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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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  एकांकी

 

दंश से छुटकारा


संतोष खरे

 

 

पात्र परिचय
1.
धड़कन एवं पीडि़त: कविगण
2.
महेश: कहानीकार
3.
चंद्रकान्त: उपन्यासकार
4.
उप्पल: आलोचक
5.
कु. प्रतिमा: कहानी लेखिका एवं कवयित्री
6.
बैरा

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(स्थान- एक रेस्तरां, समय-शाम)
(
धड़कन, पीडि़त और उप्पल रेस्तरां की टेबिल के आसपास बैठे हैं सबके हाथ में सिगरेट है।)


उप्पल: तो बंधु, आज हम सबके सामने अस्तित्व का संकट है। आज तक मेरी एक भी पुस्तक नहीं छपी। मैंने इतनी आलोचनाएं लिखी हैं कि उनके कई संकलन प्रकाशित हो सकते हैं। हर साहित्यकार की प्रशंसा और निंदा एक साथ लिखकर मैंने पृष्ठ के पृष्ठ भर डाले हैं पर मैं अभी तक स्थापित नहीं हो पाया।
पीडि़त: निन्दा और प्रशंसा एक साथ? कुछ बात समझ में आई नहीं बंधु
उप्पल: यार, तुम हो मंच के कवि, कुछ ऊपर उठो भाई। मंच पर कविता पढ़ देना या स्थानीय समाचार पत्रों में कविता छपवा लेना तुम्हारी साहित्य यात्रा का लक्ष्य नहीं होना चाहिये। माना मंच से तुम्हें पारिश्रमिक अच्छा मिलता है और केवल तीन-चार कविताओं के बल पर तुम पिछले पाँच वर्षो से जमे हुए हो पर इससे तुम्हें साहित्य में स्थान नहीं मिलेगा। क्यों भाई धड़कन? (उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना) मैंने इससे शुरू में ही साहित्य की राजनीति में खुलकर भाग लेने को कहा था और आज इसकी कई रचनाए छप चुकी हैं।
पीडि़त: साहित्य की राजनीति! मैं समझा नहीं!!
उप्पल: भई, आजकल साहित्य में राजनीति की तरह गुटबाजी चलती है। यदि तुम किसी गुट में रहोगे तभी तुम्हें लोग पूछेंगे। इसी कारण मैं एक ही साहित्यकार की प्रशंसा व निन्दा लिखकर तैयार रखता हूँ। जब जैसी आवश्यकता हो उसका उपयोग करता हूँ। धड़कन को ऊचा उठाने में उसकी कविताओं से अधिक उन पर लिखी गयी मेरी आलोचना का महत्व है। अरे वो चन्द्रकान्त व महेश अभी तक नहीं आये?
धड़कन: अब वे आते होंगे। आज की चर्चा का दारोमदार तो चन्द्रकान्त पर ही है। बहुत दिनों बाद फँसा है। आज माल छनना चाहिए गुरू!
उप्पल: उसकी तुम चिन्ता न करो। तब तक एक-एक कॉफी पीडि़त की तरफ से हो जाये क्यों पीडि़त?
पीडि़त: हाँ हाँ । क्यों नहीं? (बैरा को आवाज देता है। बैरा आता है। पीडि़त उसको तीन कॉफी का आर्डर देता है)
उप्पल: तो पीडि़त जी। कुछ करो भाई। तुम मिलते ही नहीं। कॉफी हाउस में बैठ कर बड़े-बड़े साहित्यकार लम्बी चर्चाएं करते हैं पर तुम्हारा पता ही नहीं रहता।
पीडि़त: मैं भी यही सोचता हूँ गुरू। कुछ रास्ता बताओ। तुम तो ग्रेट हो।
(
तीनों हंसते हैं। बैरा कॉफी लेकर आता है। तीनों कॉफी सिप करते हैं। और नई सिगरेट सुलगाते हैं।)


धड़कन: यार। हम कुछ नहीं कर पाये। जिंदगी में ससुरा फ्रस्ट्रेशन बहुत है।
उप्पल: अरे, तुझे कैसा फ्रस्ट्रेशन! तेरी तो अच्छी खासी नौकरी है। दस हजार से ऊपर ही पड़ जाता होगा। ऊपरी आमदनी अलग।
धड़कन: वह तो ठीक है। पर कविता के लिये फ्रस्ट्रेशन बहुत जरूरी है न। तुमने ही तो कहा था। सो मैं कविता लिखते समय बड़ा फ्रस्ट्रेशन अनुभव करता हूँ?
उप्पल:खैर वह तो ठीक है, तुम्हारी कविताएँ और कहाँ-कहाँ स्वीकृत हुई हैं?
धड़कन:हाँ यार। पिछले वर्ष तुमने उस लघु पत्रिका में दो कविताएँ प्रकाशित करवा दी थीं। उसके बाद एक और पत्रिका ने छापा था पर संपादक ने वार्षिक शुल्क भेजने को भी लिखा था। वह भी भेज दिया था। जब दूसरी कविता भेजी तो उसने ग्राहक बनाने की रसीद बुक भेज दी, जो अब तक खाली पड़ी है। एक भी ग्राहक नहीं बना पाया। कोई बनता ही नहीं। संपादक को कविता के बारे में लिखता हूँ तो कमबख्त ग्राहक बनाये जाने के बाबत पूछता है।
उप्पल: धैर्य रखो भाई। सब ठीक हो जायेगा।
(
महेश व चन्द्रकान्त का प्रवेश)


उप्पल: आओ बंधुओं। बड़ा विलम्ब किया।
चन्द्रकान्त: मैं तो समय से निकला था पर इस महेश ने रास्ते में देर करवा दी। बोला, प्रतिमाजी को भी ले लो। उसके हाँ गये तो चाय पानी होने लगा। थोड़ी देर में वह भी आ रही हैं।
(
उप्पल पीडि़त और धड़कन उत्साहित हो कर वाह कर उठते हैं पर महेश के घूरने पर सहम कर चुप हो जाते हैं।)


उप्पल: प्रतिमा काफी दिनों बाद अपनी महफिल में आ रही हैं। स्वागत अच्छा होना चाहिये चंद्रकान्त जी!
चन्द्रकान्त: अवश्य! (मुस्कराकर) प्रतिमा रोज आये तो मैं रोज स्वागत कर सकता हूँ। लेकिन उसकी तो केवल महेश से पटती है।
महेश: (एक ठंडी सांस लेकर) क्यों जख्मों पर नमक छिड़कते हो चन्द्रकांत जी! अब तो कभी कभार ही भेंट होती है। जब से वह ठेकेदार का लड़का मारुती स्विफ्ट लेकर उसके यहाँ आने लगा है मैं उपेक्षित हो गया हूँ मेरा तो दिल ही टूट गया है। मेरे अंदर ढेर सी कुंठाए पैदा हो गई हैं। मैंने क्या-क्या सपने संजोये थे। अब तो सुना है उसकी ठेकेदार के लड़के से सगाई की बात चल रही है। (रुआसा हो जाता है।)
चंद्रकान्त: बन्धु हम साहित्यकारों की यही नियति है। हम जो कुछ प्राप्त करना चाहते हैं वह हमें मिलता नहीं और जो हम नहीं चाहते वह हम पर जबरदस्ती थोप दिया जाता है। हमारी सामाजिक व्यवस्था इसके लिये दोषी है। इधर मैं एक उपन्यास व्यवस्था के खिलाफ लिख रहा हूँ। मेरा नया उपन्यास..।
उप्पल: (टोककर) हम लोगों को महेश के साथ सहानुभूति है। महेश! कहो तो आज प्रतिमा जी से इस संबंध में कुछ कहें?
महेश: (घबराकर) नहीं! नहीं। कुछ मत कहो (फिर एक लम्बी सांस लेकर) मैं पूरी तरह टूट चुका हूँ। अब मुझे कुछ नहीं चाहिए (कुछ जोश से) मैं अपनी कहानियों में अपना सारा आक्रोश और दुख भर दूँगा मैं जीवित हूँ यही क्या कम है!
(
अचानक प्रतिमा का प्रवेश। सब मुड़कर उसकी ओर देखते हैं। प्रतिमा बैठती हैं)
प्रतिमा: कहिये क्या चल रहा है?
उप्पल: बस! आपकी प्रतीक्षा थी। आपने बहुत दिनों बाद दर्शन दिये। आपकी कहानी प्रेम का तूफान मैंने नारी संसार के महिला कथा विशेषांक में पढ़ी थी। आपकी कहानी बहुत जोरदार रही प्रतिमा जी। आपने कितनी आदर्शवादी कहानी लिखी है। आपकी कहानी की नायिका रुपया, जायदाद और मालदार मंगेतर को छोड़कर अपने निर्धन साहित्यकार के साथ चली जाती है। बधाई, प्रतिमा जी।
प्रतिमा: धन्यवाद! बहुत-बहुत धन्यवाद!!
महेश: (धीमे से) लिखने और उसे जीवन में उतारने में बहुत अंतर है।
प्रतिमा: (महेश को गौर से देखते हुए) ठीक कहते हो महेश। हममें से कितने साहित्यकार ऐसा करते हैं। क्या उप्पल जी उल्टी सीधी आलोचना लिखकर साहित्यिक गुटबाजी नहीं करते? क्या चन्द्रकान्त जी व्यावसायिक स्तर पर सस्ते किस्म के उपन्यास छद्म नाम से नहीं लिखते? और क्या तुमने मुझसे नहीं कहा था कि तुम एक साभ्रांत घर के लड़के हो।
(
सब चुप हो जाते हैं। कुछ क्षण तक कोई कुछ नहीं बोलता।)


उप्पल: खैर, छोडि़ये यह सब। कौन दूध का धुला है, आज। जब हमारे नेताओं में नैतिकता नहीं रही तो क्या हम साहित्यकारों ने उसका ठेका ले रखा है? हाँ तो आज हमारे सामने अस्तित्व का संकट है। चंद्रकान्त जी। बैरा आ गया है। (बैरा आकर खड़ा होता है। चंद्रकान्त उसे आर्डर देते हैं। बैरा जाता है।)
उप्पल: हाँ  तो, हमारे विचारों का विषय था कि हम स्थापित कैसे हों? बड़ी पत्रिकाए हमें नहीं छापतीं। न ही कोई प्रकाशक हमारे संकलन छापता है, लघु पत्रिकाओं से पारिश्रमिक नहीं मिलता। इस नगर में आठ साहित्यकार हैं पर उनमें से केवल प्रतिमाजी ही थोड़ी बहुत प्रकाशित हैं। क्या प्रतिमा जी अपने छपने के नुस्खे बतायेंगी?
प्रतिमा: हाँ। जब अनौपचारिक वार्तालाप हो रहा है तो बताने में कोई हर्ज नहीं। दरअसल, मैं बड़ी पत्रिकाओं की प्रशंसा में पत्र भिजवाती रहती हूँ। जो उसमें छपते हैं। कई पत्र छपने के बाद मैं रचना भेजती हूँ। इसके अतिरिक्त (शर्माकर) मुझे लड़की होने का लाभ तो मिलता ही है।
महेश: पत्र तो मैंने भी काफी लिखे पर कोई रचना नहीं छपी।
उप्पल: वही तो कह रहा हूँ। साहित्य की राजनीति में भाग लिये बिना कुछ नहीं होगा? हमारा लक्ष्य शीर्षस्थ पत्रिकाओं में छपना है फिर अच्छे प्रकाशन से संबंध होना। फिर पाठ्यक्रम में लगना फिर विदेश यात्रा वगैरह और इसके लिये यह बहुत आवश्यक है कि (तभी बैरा नाश्ते की ट्रे लेकर रखता है) कि पहले नाश्ता किया जाय।
(
सब लोग नाश्ता करते हैं। महेश प्रतिमा की ओर उदास दृष्टि से देखता है)
पीडि़त: भाई वार्तालाप चलता रहे।
उप्पल: हाँ  तो मैं कह रहा था कि हम सबको साहित्य में जमना है। मुझे एक आइडिया सूझा है (एक रसगुल्ला मुंह में डालता है कुछ देर तक बोल नहीं पाता) मेरा विचार है कि एक पत्रिका निकाली जाये जिसमें हम केवल अपने गुट के लोगों की रचनाएं प्रकाशित करें और गुट के बाहर के लोगों की उपेक्षा करें। आप लोगों का क्या विचार है? (सब उत्साहित होकर इस प्रस्ताव का समर्थन करते हैं) .. तो यह तय हुआ कि एक पत्रिका निकाली जाय। अब इसका संपादक कौन हो? आप लोग तय कर लें।
चंद्रकान्त: आपसे अच्छा संपादक कौन हो सकता? मेरा प्रस्ताव है कि इसका उप संपादक महेश, धड़कन और पीडि़त को बनाया जाय। और संपादकीय सलाहकार प्रतिमा जी को। रही मेरी बात तो मैं कोई पद नहीं लेना चाहता।
उप्पल: नहीं नहीं चंद्रकान्त जी! यह कैसे हो सकता!! व्यवस्थापक का पद तो आपको लेना ही होगा।
चन्द्रकान्त: ठीक है भाई। आप सब लोगों का आदेश मैं कैसे टाल सकता हूँ।
उप्पल: तो यह निर्णय बड़ा महत्वपूर्ण है। इसके जरिए साहित्य जगत में क्रांति लाई जा सकती है। शीघ्र ही हमें पत्रिका का शीर्षक रजिस्टर्ड कराना होगा। आप लोग कोई अच्छा सा नाम सुझाइये।
(
सब नाश्ता करते हुए विचार करते हैं)


धड़कन: साहित्य संसार कैसा रहेगा।
पीडि़त: साहित्य की अमरबेल।
महेश: साहित्य का भविष्य।
प्रतिमा: मेरे विचार से नाम छोटा होना चाहिए। दंश नाम कैसा है?
(
सब एक साथ वाह। क्या नया नाम है।)
चंद्रकान्त: मान गये प्रतिमाजी, आपका विचार पूरी तरह मौलिक है। दंश शब्द से जमाने भर की पीड़ा का बोध होता है यही नाम रजिस्टर्ड कराया जाय।
उप्पल: तो ठीक है। पत्रिका का नाम भी फाइनल हो गया। अब आप सब प्रारंभिक खर्च के लिये कम से कम सौ-सौ रुपये का अंशदान कीजिये ताकि रजिस्ट्रेशन की कार्यवाही शीघ्र कराई जा सके। (सब चौंक कर एक दूसरे को देखते हैं।) आज न हो तो दो चार दिन बाद भिजवा दें। (सब बुझे स्वर से हाँ हाँ कहते हैं।) चलिये आज का दिन बहुत सार्थक रहा। एक ठोस निर्णय लिया गया। अब मीटिंग समाप्त की जाय।
(
सब उठ खड़े होते हैं। उप्पल व चन्द्रकान्त जाते हैं। शेष लोग आपस में बात करने का अभिनय करते हैं।)


महेश: हमें चंदे के हिसाब पर नज़र रखनी होगी पिछली बार के आयोजन में उप्पल ने एक हजार का घपला किया था।
धड़कन: हाँ, और चंद्रकान्त और उप्पल मिलकर खाते हैं।
पीडि़त: हाँ , देखा नहीं! आज भी चंद्रकान्त ने संपादक हेतु उप्पल का नाम तुरन्त प्रस्तावित कर दिया।
प्रतिमा: वह सब तो ठीक है। पर एक पत्रिका का प्रकाशन भी तो महत्वपूर्ण है।
सब: हाँ हाँ  वह तो जरूरी है।
महेश: तो काम शुरू होने दीजिये। हम लोग पत्रिका का हिसाब देखते रहेंगे। चलिये प्रतिमा जी मैं आपको अपने स्कूटर पर छोड़ दूं।
प्रतिमा: धन्यवाद महेश जी। पर मुझे अभी एक सहेली के यहाँ  जाना है। मैं आटो से चली जाऊंगी। (जाती हैं।)
महेश: (उदास होकर) कमबख्त। कोई लिफ्ट नहीं देती।
धड़कन: यही तो आपका दंश है महेश जी।
पीडि़त: निराश न हों महेश जी। तू नहीं और सही के सिद्धांत पर चलिये और इस दंश से छुटकारा पाइये। पत्रिका निकलने भर की देर है, लेखिकाएं ही लेखिकाए नज़र आएंगी।
(
सब हसते हुए जाते हैं। पर्दा गिरता है।)

(साभार)
 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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