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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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  लोक-आलोक

 

जनजातीय समाज के आकर्षक नृत्य


सरला भटनागर

 

दुनिया भर के जनजातीय समाज में नृत्य एवं गीत की पुरातन परtribal dance - लोक नृत्यम्परा है। नृत्य एवं गीत के बिना जनजातीय जीवन अधूरा रहता है। भारत में बसने वाली जनजातियों के साथ ही दूसरी जनजातियों में प्रचलित नृत्यों के बारे में जानना न केवल रोचक है बल्कि रोमांचक भी।

 

गुआना की खाड़ी का एलीफेंट डांस

गुआना की खाड़ी कैमठन रिपब्लिक में बेकवारी जनजाति के लोग एलीफेंट डांस बड़ी श्रद्धा से सम्पन्न करते हैं। यह जुलूस की शक्ल में सामने आता है। मुख्य नृत्यकार हाथी की तरह वृहदकाय होता है। वह खजूर के पत्तों से बना लम्बा स्कर्ट पहनता है, बाकी सारा शरीर सिर से लेकर पेढ़ू तक गहरी लाल व कत्थई खाल से ढँका रहता है। दो बड़े-बड़े दाँत बनाए जाते हैं । उसके गले, हाथों, पाँवों व कमर में सीपी शंखों और कौड़ियों की माला सजी रहती है। वह झूम-झूम कर ढोल-ढमाकों की ताल पर नाचता है। देखने वाले उत्साहित होकर तालियाँ बजाते हैं। बेकवारी के नागन्या नृत्यकार एक हाथ में पत्ते लपेटा हुआ अंडा और दूसरे हाथ में डंडा लेकर तीव्र ताल बाध्य नृत्य करते हैं। यहाँ की मालोबा सोलायटी की औरतें भी यह नृत्य करती हैं । उनका विश्वास है कि यह नृत्य उन्हें मिर्गी, दत्ती भिचना आदि रोगों से छुटकारा दिलाला है।

 

 बाली द्वीप में मन्की डांस

बाली द्वीप में मन्की डांस विशेष उत्साह से सम्पन्न किया जाता है। इसमें एक साथ सौ से अधिक नृत्यकार भाग लेते हैं। यह सूर्यास्त के बाद शुरू होता है। नर्तक गोल दायरे में एक के अन्दर एककर के बैठते हैं। फिर ताल सुर बद्ध दोनों हाथों की पाँचों अँगुलियाँ खोलकर ऊपर नीचे करते हैं। बदन को भी चक्राकार घुमाते हैं। कुछ विशिष्ट आवाज़ें भी निकालते हैं। इन सब क्रियाओं में बला का तारतम्य होता है। पाँवों की गति, आँखों का चलाना संगीत वादन सब ही अति प्रशंसनीय होता है।

 

बाली नृत्यकार दैत्य या बुरी आत्मा का चेहरा लगा कर भी नाचते हैं, जिसे सुबक कहते हैं। जगह-जगह सुबक के मन्दिर बनवाए जाते हैं, वहीं दैवी आपदा से मुक्त कराता है। वही विवाह पूजा-पाठ जन्म-मरण के संस्कारों का विधान बनाता है। स्त्रियाँ बड़े-बड़े थालों में मिठाई फल-फूल चढ़ावे के लिए लेकर जुलूस के रूप में चलती हैं। इनके फूलों का श्रृंगार अद्वितीय होता है।

 

मोन्टाना और ओकलाहोमा का चियानी डांस

संयुक्त राष्ट्र अमरीका के मोन्टाना और ओकलाहोमा में चियानी जनजाति के लोगों में सूर्य नृत्य प्रचलित है। इसमें चियानी नृत्यकार खुद को सताने की प्रक्रिया दोहराते हैं, लोग देख-देखकर अचम्भित होते हैं। इस नृत्य को ईश्वर की साधना मानते हैं। इससे प्रभु की कृपा दृष्टि की आशा रखते हैं। समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करना भी इस नृत्य का उद्देश्य है। नृत्यकार कभी लकड़ी के जमूरे बदन में रस्सी बंधवा कर खम्भों से बँधवाते हैं। वदन से रस्सी बँधवा कर भैंसे से खिंचवाते हैं। इसी अवस्था में नृत्यकार नाचता है, कूदता है।

 

चियानी लोग पशु-नृत्य भी करते हैं। जिस नाम के पशु का नृत्य करते हैं उसकी बोली भी बोलते हैं। धीरे-धीरे शुरू होकर आवाज़ें बुलन्द होती जाती हैं। साथ ही साथ विशिष्ट देह संचालन ढोल-ढमाका ताल बद्ध रहता है जो अति आकर्षक लगता है।

 

गुयाना और हैती का वू दू नृत्य

पश्चिमी अफ्रीका गुयाना और हैती में वू दू प्रथा के अनुयायी यह नृत्य सम्पन्न करते हैं। वू दू का अर्थ हैं, पवित्र आत्मा या ईश्वर । इस नृत्य में घने जंगलों के अंधकार में रात्रि को बड़े-बड़े ढोल बजाए जाते हैं। लोग गोल दायरे में खड़े होते हैं। बीच में आग लगाई जाती है। लोग मदमस्त होकर गाते बजाते हैं। मोम बत्तियाँ भी जलाई जाती हैं। संगीत और नृत्य ऊँचाई पर पहुँचता है। नृत्यकार नाचते-नाचते पसीने-पसीने हो जाते हैं। तभी अचानक सब शान्त हो जाता है। पाँच दस मिनट बाद एक आदमी सफेद रंग से पुता हुआ मुँह वाला, काले वस्त्र पहने हुए, लम्बी टोपी लगाए हुए, पेड़ों के पीछे से निकलता है। उसके एक हाथ में नरमुण्ड, दूसरे में डण्डा होता है। वास्तव में वह पादरी होता है। वह जोर से चिल्लाता है, बेरन समीधी, बेरन समीधी। बेरन समीधी अच्छी आत्मा का पर्याय है । सब उसे बीच में कर लेते हैं। गाना बजाना, नाचना फिर प्रारम्भ हो जाता है। बेरन समीधी का पूजन अर्चन समपन्न होता है।

 

वू दू प्रथा के लोगों में मृत गुलामों को जीवित कराने के लिए डेविल डान्सिंग या भूत प्रेतों को नचाने की विधा भी प्रसिद्ध है। चेचक के प्रकोप से बचाने के लिए भारतवर्ष में भी पहले भूत प्रेतों को नचाने व उन को संतुष्ट करने की प्रथा थी। वू दू संस्कृति के अनुकूल नर्तक रेशे पत्तों का वस्त्र पहनकर, पीतल या लकड़ी का चेहरा लगाकर नाचता है।

 

वास्तव में यह विविध कलाओं का संगम है। यह चीन और सिंगापुर में बड़े उत्साह और श्रद्धा से आयोजित किया जाता है। वसन्त ऋतु में करीब पन्द्रह दिन तक मनाया जाता है । लोक नर्तक शेर और साँप के रूप में विशिष्ट नृत्य करते हैं। वेश-भूषा रंग रंगीली सजावट अंग संचालन की तीव्रता मन मोहती है। कसरती जवान कुश्तियों के दाँव पेंच व अपना गठीला बदन दिखाते हैं. लम्बे-लम्बे बाँसों पर विचित्र मुद्राएं दिखाते हुए चलते हैं । यहाँ लाल रंग सौभाग्य सूचक माना जाता है। वह रंग दुर्घटनाओं से छुटकारा दिलाता है। लाल फूल, लाल चंदन वार पताएं घर-घर सजी रहती हैं। लाल फूलों वाले प्रेम पत्र भरे लिफाफे आदान-प्रदान में रहते हैं । यह समारोह लूनर न्यू इयर पर होता है।

  सरला भटनागर

वन्या संदर्भ, 35, राजीव गाँधी भवन

श्यामला हिल्स, भोपाल, मध्यप्रदेश

462002

 

 

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