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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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  लघुकथा

गिरेबागिरेबान

 

            एचओड़ी राउण्ड पर थे। राउण्ड पर जाना ज़रूरी भी था क्योंकि कमरे के अंदर बहुत सर्दी थी। बाहर धूप खिली हुई थी। कई दिनों के बाद आज सूर्यदेव के दर्शन हुए थे इसलिए बाहर खुले में बहुत अच्छा लग रहा था। एचओड़ी बीस-पच्चीस मिनट तक लॉन में फूल-पत्तियों का निरीक्षण करते हुए माली को आवश्यक निर्देश देते रहे। उसके बाद कमल किशोर वहाँ आ उपस्थित हुए और गुनगुनी धूप में एचओड़ी उनसे संस्थान की समस्याओं पर चर्चा करने में व्यस्त हो गए।

 

            चर्चा की समाप्ति के बाद परिसर का राउण्ड शुरु हुआ। जैसे ही एचओड़ी लैब में पहुँचे वहाँ  देखा काम के साथ-साथ चाय की चुस्कियाँ भी ली जा रही हैं। एचओड़ी ने इसे बड़ी गंभीरता से लेते हुए कहा,  ``जब देखो तब चाय। अरे कोई समय भी होता है कि नहीं किसी काम का? अपने गिरेबान में झाँककर देखो क्या तुम्हें यहाँ आकर चाय पीने के लिए ही मोटी-मोटी तनख्वाहें दी जाती हैं? डिसिप्लिन का ध्यान रखिए। आगे से किसी भी तरह का इंडिसिप्लिन टॉलरेट नहीं किया जाएगा। एंड एक्सन मस्ट बी टेकन अगेंस्ट डिफॉल्टर्स।´´

 

एचओड़ी एक्शन को एक्सन बोलना ही पसंद करते हैं।

 

एचओड़ी एक्सन की बात कर ही रहे थे कि इतने में चपरासी वहाँ  आया और बेहद अदब से उनसे बोला, ``सर चाय तैयार है। कमल किशोर सर आपका इंतजार कर रहे हैं। कह रहे हैं साहब को जरा जल्दी बुला लाओ। बहुत सर्दी है चाय ठंडी हो जाएगी।´´ एचओड़ी ने बस इतना ही कहा कि इस बूर्बक को चाय के सिवा कुछ और काम है कि नहीं और फिर राउण्ड बीच में ही छोड़ कर लंबे-लंबे डग भरते हुए अपने कमरे की तरफ हो लिए जहाँ चाय उनका इंतजार कर रही थी।

सीताराम गुप्ता

.ड़ी.106-सी, पीतमपुरा

दिल्ली-110034

 

 

 

 सीताराम गुप्ता की लघुकथाएँ

गिरेबान

लकीर

प्रतिद्वंद्वी

हाथी के दाँत

व्यस्तता

प्रगतिशीलता

अफ़सोस

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