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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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 कविता

       

        

अमरीका हड्डियों में जम जाता है

 

वे ऊँचे-ऊचे खूबसूरत हाइवे

जिन पर चलती हैं कारें-

तेज़ रफ़्तार से, कतारबद्ध चलती कार में चार पीते-पीते, टेलिफोन करते, टू डोर कारों में, रोमांस करते-करते

अमरीका धीरे-धीरे साँसों में उतरने लगता है

मूँगफली और पिस्ते का एक भाव,

पेट्रोल और शराद पानी के भाव,

इतना सस्ता लगता है सब्जियों से ज्यादा माँस

कि ईमान डोलने लगता है।

महँगी घास खाने से तो अच्छा है सस्ता माँस ही खान।

और धीरे-धीरे अमरीका स्वाद में बसने लगता है

गर्म पानी के शावर

टेलिविजन की चैनलें, सेक्स के मुक्त दृश्य,

किशोरावस्था से बीकेंड में गायब रहने की स्वतंत्रता,

डिस्को की मस्ती, अपनी मनमानी का जीवन,

कहीं भी, कभी भी, किसी के भी साथ

उठने, बैठने की आजादी.........

 

धीरे-घीरे हड्डियों में उतरने लगता है अमरीका

अमरीका जब साँसों में बसने लगा

तो अच्छा लगा; क्योंकि साँसों को पंखों की

उड़ान का अंदाज़ा हुआ

और जब, स्वाद में बसने लगा अमरीका

तो सोचा खाओ, इतना सस्ता कहाँ मिलेगा

लेकिन अब जब

हड्डियों में बसने लगा है अमरीका तो परेशान हूँ

 

बच्चे हाथ से निकल गये, वतन छूट गया

संस्कृति का मिश्रण हो गया

जवानी बुढ़ा गई, सुविधाएँ हड्डियों में समा गईं

अमरीका सुविधाएँ देकर हड्डियों में समा जाता है

व्यक्ति वतन को भूल जाता है

और सोचता रहता है-

मैं अपने वतन जाना चाहता हूँ

मगर, इन सुखों की गुलामी जो मेरी हड्डियों में बस गई ह।

इसीलिए कहती हूँ कि

तुम नए हो

अमरीका जब साँसों में बसने लगे,

तुम उड़ने लगो, तो सात समुंदर पार,

अपनों के चेहरे याद रखना

जब स्वाद में बसने लगे अमरीका,

तब अपने घर के खाने और माँ की रसोई याद रखना

सुविधाओं में असुविधाएँ याद रखना

 

जब स्वाद में बसने लगे अमरीका

तब अपने घर के खाने और माँ की रसोई याद रखना

सुविधाओं में असुविधाएँ याद रखना 

यहीं से जाग जाना..........

संस्कृति की मशाल जगाए रखना

अमरीका को हड्डियों में मत बसने देना

अमरीका सुविधाएँ दे कर हड्डियों में जम जाता है

 

अंजना संधीर

 

कालजयी रचनाकार

  मुक्तिबोध, गजानन माधव

समकालीन कविताएँ

ओमप्रकाश वाल्मीकि

कृष्णमोहन झा

निर्मल नवेन्दु

प्रीति

प्रवासी कवि

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अंजना संधीर - अमेरिका

 

नयी कलम

सी.आर. राजश्री

के.सी दुबे

माह के कवि

कृष्णकुमार (इंग्लैंड)

 

 

 

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