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क्रोध प्रो. महावीर शरन जैन
क्रोध के कारण संघर्ष एवं कलह का वातावरण बनता है। क्रोध में अंहकार एक उर्वरक का काम करता है। इस दृष्टि से क्रोध एवं अंहकार एक दूसरे के पूरक हैं। क्रोधी मनुष्य की मानसिक शान्ति नष्ट हो जाती है। विवेकपूर्ण कार्य करने की स्थिति समाप्त हो जाती है। क्रोध के कारण कोई व्यक्ति दूसरे का उतना अहित नहीं कर पाता जितना अहित वह स्वयं अपना करअंहकार से प्रेरित होकर व्यक्ति अपने को सब कुछ समझने लगता है । उसमें अपने आपको बड़ा मानने तथा दूसरों को अपने से छोटा समझने की चेतना विकसित होती है । वह सोचता है कि दूसरे व्यक्तियों का अस्तित्व और विकास उसकी इच्छा पर निर्मर है । इसी अहंकार के कारण वह समाज के सदस्यों से यह अपेक्षा करने लगता है कि सब उसके ही इशारों पर चलें । सब उसके स्वार्थ की सिद्धि में सहायक हों । जब कोई व्यक्ति स्वतंत्र निर्णय लेकर अपनी मर्जी से चलना चाहता है अथवा उसके स्वार्थ की पूर्ति नहीं करता है तो वह आहत हो उठता है और उसका क्रोध जाग जाता है । यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि क्या क्रोध सर्वथा त्याज्य है । क्या समाज की व्यवस्था तोड़ने वाले व्यक्ति पर क्रोध नहीं करना चाहिए । अन्याय एवं अनाचार के प्रति आक्रोश करने एक बात है तथा अहंकार के कारण क्रोधित होना दूसरी बात है । समाज की व्यवस्था एवं नियम के विपरीत आचरण करने वाले व्यक्ति पर सामाजिक न्याय की भावना के कारण क्रोधित होने वाली मानसिकता अहंकार की भावना से उत्पन्न क्रोध की मानसिकता से भिन्न होती है । अपने सामाजिक जीवन के दायित्व-बोध के आधार पर आचरण करने तथा क्रोध एवं अहंकार के वशीभूत आचरण करने में अंतर है । अंहकार से क्रोधित व्यक्ति जब किसी का विनाश करना चाहता है तब वह अपना विवेक खो देता है । जब कोई व्यक्ति सामाजिक भावना से प्रेरित होकर सामाजिक विकास में बाधक बनने वाले असामाजिक एवं दुष्ट व्यक्तियों का दमन करता है तो वह अनपे विवेक को कायम रखता है । वह दुष्ट व्यक्तियों का दन इसलिए करता है जिससे सामाजिक व्यवस्था कायम रह सके ।
गीता में कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया है कि क्रोध से अविवेक एवं मोह होता है, मोह से स्मृति का भ्रम होता है तथा बुद्वि के नाश हो जाने से आदमी कही का नहीं रह जाता ।गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध करने के लिए प्रेरित करते हैं, अन्याय का प्रतिकार करने के लिए बार-बार कहते हैं किन्तु दूसरी तरफ युद्ध में कूद जाने की प्रेरणा देनेवाले श्रीकृष्ण क्रोध से बचने के लिए सर्वत्र सावधान करते हैं। गहराई से विचार करने पर इस प्रतीयमान अंतर्विरोध का रहस्य इस तथ्य में निहित है कि लोकमंगल की साधना के लिए अन्याय का प्रतिकार करने तथा क्रोधित होकर दूसरे का नाश करने के लिए तत्पर होने में बहुत अन्तर है ।
क्षमा प्रो. महावीर सरन जैन
क्षमा 'क्षम' धातु से बना है। इसके दो मुख्य अर्थ हैं। एक अर्थ में क्षमा का अर्थ है धैर्य, सहनशीलता एवं विनम्रता। दूसरे अर्थ में क्षमा सामर्थ्यवाचक है- सहने योग्य होना अर्थात् पर्याप्त सक्षम होना। क्षमाशील व्यक्ति धैर्यवान होता है, विनम्र होता है एवं अत्यन्त सहनशील होता है। क्षमा कायरता नहीं है। क्षमाशील व्यक्ति समर्थ एवं सक्षम होता है। दु:ख पहुँचाने वाले व्यक्ति को वह प्रताड़ित कर सकता है, किन्तु अपनी क्षमावृत्ति के कारण वह उस दु:ख को सहन करता है, विनम्र रहता है। वह क्रोध को शान्ति के साथ जीतता है। क्षमा का पालने करने वाला व्यक्ति यदि कभी अन्याय का विरोध करता भी है तो भी उसका मार्ग क्रोध का मार्ग नहीं होअपने मन में इसी कारण वह किसी के प्रति कभी बैर नहीं बाँधता। इस प्रकार यदि उसे दुष्टता एवं अन्याय का प्रतिरोध करना पड़ता है तो भी उसके मन में किसी के प्रति शत्रुता का भाव उत्पन्न नहीं होता। यदि कभी कहीं शत्रुभाव उत्पन्न हो भी जाता है तो भी वह अपनी क्षमा वृत्ति के कारण उस भाव का शमन कर लेता है । इस प्रकार मन की गाँठों को बाँधता है, प्रतिकार की भावना, कठोरता, दयाहीनता एवं हिंसा आदि प्रवृत्तियों को विकसित करता है । क्षमा मन की गाँठों को खोलती है तथा दया, सहानुभूति, संतोष, उदारता, प्रेम, मानशून्यता एवं वैराग्य की प्रवृत्तियों को विकसित करती है ।
‘उत्तम क्षमा’ मन की सहज प्रवृत्ति है । जब हम व्यक्तिगत रागद्वेष की सीमाओं से ऊपर उठ जाते हैं तथा संसार के सभी प्राणियों के प्रति मैत्री-भाव एवं आत्म-तुल्यता की प्रतीति करने लगते हैं तो क्षमा का भाव हमारे जीवन का सहज अंग बन जाता है । मध्य कोटि की क्षमा वह होती है जहाँ हम आत्मतुल्यता की भावना से प्रेरित होकर नहीं अपितु उपेक्षा-भाव से प्रेरित होकर दूसरों को क्षमा करते हैं । जब हम हम की सहज भावना से नहीं अपितु किसी स्वार्थ से प्रेरित होकर अथवा भय की भावना के कारण क्षमा का प्रदर्शन करते हैं अथवा क्रोधित नहीं होते तो इस प्रकार की क्षमा अधम कोटि की क्षमा है । हमें यह प्रयास करना चाहिए जिससे क्षमा की वृत्ति हमारी मानसिकता का एक अभिन्न अंग बन सके ।
सामाजिक जीवन के लिए क्षमावृत्ति अनिवार्य है । सामाजिक सद्भाव एवं पारस्परिक बंधुत्व की भावना के लिए क्षमावृत्ति अनिवार्य है । क्षमा याचना के आधार पर वह समाज के अन्य सदस्यों के प्रति अपनी प्रेम-भावना का विकास करता है, उसके जीवन में आस्था और विश्वास का संचार होता है ।
(सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान) 123, हरि एन्कलेव, चांदपुर रोड, बुलन्दशहर - 203001
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