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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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 कथोपकथन

 

तुलसीदास का विरोध करना गलत थाः राजेश जोशी


साक्षात्कारः मुकेश प्रत्यूष

 

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 प्रगतिशील आंदोलनों के पुरोधा जो कल तक किसी सत्ता या प्रतिष्ठान से जुड़ना अपनी नीतियों के विरुद्ध मानते थे, लेकिन आज उससे जुड़ने में ही अपनी भलाई समझते हैं। उनका यह यू टर्न कहीं चुभा आपको ?

हम एक अंतर्विरोध समाज में रह रहे हैं उसमें विरोधाभास तो होंगे। नौकरी करते हैं तो संभव है कि वह कलाकर्म के विपरीत हो, जो जीवन जी रहे हों, उसमें संभव है कि अपनी आत्मा तंग करे तो इस तरह की बात तो हर मनुष्य के साथ है। विरोधाभास को आप जितना ज्यादा डिजाल्व करेंगे, उसको जितना काबू में कर पाएँगे, उतना ज्यादा काम कर पाएँगे। मैं इसे उनकी मजबूरी के रूप में देखता हूँ । यह हम सब की मजबूरी है। एक लेखक के रूप में हम उन पत्रिकाओं को अपनी रचनाएँ दे देते हैं, जिन्हें प्रकाशन के रूप में हम अच्छा नहीं मानते, पर हमारा उद्देश्य होता है पाठकों तक अपनी रचनाएँ पहुँचना । इसलिए रचना और रचना से जुड़े समाज को बचाने की जिम्मेदारी हमारी है।

 

अर्थात जब दूसरे करें तो गलत और हम करें तो सही ?

नहीं, इसको ऐसे देखें कि विरोध विकल्प की स्थिति में कर रहे थे।

 

यानी विकल्पहीनता की स्थिति में हम उन रास्तों पर जा सकते हैं, जिन पर पहले दूसरों को चलने से रोकते थे ?

हाँ, जब खराब और कम खराब स्थितियों में से चुनना हो तो कम खराब को ही बचाना होगा। जैसा भारतीय लोकतंत्र में हुआ या हो रहा है। जब हमें लगा कि ऐसी पार्टी के शासन में रहने से लोकतांत्रिक प्रणाली ही ध्वस्त हो जाएगी तो हमने उनका साथ दिया, जिनका वर्षों से विरोध कर रहे थे। आपको कहीं न कहीं जनतंत्र और कोई न कोई प्लेटफार्म तो बचाए रखना है।

 

आपका काव्य-लोक क्या लोक-काव्य के करीब है ?

लोग आपसे माँग करें, ऐसी स्थिति हिंदी में बहुत कम है। आपसे यह कहें कि आपको मेरे लिए यह लिखना है, यह कहना है, ऐसा सघन संवाद हिंदी में अभी तक नहीं बना है । हाँ, होता यह है कि जब आप अपनी रचना लेकर जाते हैं तो लोक उसे तो स्वीकृत करता है या अस्वीकृत करता है, लेकिन साहित्यिक समाज से परे के लोग यदि रचना को पसंद करते हैं, चुनते हैं तो खुशी होती है कि जो इन लोगों के मन में है, हमने उसे लिखने में कामयाबी हासिल की।

 

एक तरफ तो आप कहते हैं कि भूलना बहुत जरूरी चीज़ है और दूसरी ओर स्मृतियों को लेकर कविताएँ लिखते हैं । आपकी कविताओं के संदर्भ में अगर हम देखें तो फंतासी आपकी कविता का अनिवार्य अंग-सा बनी हुई है। उससे मुक्त क्यों नहीं हो रहे ?

मेरी भी एक सीमा है। आप जब विचार कर रहे होते हैं तो एक रचनाकार से परे होकर विचार करते हैं। मैंने कई तरह की कविताएँ लिखी हैं। पहले संग्रह में भी अलग-अलग शिल्प और मुहावरों का प्रयोग किया है। एक जैसे नहीं हैं वे।

 

कवि के निजी मुहावरे पर आपको संदेह होता है, लेकिन आप भी मुहावरे गढ़ने से बाज नहीं आते, क्या इसलिए जैसा कि आप स्वयं भी मानते हैं कि मुहावरे सबसे पहले लोगों का ध्यान आकृष्ट करते हैं ?

एक लंबे समय से हिंदी आलोचना में इस बात को बार-बार रेखांकित किया गया है कि यह कवि का निजी मुहावरा है। इसका अर्थ यह हुआ कि कवि का निजी स्टाइल । मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि मनुष्य के रूप में आपके बहुत सारे मिजाज़ होते हैं, फिर आपका सामना कई प्रकार की ध्वनियों से होता है, तो जाहिर है कि जीवन भर  आप एक ही मुहावरे में कविता नहीं लिख सकते, किसी भी बड़े को देखिए निराला - एक तरफ राम की शक्तिपूजा जैसी कविता लिखते हैं। निराला इसलिए बड़े कवि हैं कि उन्होंने अपने समय की असंख्य ध्वनियों को समेटा था, समाज की विविधता के अद्धुत कवि हैं वे जो जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत या महादेवी वर्मा नहीं हो सके । इसलिए कवि को मुहावरे तो गढ़ने ही पड़ते हैं, पर हर बार नए।

 

हिंदी समाज राजेश जोशी के कवि को शुरू से ही प्यार करता रहा है और उसमें अब तक कोई कटौती नहीं हुई है, लेकिन फिर भी वह नाराज है और नाराज़ कवि के नौट्स लिखता है। यह नाराजगी किससे है उसे ?

मेरी अपनी नाराज़गी किसी से नहीं है । बहुत  कम लिखकर मैंने बहुत ज्यादा  पाया है । मैं इसलिए आलोचना या आलोचक किसी से भी नाराज़ नहीं हूँ। मेरी  नाराज़गी का कारण बहुत साफ है कि हिंदी के अध्यापकों-आलोचकों को जो काम करना चाहिए था, वह उन्होंने नहीं किया और हमें आज भी उन आलोचकों से अपेक्षा होती है, जो छायावाद के हैं या नई कविता के, हमारी पीढ़ी ने अपने आलोचक पैदा ही नहीं किए।

 

कविता में क्या चीज़ तलाशते हैं ?

तलाश तो एक कवि अपनी कविता में बहुत सारी चीज़ों की करता है । मुझे अपने शहर भोपाल से बहुत प्यार है । सन् 1984 के बाद शहर के लोगों के लिए भोपाल का अर्थ हो गया है गैस कांड जगह । इस तरह आपके शहर - जिसकी गलियाँ, सड़कें, तालाब, संस्कृति, जिन्हें आप जानते-पहचानते खत्म हो गई और हीरोशिमा की तरह एक नई पहचान बन गई । प्यारे शहर को अपनी कविता में फिर से पाने की कोशिश मैंने 1984 के बाद की कविताओं में लगातार की है । एक बेहतर मानवीय समाज की तलाश मेरी कविताओं की प्राथमिकता है

 

आपकी पसंद की दस किताबें कौन-सी हैं ?

दस नहीं, ग्यारहः महाभारत, हम्जातोव का मेरा दागिस्तान, एलिस का आश्चर्य दास्ताने खोजा नसीरुद्दीन, निराला की कविताएँ, दीवान-ए-गालिब, तुलसीदास की विनय पत्रिका, शूद्रक का मृच्छकटिम, हजारीप्रसाद द्विवेदी का अनामदास का पोथा, आजिमो देजाई का द सेटिंग सन और पास्कलदुआर्तो का परिवार । अंतिम वाला इधर जुड़ गया है ।

 

आप किस कवि से प्रभावित हैं ?

बहुत सारे कवियों से प्रभावित हूँ, लेकिन मेरे आदर्श निराला हैं । उनसे बड़ा कोई कवि नहीं ।

 

लेकिन निराला के आदर्श तो तुलसी हैं । फिर तुलसीदास क्यों नहीं ?

निराला यह बार-बार कहते तो हैं कि तुलसीदास उनके आदर्श हैं, लेकिन सिद्ध नहीं करते । निराला का मिजाज़ कबीर के ज्यादा करीब है, लेकिन वे उनका मजाक उड़ाते हैं। मुझे लगता है कि कवि जो कहता है, उसे प्रमाणित करना उसके लिए मुश्किल होता है।

 

सेवियत संघ के विघटन के बाद अचानक ऐसा क्या हुआ कि तुलसी के कट्टर आलोचक कवि उनके प्रशंसक हो गए ?

दूसरों के बारे में तो मैं यही कहूँगा, लेकिन पुनर्विचार करते समय की बात हमें ऐसा लगता है कि हमारा विरोध गलत था और दूसरे के प्रभाव में था। तुलसीदास के साथ ही हुआ ।

 

आपकी पीढ़ी का इसे सौभाग्य ही मानेंगे कि उसे अपने पाठकों का रुचि परिवर्तन नहीं करना नहीं पड़ा । लोग नई कविता से जु़ड़ गए थे। आपको क्या कभी ऐसा लगा कि कुछ उलट फेर करना चाहिए ?

माध्यम की तलाश तो एक कवि हमेशा करता है। मुझे कविता से संतोष नहीं होता इसलिए मैंने की - कई माध्यमों में काम किया । कविता, कहानी, नाटक। इस मामले में एक असंतुष्ट व्यक्ति हूँ । कविता के जितने फार्म हैं, दुर्भाग्य से वे मुझे कभी पूरे नहीं लगे। दुर्भाग्य यह भी है कि जब हमारे कान तैयार हो रहे थे तो छंद जा चुका था। हमारे कानों को छंद का अभ्यास नहीं मिला । हमने पढ़ के छंदों को जाना और पढ़कर जो छंद जाना जाता है, उससे छंद में लिखना मुश्किल है।

 

लेखन एक सामाजिक कर्म है, जो कवि के निजी जीवन को भी प्रभावित करता है। क्या आपको इससे असुविधा नहीं होती ?

 

यदि आप साहित्य, नाटक, संगीत, कला के किसी भी क्षेत्र में जाते हैं तो तय है कि आपका जीवन वैसा ही नहीं होगा, जैसा सामान्य आदमी का । आपका जीवन थोड़ा भिन्न होगा, क्योंकि आपको अपने कलाकर्म के लिए अतिरिक्त समय देना होगा तो थोड़ा परिवर्तन तो होगा ही।

 

दुनिया रोज बदल रही है। कुछ प्रदेशों में मिट्टी के चेहरों को नष्ट कर नेपथ्य में हंसने वाले लोग अब खुले में आ गए हैं। पिछले कुछ वर्षों में समाज को बर्बर मध्यकालीन युग की ओर ले जाने की कोशिश की जा रही है। धर्मयुद्ध, जिहाद जैसे शब्द जो प्रायः नहीं सुने जाते थे, अब आमफहम हो गए हैं। ऐसे में रचनाकार की क्या भूमिका हो सकती है ?

आज हमें ऐसे समाज को बचाने की ज़रूरत है, जो समता पर केंद्रित हो और जिसमें जाति, वर्ग, वर्ग के भेद, विसंगतियाँ, विद्रूपताएँ कम हों। हिंसा कई स्तरों पर होती है। केवल हत्या ही हिंसा नहीं होती है। चायघर में काम करते हुए बच्चे, चकलाघरों में काम करती हुई औरतों को देखें ,यह भी एक प्रकार की हिंसा है। जिन बच्चों को खेलने-पढ़ने का अधिकार मिलना चाहिए, वे काम कर रहे हैं तो यह ज्यादा बड़ी हिंसा है। धार्मिक हिंसा का भी दौर नया है। कितने बर्बर हत्याकांड इस दौर में हुए हैं धर्म के नाम पर, इतने वीभत्स दंगे पहले कभी नहीं होते थे । इस हिंसा का विरोध भी आज की रचना की चिंता है।

 

लेखक लिखने तक सीमित रहे ?

जब आप रचना में या कला के किसी भी क्षेत्र में सामाजिक मूल्यों की बात करते हैं या सामाजिक परिवर्तन या समाज को बेहतर बनाने की बात करते हैं तो उन आंदोलनों में भी भाग लेना चाहिए, जो इनके लिए हो रहे हैं। यह पारस्परिक रूप से दोनों के लिए लाभदायक है। आंदोलन को बल मिलता है और कलाकार की रचनात्मकता विकसित होती है। फिर रचनाकार की ही क्यों, हर चेतस व्यक्ति को सामाजिक आदोलनों में हिस्सेदारी करनी चाहिए।

 

आज का समाज एक झूठ में जीता है। क्या आप भी अपने जीवन में एक झूठ की हिस्सेदारी पाते हैं ?

मुझे लगता है कि झूठ में जीना या दो तरह के व्यक्तित्व में रहना यह वर्चस्व की स्थिति में होता है, क्योंकि उसी के साथ झूठ बना रह सकता है। जो सामान्य व्यक्ति है, उसके पास जीवन की सबसे क्रूर सच्चाइयाँ होती है। उसकी स्थिति भिन्न होती हैं। अगर हम साहित्य की दृष्टि से देखें तो यह भेद साफ दिखाई देगा।

 

हिंदी के महान साहित्यकारों पर दलित लेखन के नाम पर जिस तरह आरोप लगाए जा रहे हैं, उनका विरोध किया जा रह है, उसके पिछे क्या कारण हो सकते हैं ? कहीं केवल सस्ती लोकप्रियता हासिल करना तो नहीं ?

हाँ और क्या, प्रेमचंद या निराला के समानांतर खड़े होने वाले लेखक अभी उनके पास नहीं हैं। जुमलेबाजी से न कोई आंदोलन सार्थक होता है और न उसका कोई भविष्य होता

 

 

मुकेश प्रत्यूष

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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