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जहाँ मैं पैदा हुआ
वे अजनबी को देखकर मुस्कुराएँगे और पूछ बैठेंगे - कहाँ हुआ बाबूसाहेब का मुकाम
वे अक्षत और जल से शालिग्राम पूजेंगे कि मुंडेर से गिरकर टूट गया अण्डा उन्हें उदास कर देगा
वे लगायेंगे ललाट पर तिलक जो क़तई ख़ून का प्रतीक न होगा बल्कि अगली सुबह की दीप्ति से जगमगाएगा
जहाँ मैं पैदा हुआ वहाँ ज़रूर बच रहे होंगे कुछ लोग जिनकी प्रार्थना से अज़ान भी उभरता होगा
213, झेलम, जवाहरलाल नेहरू विवि. नई दिल्ली - 110067
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