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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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  कविता

                          

उड़ान

 

मैंने कहा था

उस दिन

मत जाओ

अंधी-महत्वाकाक्षांओं के पीछे....

दुम हिलाते

 

घर से उखड़ा

उखड़ जाता है

ज़मीन से-

उखड़ा-पौधा

सूख जाता है

 

पर नहीं, तुम्हें तो सतरंगी

सपने दीखते थे

तारों में बस-

तुम सपने

सहेजते थे

आज तुम

खाली हाथ

भिखारियों की तरह

चाहत की

भीख माँग रहे हो......।

 

जिन्हें बोने

लाये थे

इस भव्य धरती पर

वह पनप गये है

ल गये हैं-

 

पर हो गये है-

इतने ऊँचे-कि

तुम्हार हाथ नहीं

पहुँचते-छूने को

उन्हें ....और

वे देख नहीं-पाते

कहीं नीचे तुम्हें


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