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छंद का व्यावहारिक ज्ञान
छंद शाश्वत हैं । छंद विहीन संसार सूना है । फटाफट कवि बन जाने के लिए मुक्तछंद कविताओं के दुराग्रह के बाद भी छंद न कविता से विलग हो सकी न हीं छंदमूलक विधाओं को साहित्य से किनारा किया जा सका । विभिन्न छंदों की शास्त्रीयता को स्थापित करने का अकादमिक प्रयास है – व्यावहारिक छंद शास्त्र । आर.पी.शर्मा ‘महर्षि’ छंद-विधान में निष्णात अध्यापक हैं । ऐसे समय में जब नियमों को तोड़ने का रिवाज़ लगातार बढ़ रहा है महर्षि जी ने इस कृति को लेखकों और पाठकों के समक्ष रख कर महत्वपूर्ण कार्य कर दिखाया है । इससे पहले भी हिंदी ग़ज़ल संरचना-एक परिचय और गज़ल निर्देशिका नामक किताब नये रचनाकारों के मध्य काफ़ी लोकप्रिय रही है । प्रस्तुत कृति में मुख्य रूप से पिंगल के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक, दोनों ही पक्षों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। साथ ही इसमें पहली बार उर्दू छंद-शास्त्र (इल्मे-अरूज़) को भी, तुलनात्मक विश्लेषण के साथ, समुचित स्थान दिया गया है ताकि यह देखा जा सके कि दोनों शास्त्रों में कौन-कौन-सी समानताएँ हैं और वह कौन-सा अंतर है जो इनको एक-दूसरे से विलग करता है। वस्तुतः दोनों ही शास्त्रों की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं, जिनसे पूर्णतया अवगत होकर, लाभान्वित हुआ जा सकता है। वह इसलिए कि हिंदी छंद पर विस्तार से जानकारी प्रदान करने वाली पुस्तकों का अधिक अभाव है। |
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ववे बताते हैं कि जिन खोजपूर्ण वे बताते हैं कि इसमें खोजपूर्ण और उपयोगी तथ्यों एवं सामग्री का और उपयोगी तथ्यों एवं सामग्री का समावेश है । ग्रंथ में दोनों ही छंद-शात्रों के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पक्षों का निरूपण तथा व्यलहारिक पक्ष पर विशेष बल दिया गया है । इसीलिए इसे व्यावहारिक छंद-शास्त्र कहा गया है। दोनों छंद-शास्त्र की विशेषताओं का उद्भोधन इस ग्रंथ को महत्वपूर्ण साबित करता है। दोनों छंद-शास्त्र में जो अंतर हैं, उसका तुलनात्मक विश्लेषण द्वारा स्पष्ट रेखांकन,पिंगल तथा उर्दू के प्रचलित एवं अन्य उपयोगी छंदों का विस्तृत विवरण तथा उनसे संबंधित रीतिकालीन एवं आधुनिक कवियों तथा नए-पुराने शायरों के विशिष्ट पद्यांशों एवं ग़ज़लांशों के प्रचुर संख्या में उद्धरण (विशेष रूप से मात्रा-गणना,वर्ण-गणना एवं विभाजन (तक़्ती) सहित विवेचन को देखकर कहा जा सकता है कि यह साहित्य के विद्यार्थियों, अध्यापकों, अनुवादकों आदि के लिए कारगर किताब है । किताब में पिंगल के अनेक मात्रिक छंदों एवं वर्ण-वृत्तों का उर्दू में पहली बार विधिवत रुपांतरण किया गया है जो इस कृति का आकर्षण है ।
कृति में शेरों–शाइरी, विशेषकर ग़ज़लों से संबंधित उर्दू बहरों तथा उनके विभिन्न भेदों का गणनात्मक वर्ण-वृत्तों के रूप में प्रयोग भी है । कुछ नए हिंदी वर्ण-वृत्तों का सृजन तथा हिंदी के एक रुबाई छंद की पहचान भी ग्रंथकार यहाँ कराता है जो उसकी चौमुखे दृष्टिकोण का परिचायक है । ग़ज़ल-विधा पर एक विशेष ज्ञानवर्द्धक आलेख भी रचनाकार ने यहाँ रखा है । उर्दू की बहुत ही उपयोगी तख़नीक़ (समायोजन) तथा तस्कीन (स्थिर) विधियों की स्वविकसित सरलतम डिजिटल प्रक्रियाएँ तथा उनका पहली बार हिंदी छंदों, विशेषकर, सवैया छंदों में अभिनव प्रयोग को देखकर कहा जा सकता है कि ग्रंथकार ने इस किताब को पूर्ण बनाने के लिए अत्यधिक मेहनत की है।
उर्दू रुबाई के सभी औज़ान (मीटर) स्वयं प्राप्त करने का एक अभिनव चार्ट तथा उसकी स्वविकसित सरलतम डिजिटल विधि भी समझायी गई है । इसके अतिरिक्त,और भी बहुत-सी काम की बातें हैं, जो इसमें शामिल की गई हैं, और जो हर छंदप्रिय रचनाकार के लिए आवश्यक है ।
इस प्रकार, प्रस्तुत कृति को बहुत ही व्यावहारिक, सुरुचिपूर्ण एवं उपयोगी बनाने का भरसक प्रयास किया गया है। कृति निश्चय ही छंदमूलक यानी कि गीत, ग़ज़ल, रूबाई सहित कविता में रचने वालों के लिए संग्रहणीय है ।
प्रकाशन अधिकारी, संस्कृति विभाग रायपुर, छत्तीसगढ़
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