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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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 कविता

       

        

झाडू

 

खजूर के काटों भरे पत्ते
अरहर या घास
कचरा होने जैसे
अंश से बनी झाडू

कचरा साफ़ करते-करते
अन्त में कचरे में
विलीन हो जाती
और दे जाती संकेत
अपने होने का
अपने सार्थक जीवन का
अपना आकार पाने पर
उन घरों को देती
दो-जून रोटी
जो बनाते झाडू।

घर-घर पहु
साफ़-सफ़ाई, स्वास्थ्य
और सुन्दरता देती झाडू।

अडियल कचरा
जो घर के बाहर जाने का नाम न ले
और छुप जाये दरवाजे के कोनों में
उसे मनाने
छोड जाती अपना एक तिनका
और दूसरे दिन समेटकर
ले जाती झाडू।

महल से झोपडी
और मेंदिर से मस्जिद तक
एक-सी काम आती झाडू
लक्ष्मी पूजा में
पूजी जाती
धन-व्रद्धि करती झाडू।

कचरे से बनी
कचरा हटाती
और कचरे में ही
विलीन हो जाती झाडू।

झाडू-
कचरे का वह अंश है
जो अपने अंशी में
विलीन होने तक
अपने अंश के साथ
हर रोज मेल-मिलाप रखती
और बिदा भी
उसी के साथ होती।

झाडू-
संस्कति है जीवन की
देती है संदेश जीने का
इसलिए-
झाडू और झाडू लिये हाथ
तिरस्कार के नहीं
सम्मान के हकदार है।
 

के.सी. दुबे

एफ़ - 85/43, तुलसी नगर

भोपाल, मध्यप्रदेश

 

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  मुक्तिबोध, गजानन माधव

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