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झाडू
खजूर के काँटों
भरे पत्ते
अरहर या घास
कचरा
होने जैसे
अंश से बनी झाडू
कचरा साफ़ करते-करते
अन्त में कचरे
में
विलीन हो जाती
और दे जाती संकेत
अपने होने का
अपने सार्थक जीवन
का
अपना आकार पाने पर
उन घरों को देती
दो-जून रोटी
जो बनाते
झाडू।
घर-घर पहुँच
साफ़-सफ़ाई,
स्वास्थ्य
और सुन्दरता देती
झाडू।
अडियल कचरा
जो घर के बाहर जाने का नाम न ले
और छुप जाये दरवाजे
के कोनों में
उसे मनाने
छोड जाती अपना एक तिनका
और दूसरे दिन समेटकर
ले जाती झाडू।
महल से झोपडी
और मेंदिर से मस्जिद तक
एक-सी काम आती
झाडू
लक्ष्मी पूजा में
पूजी जाती
धन-व्रद्धि करती झाडू।
कचरे
से बनी
कचरा हटाती
और कचरे में ही
विलीन हो जाती
झाडू।
झाडू-
कचरे का वह अंश है
जो अपने अंशी में
विलीन होने
तक
अपने अंश के साथ
हर रोज
मेल-मिलाप रखती
और बिदा भी
उसी के साथ
होती।
झाडू-
संस्कृति
है जीवन की
देती है संदेश जीने
का
इसलिए-
झाडू और झाडू लिये हाथ
तिरस्कार के नहीं
सम्मान के हकदार
है।
के.सी. दुबे
एफ़
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85/43,
तुलसी नगर
भोपाल,
मध्यप्रदेश
  
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संपादकः
जयप्रकाश मानस
संपादक मंडलः
डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा,
डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति
तकनीकः
प्रशांत रथ |
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