ई-पताः srijangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

  लोक-आलोक

 

दर्द के बीच उभरता अलंकार गोदना


एस.अहमद

 

गोदना नारी देह का ऐसा अलंकार है जो परलोक में भी उसके साथ जाता है जो स्त्रियाँ  गोदना नहीं गुदवाती उनके देव नाराज होते हैं और उसे लोहे की गरम सलाखों से गोदते हैं।  गोदना रहने पर देव प्रसन्न होते हैं और स्वर्ग में जगह मिलती है। ऐसी पारम्परिक मान्यता छत्तीसगढ़ की  समान्य एवं जन-जातियों के बीच प्रचलित है। गोदना गोदने के काम करनेवाली महिला को गोदनीन कहा जाता  है, गोंड़, देवार, एवं बैगा  जाति की औरतें  इस कार्य को करती हैं।  वे हाट-बाजारों  में एक  अलग प्रकार के रसायन से जो कि डोमी साँप  की खाल  से बना  होता  हैं  से करती हैं। गोदने के लिए काम में आनेवाली सुई की कुछ अलग तरह की होती है।  गोदने का दर्द  लड़कियां बड़े  चाव से सहती हैं और तब ही उनके होठों से लोक गीत फिसलता है, जो छत्तीसगढ़ के भीतरी अंचलों  में बड़े चाव से गाया और सुना जाता है।

 

गोदना धीरे-धीरे गोद और गोदहारिन.......

गोदना धीरे-धीरे गोद ग........

 

भींचे दांतों के बीच से निकली सिसकारी और सुई की चुभन के बीच न जाने कितने लोकगीतों को जन्म दिया होगा। उस मीठे दर्द का एहसास तो वहीं नवयौवना कर सकती है, जो गोदने के दर्द को झेल चुकी हो। हरे रंग के फूल के चिन्ह, पक्षी तथा बिन्दुओं से कई तरह के आकार-प्रकार के चिन्हों से हाथ के पंजों में, बाँह  में पैरों में, गाल, माथे पर टीका-नुमा बिन्दी को कई ढंग से गोदा जाता है। हाथ में अपने प्रेमी तथा पति या अपना नाम भी महिलाएं गुदवाती हैं।

 

आमतौर से गुदना लड़कियों में चार साल की अवस्था से लेकर पन्द्रह-सोलह साल की अवस्था तक उनके शरीर के विभिन्न अंगों में गोदवाया जाता है।

 

आदिवासी महिलाओं का यह सर्वाधिक प्रिय गहना है, जो देह में चिरस्थायी रहता है। गोदना  गुदवाने के पीछ विभिन्न जन-जातियों में अलग-अलग प्रकार की मान्यताएँ हैं। कमोबश हर जगह देव का नाराज होना ही प्रमुख है। साथ-साथ सौंदर्य-बोध, समाज में प्रचलन होना भी है। गोदने के प्रिय आदिवासी, अच्छे गुदने से अलंकृत लड़कों को बहुत पसंद करते हैं और ज्यादा चाहते हैं।

 

गोंड़ जन-जाति में बाँह , हाथ, पौंहचा, गले, छाती, माथा एवं पैर के विभिन्न अंगों  में छः से सात साल की  लड़कियों को गुदना गुदवाना शुरू  कर देते हैं।

 

बैगा समाज में गोदना अधिक प्रिय है या यूं कहा जाए कि वे इसके दीवाने है तो अतिशयोक्ति नहीं होगा। बैगा आदिवासिन लगभग पूरे शरीर को गुदने से अलंकृत करवाती हैं । आठ साल की लड़की के कपाल का गुदना अनिवार्य है उसके उपरान्त पंद्रह सोलह की उम्र में पीठ, जाघ, पछाड़ी, घुटना और बाँह  में पैरों में गुदना, कोरकू आदिवासियों में पांच साल की उम्र में ही गुदवाने की प्रथा है। विवाह के पूर्व तक अधिकांश शरीर गुद चुका होता है। इसके पीछे कोरकू आदिवासियों के धार्मिक विश्वास के साथ-साथ सुन्दर दिखना भी निहित, और  इसे पवित्र एवं आवश्यक मानते हैं।

 

हरिजन समाज में औरतों के साथ-साथ आदमी भी गोदना गुदवाते हैं। ज्यादातर आदमी  बाँह पर अपना नाम, गोत्र या प्रतीक चिन्ह ही गुदवाते हैं। कुछ आदमी अपने पूरे शरीर पर चेहरे समेत राम-राम गुदवाते हैं। वे मानते हैं कि मरने पर ये राम का नाम ही उन्हें मोक्ष दिलवाएगा और उन्हें स्वर्ग मिलेगा।

 

सरगुजा के आदिवासी अपने पैरों में पायल की तरह का गुदना गुदवाते हैं छत्तीसगढ़ की  अघरिया जाति की महिलाएं भी पैरों में पायलनुमा अलंकार को अलंकृत करवाती हैं। नामक में फुल्ली के स्थान पर बिन्दु, ठोड़ी में तिल की जगह पर, गालों पर तिल, माथे पर बिन्दी की जगह पर गुदने की बिन्दी बिन्दुओं और लकीरों से गुदना गुदाए रहती हैं, बाँह  और गले में भी गुदना रहता है। वे गुदने सुन्दर तथा स्वास्थ्य का प्रतीक मानते हैं।  उनकी भी यही धारण है कि गुदना नहीं रहने पर देव नाराज होंगे। बिना गुदने की लड़की को घोटुल में और  समाज  में उचित स्थान नहीं मिलती है।

 

प्रमुखतः देवार जाति की औरतों गोदना गुदने का कार्य करती हैं। वे स्वयं अपने अंगों को भी गुदने से सजाए रखती है। उन्हें छत्तीसगढ़ के विभिन्न जातियों के प्रतीक चिन्हों का ज्ञान होता है। वे जानती हैं कि कौन से समाज की स्त्री किस चिन्ह को गुदवाना पसन्द करती हैं । तेली, चमार, कुरमी, गौड़, बिंझवार, आदि जातियों का टोंटम चिन्ह अलग-अलग होता है और यहाँ की जातियां अन्य जाति के प्रतीक चिन्हों से परहेज करती हैं।

 

वर्तमान समय में इसका चलन कम हो रहा है। शहरी क्षेत्रों में लगे गाँवों  में अब गोदने के प्रति ललक नहीं रही जो पहले हुआ करती थी, सिर्फ आदिवासी ही परम्परा से जुड़े हुए हैं और गुदना गुदवाने हैं। पहले बदनीन को इस धंधे में अच्छी कमाई हो जाती थी। हाट-बाजार में वे लड़कियों से घिरी रहती थीं, लेकिन अब केवल आदिवासी इलाकों के हाट बाजारों में ही कुछ हो पाता है कि लोग अब पहलवे की तरह आस्थावादी नहीं रहे। आज शहरी सभ्यता का अतिक्रमण ग्रामीण परिवेश को निगल रहा है और बहत सारी मान्यताएं बदल रही हैं तो गोदना बेचारा कहा बचेगा । शहरी संपर्क  में आए गाँवों  में बसे लोग अब इन धार्मिक और सामाजिक धारणाओं के प्रति उदासीन होते जा  रहे हैं। अब गोदना सुंदरता का प्रतीक नहीं रहा, अब इससे पिछड़ापन झलकता है।

 

गोदने के प्रति लोगों की उदासीनता के कारण गोदने का कार्य करनेवाली औरतों के सामने जीवन-यापन का प्रश्न खड़ा हो गया है कि अब व क्या करें पहले वे हाट-बाजार में आवश्यकता  के अनुसार कमा लेती थीं पर अब उन्हें भटकना पड़ता है एक गाँव से दूसरे गाँव तक, लेकिन वे कब तक भटकेंगी और ये भटकन उन्हें किस दिशा में ले जाएगी?

एस. अहमद

रायपुर, छत्तीसगढ़

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google

 
WWW http://www.srijangatha.com