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गीति-काव्य तथा प्रगीति-काव्य डॉ. महेशचन्द्र शर्मा
लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार श्रद्धेया महादेवी वर्मा का मत है कि –“गीति-काव्य व्यक्तिगत सीमा में तीव्र सुख-दुःखात्मक अनुभूति का वह शब्द-रुप है जो अपनी धवन्यात्मकता में गेय हो सके ।” 1
महादेवी जी के इस मत के बारे में विचार-विमर्श कर लेने के बाद यह कहना निरापद है कि गीति-काव्य में कवि के सुख-दुःख, हर्ष-विषाद तथा क्षोम आदि मनोभावों की रागात्मक अभिव्यक्ति होती है ।
साहित्य के क्षेत्र में साहित्यिक गीति-काव्य की निम्नस्थ दो पद्धतियाँ (शैलियाँ या विधाएँ) लक्षित होती है –
(1) पद-पद्धति (या गीति-पद्धति) में वैयक्तिकता अल्प परिमाण में होती है, जबकि दूसरी पद्धति ( प्रगीति-पद्धति) में वैयक्तिकता का अतिरेक होता है । हमारे कविवर मैथिलिशरण गुप्त के काव्य के यशस्वी शोधक एवं अधिकारी विद्वान डॉ.कमलाकान्त पाठक का मत है कि – “पदों में आत्मनिवेदन की अभिव्यक्ति करना कवि का लक्ष्य होता है और प्रगीतों में सौन्दर्यानुभूति का चित्रण अथवा उन्मेषमयी आत्माभिव्यंजना करना कवि का साध्य । पहला अन्तःप्रेरित काव्य है, दूसरा उच्छवसित काव्य ।” 2
डॉ. पाठक के इस मत के आधार पर यह कहना निरापद है कि कवि जब अपनी कविता में आत्म-निवेदन करता है तो गीति-काव्य की रचना करता है । उसका काव्य आत्मपरक कहलाता है । इसके विपरीत कवि जब अपनी कविता में सौन्दर्यानुभूति का चित्रण करता है तो वह व्यक्तिपरक (या प्रगीति-काव्य) की सृष्टि करता है । कहा जा सकता है कि भक्तिकालीन कवियों (सन्त कबीर, गोस्वामी तुलसीदास, महात्मा सूरदास तथा मीराबाई आदि) ने आत्मपरक कविता का प्रणयन किया है । यह काव्य उनके अन्तः करण से निकला है । इन कवियों का मूल उद्देश्य अपने पदों में आत्मनिवेदन करना ही रहा है । इसके विपरीत, आधुनिक काल में (विशेषतः छायावादी काव्य में) कवियों ने प्रगीति-काव्य की रचना की है, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पन्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ तथा महादेवी वर्मा आदि का प्रगीति-काव्य उच्छवसित काव्य है । इन्होंने अपनी वकिताओं में सौन्दर्यानुभूति के चित्रण पर बल दिया है उन्मेषमयी आत्माभिव्यक्ति करना ही इन कवियों को अभीष्ट रहा है ।
अब हम साहित्य के इतिहास के चारों कालों में रचित काव्य के बारे में विस्तारपूर्वक चिन्तन-मनन करेंगे तथा यह देखने-दिखाने का प्रयास करेंगे (भक्ति-काव्य तथा छायावादी काव्य के विशेष सन्दर्भ में ) कि किस काल में गीति-काव्य का प्रणयन हुआ है तथा किस काल में प्रगीति-काव्य का ?
आदिकालीन कवि विद्यापति को गीति-काव्य का सर्वप्रथम स्रष्टा माना गया है ह्रदय की तीव्र भावधारा को गीतों का आश्रय लेकर मार्मिक एवं प्रभावशाली ढंग से शब्द देने की कला में विद्यापति पूर्णतः कुशल हैं । उनके पदों में संगीतात्मकता, भाव-प्रवणता तथा माधुर्यव्यंजक कोमलकान्त पदावली का चरम उत्कर्ष प्रकट हो चुका था किन्तु उनके गीतों में आत्माभिव्यंजना की कमी के कारण वैयक्तिक अनुभूति की वह निश्छलता एवं गहराई नहीं आ सकी थी जो परवर्ती कवियों-कबीरदास, गोस्वामी तुलसीदास एवं महात्मा सूरदास के पदों तथा मीराबाई की पदावली में लक्षित होती है ।
सन्त कबीर साहब के गीत गीति-शैली के चरम विकास के उदाहरण हैं । अपने आराध्य ‘राम’ का प्रियतम के रुप में तथा स्वयं का उसकी प्रियतमा के रुप में चित्रण करके कबीर ने अपने गीतों (पदों) के विरह-मिलन एवं सुख-दुःख को श्रृंगारिक रुप में उपस्थित किया है । ‘दुलहनी गावहु मंगलाचार’ वाला पद इसका उत्कृष्ट उदाहरण है । आचार्य क्षेमचन्द्र ‘सुमन’ तथा योगेन्द्र कुमार मल्लिक का यह मत अत्यन्त संगत है कि – “यद्यपि कबीर के गीतों में साहित्यिकता की कमी है, भाषा भी अव्यवस्थित है किन्तु भावों के उदात्त होने और अनुभूति की तीव्रता एवं गम्भीरता के कारण उनके गीत हिन्दी के गीति-काव्य की अमूल्य निधि हैं ।” 3
प्रबन्ध-काव्य के रचयिता के रुप में विशेषतः यशस्वी गोस्वामी तुलसीदास को ‘गीतावली’, ‘श्रीकृष्ण-गीतावली’ तथा ‘विनयपत्रिका’ नाम्नी रचनाओं के आधार पर गीति-काव्य की दृष्टि से भी अद्भुत सफलता मिली है ।
महात्मा सूरदास सगुण भक्त कवि हैं । वह हिन्दी-गीति-काव्य के उज्ज्वल ‘रत्न’ हैं। अनुभूति की तीव्रता, भावों की मधुरता, भाषा की सरलता तथा सरलता हमारे इस कवि के गीतों की प्रमुख विशिष्टताएँ हैं ।
मीराबाई के पदों में उनकी कथा (निजी व्यथा) को ही वाणी मिली है । मीरा ने अपने एवं अपने आराध्य (श्री कृष्ण) के बीच किसी और को स्थान नहीं दिया है । इसलिए, उनके पदों में कवियित्री की सीधी उन्मुक्त भाव-भक्ति ही व्यक्त हुई है । मीरा का हर पद उनकी अन्तर्वेदना का परिचायक है विचारक डॉ. शीला का मत है कि “उसका (मीरा का) आत्मनिवेदन उसके ‘स्व’ का ही अंकन है । सामाजिक चेतना की दृष्टि से देखें, तब भी मीरा का काव्य अप्रतिम है । उसने मध्ययुगीन सामन्ती प्रथा का क्रान्तिकारिणी के समान विरोध किया । उस विरोध में कबीर के समान प्रखर ऊष्मा नहीं है - किन्तु सौम्य और शान्त करुणा से आप्लावित सुकोमलता की स्निग्धता है ।”4
हमारे यशस्वी आलोचक डॉ. रामकुमार वर्मा ने गीति-काव्य के रुप में मीरा की कविता को ‘आदर्श’ माना है ।
भक्ति-काव्य में गीति-काव्य की जो धारा चल रही थी, रीति-काल तक आते-आते वह सुख गई थी । रीतिकाल के अन्तर्गत मु्ख्यतः ‘मुक्तक-काव्य’ का ही प्रणयन हुआ है आत्मभिव्यंजक गीतों की विशिष्ट रचना इस काव्य में लक्षित नहीं होती । रीति-कवियों (रसखान, घनानन्द, बोधा, आलम तथा ठाकुर आदि) की कविताओं में हमें स्वानुभूति के दर्शन लौकिक प्रणय के आश्रय में ही होते हैं किन्तु उनमें भी जागरुक पाठकों को कृष्ण-भक्ति की छाया लक्षित हो जाती है ।
प्राचीन काव्य-परिपाटी को छोड़कर नवीन परिवेश के अनुकूल काव्य-धारा में नई प्रवृत्तियों को प्रश्रय देने का श्रेय भारतेन्दु हरिशचन्द्र को दिया जाता है । उन्होंने विद्यापति एवं सूर के ढंग पर भक्ति-भावना सम्बन्धी पदों का प्रणयन किया है जिनमें रचयिता का व्यक्तित्व स्पष्तः उभर कर हमारे सामने आता है । ऐसे पदों (गीतों) में मार्मिकता एवं मधुरता प्रचुर मात्रा में देखी जा सकती है । “ब्रज की लता पता मौंहि कीजै” – वाले गीत में ब्रजवास की अभिलाषा किस प्रकार मूर्तिमान हो उठी है, यह देखते ही बनता है ।
‘द्विवेदी-युग’ के यशस्वी कवि मैथिलीशरण गुप्त-कृत ‘साकेत’ शीर्षक महाकाव्य का ‘नवम सर्ग’ प्रगीति-काव्य की दृष्टि से सर्वथा अभिनन्दनीय है । इस दृष्टि के ‘नवम सर्ग’ के निम्नस्थ अंश अवलोकनीय हैं – (1) ‘वेदने ! तू भी भली बनी ।’5 (2) ‘कहती मैं चातकि, फिर बोला ।’6 (3) (3)‘दरसों, परसों,घन बसरों ।’ 7 (4)‘मुझे फूल मत मारो ।’ 8
छायावादी काव्य-धारा में प्रगीति-काव्य चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया है, इसमें सन्देह नहीं । आलोचक डॉ. कृष्ण देव झारी ने छायावादी कविता में प्रगीतात्मकता की विद्यमानता को ध्यान में रखते हुए यह लिखा है कि-“जब कवि अपने सुख-दुःख की भावावेशमय अभिव्यक्ति पर ही ध्यान रखेगा तो उसकी वाग्यधारा प्रगीत के रुप में ही प्रकट होगी ।” 9
जयशंकर प्रसाद मानव-मन की अनुभूतियों के कवि हैं । प्रगीति-काव्य के लिए आवश्यक सौन्दर्य-वृत्ति(Aesthetic Sence) हमारे इस कवि में कभी नहीं मिलती । आन्तरिक अनुभूति एवं सौन्दर्य-वृत्ति के समन्वय के बल पर प्रसाद जी ने अपने प्रगीतों में अद्भुत माधुर्य एवं सारल्य का समावेश कर दिया है ।
‘आँसू’, ‘लहर’, ‘झरना’ तथा ‘कामायनी’ को प्रसाद जी के प्रगीति-काव्य के ‘श्रेष्ठ निर्देशन’ मान लेना चाहिए ।
हमारे कविवर पन्त को काव्य- रचना की प्रेरणा प्राकृतिक रमणीयता से मिली है । उनकी ‘ग्राम देवता’, ‘ग्राम्य-युवति’, ‘सन्ध्या के बाद’ तथा ‘खिड़की से’ आदि पन्त जी के प्रगीति-काव्य के ज्योति-स्तम्भ बन चुके हैं । आलोचक राजनाथ शर्मा की मान्यता है कि - “पन्त में प्रगीतात्मक सामर्थ्य अद्भुत है, गीति-प्रतिभा अपेक्षाकृत कम ।” 10
हमारे यशस्वी आलोचक डॉ. नगेन्द्र के द्विवेदी-युग के बाद विकसित होने वाली गीति-शैली को पाश्चात्य लिरिक (Lyric) के ढंग की शैली ही माना है । 11
आलोचक डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल की मान्यता है कि - “पन्त मूलतः प्रगीत-प्रतिभा के कला-विदग्ध कवि हैं ।” 12
पं. सूर्यकान्त त्रिपाणी ‘निरोला’ – कृत ‘परिमल’, ‘गीतिका’ तथा ‘अनामिका’ आदि रचनाएँ उनकी प्रगीति-कला के नयनाभिराम निर्देशन है । ‘निराला’ जी के प्रगीति-काव्य की सर्वोच्च विशेषता है - भावना एवं कल्पना के साथ बुद्धि-तत्व का समन्वय ।
महादेवी वर्मा प्रगीति-काव्य की सुप्रसिद्ध रचयिता है । प्रगीति काव्य की रचना के लिए जिस एकान्त तथा वैयक्तिक साधना की अपेक्षा होती है, वह निश्चय ही महादेवी जी में सहज-सुलभ है ।
यदि छायावादियों को ‘प्रगीति-प्रतिभा के कला-विदग्ध कवि’ कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
यशस्वी आलोचक डॉ. इन्द्रनाथ मदान की यह मान्यता निरापद है कि “गीति-काव्य तथा प्रगीति-काव्य अलग-अलग काव्य-विधाएँ हैं और इनके मूल में मध्यकालीन और आधुनिक युग-बोध है ।”
गीति-काव्य तथा प्रगीति-काव्य का अन्तर दिखलाते हुए हमने जो उपर्युक्त अध्ययन उपस्थित किया है, इसके आधार पर किसी को भी यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि गीति-काव्य पू्र्ववर्ती विधा है और प्रगीति-काव्य परवर्ती (आधुनिक काल की) ।
सन्दर्भ-सूचीः (01) वर्मा, महादेवीः ‘विवेचनात्मक गद्य’, पृष्ठ 144 (02) पाठक, डॉ. कमलाकान्तः ‘मैथिलीशरण गुप्तः व्यक्ति और काव्य’, पृष्ठ 522 (03) ‘सुमन’, आचार्य क्षेमचन्द्र तथा मल्लिक, योगेन्द्र कुमारः ‘साहित्य-विवेचन’, पृष्ठ 152 (04) शर्मा, डॉ. शीलाः ‘मध्यकालीन काव्य’ (मेरठ विश्वविद्यालय प्रकाशन), पृष्ठ 68 (05) गुप्त, मैथिलीशरणः ‘साकेत’ - नवम सर्ग, पृष्ठ 280 (06) वही, पृष्ठ 291 (07) वही, पृष्ठ 293 (08) वही, पृष्ठ 314 (09) झासी, डॉ. कृष्ण देवः ‘साहित्यिक निबन्ध’, पृष्ठ 607 (10) शर्मा, राजनाथः ‘साहित्यिक निबन्ध’, पृष्ठ 638 (11) डॉ. नगेन्द्रः ‘सुमित्रानन्दन पन्त’, पृष्ठ 84 (12) पालीवाल, डॉ. कृष्णदत्तः ‘सुमित्रानन्दन पन्त’, पृष्ठ 100
रीडर एवं अध्यक्ष हिन्दी-विभाग, लाजपत राय कॉलेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ) साहिबाबाद (ग़ाज़ियाबाद) (उत्तर प्रदेश) – 201005
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