें तो निश्चित रूप से पिछली सदी लेखकों, प्रकाशकों और पत्रकारों की सदी के रूप में दिखाई देती है परंतु अजीब विडंबना भी कि इस सदी में पाठकों की संख्या निरंतर घटती चली गई है । वैसे यह प्रश्न सिर्फ हिंदी भाषा का ही मुँह नहीं चिढ़ाता है । पाठकीयता में गिरावट वर्तमान दुनिया और हमारे समय की बड़ी त्रासदी है । यद्यपि दृश्य माध्यमों से भी हिंदी का विस्तार अहिंदी ज़मीन तक हो सका है पर उसने हिंदी की उजास को काफी धुँधलाया है । इसमें मीडिया द्वारा हिंदी की मूल आत्मा को त्याग कर अंगरेज़ी मिश्रित भाषा को विस्तृत करने की बाजारवादी हरकत भी सम्मिलित है । हाँ, इस दरमियान हिंदी लेखन विस्तृत हुआ है - कम से कम परिमाणात्मक गति से । साहित्य को लेकर परीक्षण करें तो निश्चितः हिंदी को नया चोला मिला है। वह कई नवीन विधाओं में मुखरित हो रही है। इसमें नवगीत, लघुकथा, हाइकु, सॉनेट, ग़ज़ल, व्यंग्य जैसी सर्वमान्य विधाओं को गिना सकते हैं फिर भी यह कम आश्चर्यजनक नहीं कि हिंदी की मारक क्षमता का असर वृहत्तर समाज में नहीं दिखाई देता । अब तो मातृभाषा-गौरव को तिलांजलि देकर उसे आस्थारहित बनाया जा रहा है । कितना अजीब समय है जब मातृभाषा का प्रश्न हाशिए में चला गया है । कहने को साहित्येतर विषयों में भी विपुल साहित्य उपलब्ध हो चुका है । एक ओर बड़ी पत्रिकाएं शिथिल हुई हैं तो दूसरी और नयी प्रौद्योगिकी के विस्तार से लघु-पत्रिकाओं की संख्या में भी गुणातीत वृद्धि हुई है । यह दीगर बात है कि इन पत्रिकाओं के पाठक केवल साहित्यिक रूझान वाले हैं या फिर गंभीर पाठक है । कहने को हिंदी अखबार अब महानगरों की सीमा लाँघकर छोटे-छोटे शहरों और कस्बों से भी आने लगे हैं और इससे सुदूर गाँवों के हिंदी-पाठकों को पर्याप्त मुद्रित सामग्री भी निंरतर उपलब्ध होने लगी है । पर वहाँ निरक्षरता आज भी चुनौती बनी हुई है । जहाँ तक विदेश में बसे पाठकों के लिए समाचार और विचार की उपलब्धता का सवाल है वह नेट संस्करणों से धीरे-धीरे हल होता दिखाई देने लगा है ।
इंटरनेट की बात चली है तो हिंदी के प्रांरभिक दौर के पोर्टल्स और वेबसाइट्स भी हमें चितिंत करने लगती हैं । भले ही अंतरजाल पर हिंदी की विविध सामग्री बड़ी संख्या में दिखाई देने लगी है पर वहाँ हिंदी का एक विकृत स्वरूप भी विकसित होने लगा है । न वहाँ व्याकरण का आदर्श है न मानक भाषा के प्रति श्रद्दा । चिंता इसलिए कि अंतरजाल पर आने वाली नयी पीढ़ी इसे लेकर कहीं से गंभीर नहीं है । और जानकार पीढ़ी उससे दूर ठिठकी खड़ी है । संकोच भाव से । प्रतिस्पर्धी भाव से भी । ब्लॉग की सुविधा से हिंदी के पृष्ठ भी बढ़े हैं पर एक उच्छृंखल भाषा भी वेबाध गति से वहाँ पनप रही है और यदि यही स्थिति रही तो इसमें कोई दो मत नहीं कि भविष्य में हिंदी अपने मूल स्वरूप को ही कहीं बिसार न दे और यही तो शक्तिशालियों की भाषा में सोचा जा रहा है ।
हिंदी के आगत और अनंत को आँकते समय यह भी जरूरी है कि हिंदी भाषी समाज की चुनौतियों का भी जायजा लिया जाय । गुण-दोषों के परिज्ञान के बाद भी हिंदी भाषी समाज अनेक आपदाओं से घिरता चला जा रहा है। उसके सामने आज सबसे अहम चुनौती है कि अगली शती में उसके बच्चे किस भाषा में जियेंगे ? वे किन मूल्यों को लेकर गतिमान रह सकेंगे। उपभोक्तावाद उनकी संवेदनाओं को किन आँखों से देखेगा । आज साफ-साफ दिखाई देने लगा है कि हिंदी भाषी समाज के लगभग सारे प्रतिमान ध्वस्त हो रहे हैं । मनुष्य की मूल्यवत्ता या स्थिरता क्षीण हो चुकी है । शब्द को छवियों और कृत्रिम चीज़ों ने बहुत पीछे धकेल दिया है । सच तो यह भी है कि उसकी अस्मिता के सामने संकट गहरा चुका है और ऐसे संकटकालीन परिस्थितियों में यदि साहित्य से आत्मीय लगाव भी समाप्त हो जाता है, जैसा कि हम देखने को विवश है, तो फिर भाषा में जीने का कौन-सा उपाय बचा रहेगा ।
विश्व हिंदी सम्मेलन और कुछ प्रश्न इस माह की 13 तारीख से तीन दिनों तक न्यूयार्क में विश्व हिदी सम्मेलन हो रहा है । सांस्कृतिक दृष्टि से इसे भारत की वैश्विक संकल्पना, चेतनात्मक आत्मबोध और विश्व मानव का पवित्र संदेश भी कहा जाना चाहिए । यदि इसे अर्थशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो आयोजकों अर्थात् भारत सरकार ने जिस तरह से प्रतिभागिता का मापदंड़ निर्धारित किया है वह हिंदी के वास्तविक आराधकों और सेवकों के लिए दुष्कर है । प्रचार-तंत्र के मांत्रिक लोग अपनी चतुराई से प्रायोजकों को पटाकर वहाँ पहुँचने में न केवल सक्षम हैं वरन वे ही वहाँ विश्व मंच पर विविध संगोष्टियों में शेखी बघारते नज़र आयेंगे । वे भी सिर्फ प्रिंट जगत् के तथाकथित वरिष्ठ और महत्वपूर्ण लोग । आज की तिथि तक किसी को नहीं पता कि नये ज़माने में हिंदी को सबसे तेज गति से दुनिया में फैलाने वाली वेबमीडिया और अन्य कला माध्यमों के किसी वास्तविक विशेषज्ञ या सेवक को वहाँ पहुँचने को कहा गया है जो उसकी संभावना और दिशा पर सम्यक बात रख सके ।
एक से डेढ़ लाख खर्च किये बिना वहाँ जाने की कल्पना नहीं की सकती । माना कि आप पहुँच भी गये तो आपको केवल ताली ही बजानी है । आपके द्वारा सार्थक हस्तक्षेप के अवसर की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती। भारत सरकार ने राज्य सरकारों को लिखकर छुट्टी कर ली है। अब राज्य सरकार की मर्जी कि वे अपने राज्य के किसी हिंदी सेवियों को वहाँ हिंदी की आवाज़ बुलंद करने भेजें या नहीं । आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। कुछ राज्यों को तो कुछ भी नहीं लेना देना - हिदीं चाहे जहाँ जाये (भाड़ तो नहीं कह सकता ना) कई राज्य सरकारों में मुँहदेखी बंदरबाँट करने की खबर आ रही है । अब आयोजकीय धर्म के निर्वहनकर्ताओं को कौन समझाये कि सच्चे और ईमानदार हिंदी सेवी और साहित्यकारों का अफसरानों या नेता-मंत्रियों से चोली-दामन का साथ तो होता नहीं । जो वो बिना बोले ही लौटा दें । बात छोटी-सी है पर यही इस आयोजन के उद्देश्यों की विश्वसनीयता का संकट है । विश्व हिंदी सम्मेलन की जो सूचनात्मक वेबसाइट विश्व भर में दिखायी जा रही है उसमें सारी जानकारी है (खास तौर पर हिंदी को सच्चे मायने में वैश्विक बनाने में संलग्न ब्लॉग की चर्चा और इसके लिए पुनः एक बार बालेंदु जैसे प्रबुद्ध प्रौद्योगिकी कार्यकर्ता का स्मरण भी करना चाहिए)पर वहाँ इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि वहाँ किन महान हिंदी सेवकों(?) का सारा खर्च आयोजक (विशेषतः भारत सरकार या विदेश मंत्रालय)वहन कर रहे हैं । जिनका न्यूयार्क के वैश्विक मंच में उनकी उल्लेखनीय सेवा के लिए प्रतीकात्मक सम्मान होने जा रहा है वे कौन लोग हैं ? उनका चयन किसने किया ? किस आधार पर चयन किया गया ? इस प्रसंग में एक खास अप्रजातांत्रिक बात यह भी काबिले गौर है कि ऐसे मौकों पर ग़ज़ल गायन और सितार वादन तो हो पर कबीर, तुलसी, रहीम, मीरा के पदों को गा-गाकर हिंदी का साम्राज्य विस्तार करने वाले कलाकारों की सुधि ही न रखी जाय । जबकि आज भी सारे विश्व में यही हिंदी के नाम पर सर्वमान्य और प्रसिद्ध हैं । हिंदी को वैश्विक सिर्फ शाब्दिक ही नहीं बना रहे हैं या नहीं बना सकते, इसमें लोकगायकों, लोकनर्तकों, तकनीक सृजनकर्ताओं, शोधकर्ताओं आदि को भी याद किया जाना चाहिए जो अनेक माध्यमों से हिंदी को संसार भर में पहुँचा रहे हैं ।
यूँ तो इस वेबसाइट की सारी बातें पारदर्शी हैं पर जो नहीं है उसे लेकर विश्व भर में फैले हिंदी सेवियों के मन में कोई प्रश्न उठे तो उसका कोई जबाब यहाँ नहीं है । वैसे यह भारत जैसे महादेश के संप्रभुता संपन्न सरकार की विशेष दृष्टि का प्रतिफल है । माना कि हिंदी को विश्व भाषा का दर्जा दिलाने के लिए व्यक्तिगत तौर पर हिंदी सेवी भी उत्तरदायी हैं और उनका विमर्श-सम्मेलन में स्वतःस्फूर्त होकर पहुँचना भी लाजिमी हो सकता है किन्तु क्या ऐसे लोगों तक ऐसी सूचना पहुँचाने का कोई व्यवहारिक प्रयास किया गया ? शायद नहीं । खासकर उन दूरदराज के हिंदी सेवियों, साहित्यकारों को इस आयोजन की कोई सूचना नहीं है जो संसाधन से लैश शहर से दूर किसी गाँव-कस्बों में बसते हैं और हिंदी के विकास में तिकड़मी साहित्यकारों से कहीं अधिक योगदान भी दे रह हैं । हिंदी को विश्वभाषा बनाने का सपना देखने वाले एवं आयोजन से जुड़े किसी भी इकाईयों ने इन्हें याद करना उचित नहीं समझा। हाँ, इन इकाईयों के बीच यह द्वंद्वात्मक स्वर जरूर उभरता रहा कि कैसे ‘अपने लोगों’ को विश्व हिंदी सम्मेलन में ले जाया जाय । कुल मिलाकर यह महानगरों के हिंदी विशेषज्ञों(?) और लखपति हिंदी सेवियों को न्यूयार्क में अधकचरा विमर्श करने या फिर बिना अवसर जाने करतल ध्वनि करने का त्यौहार जैसा लगता है ।
भारत सरकार को यदि छोड़ भी दें तो अमेरिका के आयोजकों, हिंदी सेवी संगठनों, हिंदी प्रेमी धनबली-प्रवासी भारतीयों में से किसी को भी हिंदी संस्कृति का मुख्य लक्षण यानी अतिथि देवो भवः का मूलमंत्र याद नहीं आ सका । यदि ऐसा होता तो वे कम से कम घर फूँक कर न्यूयार्क पहुँचने वाले दीवाने साहित्यकारों के सिर छुपाने के लिए कोई निःशुल्क छत जरूर ढूँढ लेते । तीन दिनों के दाना-पानी का पैसा भी पंजीयन के नाम पर पहले नहीं मांग लिया जाता । ऐसे में आम हिंदीभाषी कैसे विश्वास कर लें कि विदेशों में हिंदी के प्रति दीवानगी है, वहाँ हिंदी शिक्षण के प्रति आग्रह है, वे भी संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा के रूप में हिंदी को देखने में उत्सुक हैं ?
ऐसे मौकों पर मेरे जैसे देहाती सोच वाले व्यक्ति का मन सशंकित हो तो क्या यह अतिरिक्त है या एकतरफा ही है कि क्या ऐसे आयोजनों या आयोजकों के बल पर विश्व मानव परिवार की भावना सुदृढ़ हो सकेगी ? राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की उपलब्धि पर सार्थक चर्चा संभव है ? विश्व हिंदी विद्यापीठ की स्थापना कब तक हो सकेगी ? विश्व भाषा हिदीं के उत्थान हेतु सचिवालय की स्थापना कैसे होगी ? विभिन्न देशों में हिंदी पीठों की स्थापना कौन करेगा ? विश्वव्यापी भारतवंशियों से हिंदी को संपर्क भाषा बनाने का अनुरोध कौन करेगा और उसे कौन मानेगा ? विभिन्न स्तरों पर हिंदी पठन-पाठन की व्यवस्था किसके बल पर होगी ? हिंदी के वैश्विक प्रचार-प्रसार, अनुप्रयोग तथा प्रयोजनों पर अनुसंधान करने कौन आगे आयेगा ? आदि-आदि। जो भी हो, यह सम्मेलन कोई विश्व उत्सव न बन जाये इस पर निगरानी जरुरी है। व्यक्तिगत तौर पर और आयोजकीय नैतिकता से भी । विश्वास तो किया ही जाना चाहिए और अपेक्षा भी ।
स्वर का आलोक यानी आदित्य प्रकाश सिंह हिंदी के महत्वपूर्ण कवि और दिनमान के पूर्व संपादक स्व. श्रीकांत वर्मा ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में एक बार अपने व्याख्यान में कहा था कि हिंदी का विकास शासकीय या संस्थागत प्रयासों से भी उतना नहीं हो सकता जितना व्यक्तिगत आत्मीयता और समर्पण से । इस भविष्यवाणी से किसी को आपत्ति या शंका नहीं हो सकती । सच तो यह है कि हिंदी ऐसे व्यक्तिगत प्रयासों और उद्यम से ही वैश्विक बनती जा रही है । अंतरजाल में निरंतर शोधात्मक विचरण के बावजूद मैंने कभी सोचा नहीं था कि अचानक किसी दिन लाखों किमी दूर देश से किसी अपरिचित किन्तु गंभीर हिंदी सेवी का टेलिफोन आयेगा । पर पिछले दिनों जब अमेरिका के डलास शहर के शास्त्रीय व्यक्तित्व के धनी श्री आदित्य प्रकाश सिंह का फोन आया तो वह मेरे लिए किसी अचरज से कम नहीं था ।
श्री सिंह डलास शहर से संचालित रेडियो चैनल – रेडिया सलाम नमस्ते से संबंद्ध हैं । संबद्ध क्या हैं रेडियो माध्यम से विश्व भर के हिंदी सेवियों को एक मंच पर लाने का महान कार्य कर रहे हैं । सिंह मूलतः बिहार के हैं । उनकी दृष्टि बड़ी पैनी है । जितनी दृष्टि पैनी है उतने ही वे सरस हैं । हिंदी की सैकड़ों कविताएं याद हैं उन्हें । सिर्फ इतना ही नहीं विशुद्ध संस्कृत में भी वे वार्तालाप कर सकते हैं । वे पुरानी पीढ़ी द्वारा दी जाने वाली भाषा शिक्षा को याद करते हुए बताते हैं – पिता जी संस्कृत के विद्नान थे । स्कूल से घर आते ही उनसे संस्कृत में वार्तालाप करते थे । जाने-माने कवि गोपाल सिंह नेपाली का उनके पिताजी के साथ आत्मीय संबंध था । श्री सिंह पिछले 10 साल से विदेश में रहकर रहे हैं पर वे किसी हिंदी सेवी या साहित्यकार से बातचीत किये बिना कोई भी दिन अपने हाथ से नहीं जाने देते । वे खुद ही फोन नम्बर ढूँढ-ढाँढ कर संपर्क करते हैं, भले ही सामने वाला किसी भी देश में क्यों न हो, भले ही | ||||||||||