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वार्तालापी उपन्यास 'सिसकता जीवन' वार्तालापी उपन्यास है । वार्तालापी इसलिए, क्योंकि यहाँ हर स्तर पर वार्तालाप की लहरें उठ रही हैं । उपन्यास का सारा का सारा टैक्सचर वार्तालाप में है । समूची कथा कथोपकथनों के कंधे में सवार है । यहाँ से वहाँ तक जितने भी कथापात्र हैं, वे पाठकों के मन तक अपने कथोपकथनों के सहारे ही पहुँचते हैं, गद्यकार उनकी छवि गढ़ने के लिए कोई अतिरिक्त उद्यम नहीं करता । सच कहें तो पाठकों और पात्रों के बीच उपन्यासकार लगभग अनुपस्थित है ।
जहाँ या जिस कथात्मक विधा में रचनाकार स्वयं को गायब कर लेता है अक्सर वहाँ कथा के विविध प्रसंग ही लबालब हो उठते हैं और ऐसे में पाठकों और कथापात्रों के मध्य पूर्वपरिचित सा संबंध पनपने लगता है । दोनों में एक अंदरूनी वार्तालाप भी विकसित होने लगता है। सिसकता जीवन इसलिए भी वार्तालापी उपन्यास है । |
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सिसकता जीवन की यही शिल्प संरचना उसके कथाकार यानी त्र्यम्बक राव साटकर को कथाकार से कहीं ज्यादा एक नाट्यलेखक जैसा बना देता है । इस कोण से सोचें तो वह एक शसक्त गद्यलेखक कम किन्तु एक गद्यलेखक के रूप में एक नाट्यलेखक या रूपकलेखक के रूप में अधिक सफल नज़र आने लगता है । सिसकता जीवन एक ऐसी फिल्म है जिसके दृश्यों से गुज़रने के लिए उसे देखने की नहीं प्रत्युत मात्र पढ़ने की चेष्टा ही पर्याप्त है । मात्र कथापात्रों के कथनों से जब कोई कथाकार वातावरण का दृश्यांकन करादे तो उसे एक सफल कथाकार कहा जाना चाहिए । भले ही जिस कलाचेतना और शिल्पगत आकर्षण का मर्म अधिक संपन्न पाठक यहाँ तलाशेंगे वह कदाचित् उन्हें न मिले, पर एक कथाकार के पहले उपन्यास में ही जब किसी फिल्मी कथा सा आकर्षण पाठकों को अपनी ओर खिंचने लगे तो इसे उसकी सफलता में क्या शुमार नहीं किया जाना चाहिए ?
किसी कथा या उपन्यास की यात्रारंभ में ही यदि पाठकों को लगे कि वह कथासूत्र की डोर पकड़ चुका है। वह इसी परिचितता से कथा के भविष्य को जान लेने के बाद भी उत्सुक बना रहे, तो यह मात्र कथा की अमौलिकता का परिचायक नहीं वह एक चितपरिचित संसार की बहुसिद्ध जीवन की शाश्वतता भी कही जा सकती है । शायद यही कारण है कि सिसकता जीवन जानी पहचानी दुनिया की जानी पहचानी कथा है और दुनिया से ऐसे कथाओं की समाप्ति शायद ही संभव हो । यह उपन्यास ऐसी कथा ही है जिससे मनुष्य के रूप में लगभग हर पाठक विज्ञ है । क्योंकि वह जीवन की अनिवार्य कथा जो है । स्वयं उपन्यासकार कहता है – “ऐसा कोई भी इंसान नहीं है जिसके जीवन में दुख की परछाई न आती हो, किसी के जीवन में यह क्षणिक होता है और किसी को यह स्थायी रूप से घर कर लेता है । हर सुखी इंसान का भी जीवन कहीं न कहीं सिसकता हुआ रहता है । ऊपर से सुखी परंतु अंदर से सिसकता जीवन।”
उपन्यास का शीर्षक पढ़कर ही पहली दृष्टि में कथा का संभावित सूत्र पाठक के मन-मनीषा में उभरने लगता है – कि यह हो न हो, जीवन के कृष्णवर्णीय परिदृश्यों की कथा है । सचमुच सिसकता जीवन दुखांत उपन्यास ही सिद्ध होता है । पर इस दुखांत उपन्यास का वास्तविक अंत कथानायक अनूप की करुणात्मक मृत्यु से नहीं बल्कि उसके संतान नवजात शिशु मुन्ने के आगमन के साथ ही होता है । एक का समापन परंतु समापन के पूर्व भावी का आगमन । यही इस उपन्यास की मूल कथावस्तु है, जिसे मीना, उषा, वंशी, निशा, रायबहादूर आदि गति देते हैं । कथा में सर्वत्र मिलन और बिछुड़न की परछाई मंडराती रहती है । एक सामान्य-सी कथावस्तु प्रतीत होने के बाद भी और सामान्य सा कथानायक होने के बाद भी अनूप किस तरह अपने दुखों को छुपाता है, खासकर अपनी बहन से, यह भाई-बहन के मध्य प्यार और स्नेह का दस्तावेज है । सबसे बड़ी बात वह यह कि उपन्यासकार ने कहीं भी कथा को संघर्षात्मक मोड़ देने का प्रयास नहीं किया है । इसके बावजूद भी कथा पढ़ते वक्त पाठक को लगता रहता है कि कहीं न कहीं कथानायक अनूप एक संषर्ष से जूझ रहा है – मीना को न भूला पाने का मानसिक संघर्ष, ऐसी बहन को सदैव मुदित देखने का संघर्ष जिसके संसार से पिता और माता का प्यार गायब हो चुका है । आदि-आदि ।
कथा की बुनावट को यदि बारीक कोणों से निहारें तो यह भी कहा जा सकता है कि समूची कथा अनुभव का दस्तावेजीकरण है या घटना का पश्चातवर्ती लेखन । यानी कि कथा का समूचा प्लाट, सारे के सारे पात्र, सारी की सारी परिस्थितियाँ पहले से ही मन में उमड़-घुमड़ रही हों । उपन्यासकार ने उन अनुभूतियों को एक परिवार की कथा बनाकर सार्वभौमिक बनाया है । यदि ऐसा न होता तो उपन्यास में कहीं न कहीं फैंटेसी आती या कथा की धारा में कहीं कोई विचलन भी आता । नदियों की उपधाराओं की तरह कई उपकथायें विकसित होतीं । कदाचित् यही कारण रहा हो कि समूचा उपन्यास एक लय में लिखा गया उपन्यास लगता है और पाठक भी एक सरल और सामान्य उपन्यास की तरह उसे एक ही बैठक में पढ़ लेता है । पाठकीयता में कहीं कोई रूकावट नहीं । न शिल्पगत बिखराव न कथागत भटकाव । मूलकथा की एकरसता यहाँ पाठक को भले ही खल सकती है पर सारा का सारा उपन्यास एक ही लय में जैसे लिखा गया हो सो वह भी उसके साथ-साथ बहने लगता है ।
कथा प्रवाह की दृष्टि से सिसकता जीवन की भाषा सधी हुई है, बोलचाल और जानी-पहचानी है । कहे हुए वचन ही कथा-पात्रों के चरित्र का चित्रांकन करते हैं । और सिर्फ कथा-पात्रों का चित्रांकन ही क्यों, सारा परिवेश भी इसी से मुखरित होता है । इसे उपन्यासकार की नियोजित तटस्थता भी कह सकते हैं या भाषा की सक्षमता । यह दीगर बात है कि इस उपन्यास की भाषा में कलागत जादूगरी नहीं है जिसकी अपेक्षा अक्सर कई पाठकों द्वारा की जाती है । पर ऐसे उपन्यासों में कई बार कथा कम कला ज्यादा चीखती-चिल्लाती रहती है ।
हो सकता हो कि कई उपन्यासों का आस्वाद चख चुके पाठकों को सिसकता जीवन में कोई समाज, कला या विचार न मिले । पर यह भी हो सकता है कि जिस तरह मनुष्य के लिए नया भविष्य रचा जा रहा है, वहाँ शायद इसी तरह के उपन्यास ही पढ़े और सराहे जायें । जिस तरह से मनुष्य के जीवन को अतिसरलीकृत करके देखे जाने की चेष्टा वायवी उत्तरआधुनिकवाद में दिखाई देती है, जिस तरह से वैश्वीकरण की अवधारणाओं में भी जीवन और कला के निम्न अभिरुचीय तकाज़ाओं के रूप में जैसी-जैसी मान्यताओं को प्रतिष्टित किया जा रहा है, ऐसा कहना बेमानी नहीं होगा । और खासकर तब जब जीवन में भाषा और अभिव्यक्ति को लेकर गंभीरताओं को खारिज़ करने का महाषड़यंत्र शुरू हो चुका हो शायद ऐसे उपन्यास ही लगातार पढ़े जायें । जहाँ पाठकों को पढ़ने और पढ़ने के बाद संवेदनाओं को बचा पाने की सामान्य पुलक जग सके । इस रूप में यह एक सामान्य उपन्यास होते हुए भी उन उपन्यासकारों से कहीं अधिक पाठकों को अपनी ओर खेंच सकता है जिनके उपन्यास केवल गंभीर बुद्धिजीवियों के लिए ही लिखी जा जाती है और जिन्हें मात्र वे ही बुद्धिजीवी ही समझ पाते हैं साहित्य पढ़ने के आग्रही सामान्य पाठक नहीं ।
भले ही में इस उपन्यास जनवादी लक्षण किसी को दिखाई न दे पर जनभाषा की दृष्टि से यह पूर्ण जनवादी उपन्यास है । जहाँ भाषा सौंदर्य की अतिरिक्त आग्रह से मुक्त होती है । भले ही कुछ इस उपन्यास में किसी बंबईया फिल्म की गंध महसूस करे, पर यह भी एक सच है कि जीवन की जिस शाश्वत और जानी-पहचानी रूपों को यहाँ रखा गया है वह जीवन को लेकर भारतीय दार्शनिक चेतना की पुनर्प्रतिष्ठा जैसी कोई बात भी सिद्ध होती है । जैसे उपन्यासकार याद कराना चाहता हों कि – “बिना दुख के सुख का आगमन हो ही नहीं सकता । अतः प्रसन्नतापूर्ण आल्हादित जीवन जियें न कि सिसकता जीवन ।”
त्र्यम्बक राव साटकर के बारे में मैं यह नहीं जानता कि वे विशुद्ध रूप से अहिंदीभाषी हैं या नहीं । यदि वे मूलतः मराठीभाषी हैं तो इस उपन्यासकार को हिंदी के लिए उनका योगदान कहा जाना चाहिए । और विश्वास भी किया जा सकता है कि वे समकालीन उपन्यास लेखन में अपनी जगह बनाने के लिए भी भविष्य में कुछ और अच्छी शुरुआत कर सकते हैं ।
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