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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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तुलसीदास का विरोध करना गलत थाः राजेश जोशी


साक्षात्कारः मुकेश प्रत्यूष

 

मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ जनपद में 1946 में जन्मे राजेश जोशी ने एमएससी (जीव विज्ञान) और एमए (समाजशास्त्र) की डिग्रियाँ हासिल कीं और फिर एक बैंक से संबद्ध हो गए। आपकी प्रारंभिक रचनाएँ वातायन, लहर, पहल, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान तथा सारिका आदि पत्र- पत्रिकाओं में प्रायः प्रकाशित होती रहीं। साहित्यिक पत्रिका इसलिए का संपादक करने के अलावा कुछ लघु-फिल्मों की पटकथाएँ भी लिखीं । अब तक चार कविता संग्रह, दो कहानी संग्रह और चार नाटक छप चुके हैं। समरगाथा नाम से एक लंबी कविता भी छपी है। मायकोवस्की और भर्तृहरि की कविताओं का अनुवाद भी किया। गेंद निराली मिट्ठू की नाम से बाल कविताओं का भी एक संग्रह छपा है। दो पंक्तियों के बीच नाम से छपे कविता संग्रह को सन् 2002 का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके अलावा राजेश जोशी को मुक्तिबोध पुरस्कार, माखन लाल चतुर्वेदी पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा स्मृति सम्मान, शमशेर सम्मान, पहल सम्मान से भी सम्मानित-पुरस्कृत किया जा चुका है। यहाँ प्रस्तुत हैं उनके जीवन और साहित्य पर केंद्रित मुकेश प्रत्यूष से हुई उनकी बातचीत के मुख्य अंश- संपादक 

 

क्या भाषा का सवाल महज संप्रेषण का सवाल है ?

भाषा का पहला उपयोग तो संप्रेषण ही है, पर इससे अधिक हम भाषा का उपयोग बहुत तरह की चीज़ों को सुरक्षित रखने के लिए, प्रशासनिक या व्यावसायिक व्यवस्थाओं के लिए करते हैं, भाषा हमेशा सुगम संप्रेषणीय ही नहीं होती । कई जटिल प्रक्रियाओं, जैसे विधि आदि के. लिए भाषा का प्रयोग करना होता है। इसलिए यह केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं है।

 

क्या स्वयं को अन्य की भाषा में व्यक्त किया जा सकता है ?

यह प्रयोग करने वाले की सामर्थ्य पर निर्भर करता है। मातृभाषा में तो आप अपने को सहज रूप से अभिव्यक्त कर सकते हैं, पर जो आपकी मातृभाषा नहीं है, उसे आपने कितना सीखा है या अर्जित किया है, इस पर निर्भर करता है। दुनिया में ऐसे कई महान लेखक हुए हैं, जिन्होंने अपनी मातृभाषा को छोड़कर सीखी हुई भाषा को अपने लेखन के लिए चुना और अपने को अभिव्यक्त किया। अभिव्यक्ति इस बात पर भी निर्भर करती है कि समाज से हमारे अंतर्संबंध कैसे हैं। समाज से जितना ज्यादा जुड़े होंगे, उसकी विविधता को उतना व्यक्त कर पाएँगे।

 

हिंदी की अनेक भंगिमाएँ हैं। आप कहते हैं कि इन भंगिमाओं को रचना में जगह मिलनी चाहिए तो इससे भाषा का स्वरूप कैसे स्थिर होगा ? हमें कहीं न कहीं तो बोली को भाषा से अलग करना ही पड़ेगा ?

हर भाषा के दो पक्ष होते हैं। एक प्रशासनिक और वैचारिक होता है, दूसरा सृजनात्मक होता है जिसे कभी भी मानक स्वरूप नहीं दिया जा सकता । रचना में जीवन का आना जरूरी है और जीवन विविधतापूर्ण होता है। सभी पात्र एक जैसी भाषा बोलें, एक जैसी भंगिमा में बोलें, यह संभव नहीं है। कछ लोगों ने ऐसी कोशिश की जैसे जयशंकर प्रसाद ने, लेकिन यह एक आदर्श उदाहरण नहीं है।

 

बाजारवाद के इस दौर में हिंदी का क्या भविष्य दिखता है आपको ?

जब नई अवधारणाएँ आती हैं, नई तकनीकें आती हैं, समाज में नए परिवर्तन होते हैं तो नए शब्द आते ही हैं। यह भाषा का विस्तार है। हिंदी के बारे में पवित्रतावादी ढंग से सोचने की आदत को बदलना चाहिए और थोड़ा सचीला रुख अपनाना चाहिए। रही बात हिंदी के भविष्य की तो बाजार के पास हिंदी को अपनाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

 

आज बाजार की नियामक शक्तियाँ आम आदमी की चेतना को कुंठित कर रही हैं । उसे उसकी वर्गीय चेतना और संघर्ष से दूर ले जा रही हैं। ऐसी स्थिति में एक रचनाकार होने के नाते आप किस भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं ?

बाजार शब्द व्यापक है। हम इसके इस्तेमाल से यह नहीं बता पाते कि हमारा विरोध बाजार से नहीं, नए बाजार से है, जो हमारा बाजार नहीं है।  हमारा बाजार उस जगह थी, जो लेखक के लिए सबसे जरूरी है। कबीर जब विद्रोह करते हैं तो बाजार में करते हैं - कबिरा खड़ा बाजार में....वो विभिन्न जनपदों से आए हुए लोगों के संवादों का स्थान था, नहीं तो आगरा की मंडी को लेकर नज़ीर अकबराबादी तीन-तीन गीत नहीं लिखते । आगरा के बाजार में जब मंदी आई तो उसकी पीड़ा का भाव उनकी नज़्मों में भी आया । भारतेंदु का अंधेर नगरी शुरू ही होता है बाजार से। जगह थी, जहाँ  प्रतिरोध होता था, नया विचार शुरू होता था। लोक संगीत में सबसे ज्यादा गीत बाजार को लेकर हैं। बाजार में प्रेम विकसित होता था। आज का बाजार हमारा बाजार नहीं है। इसने हमारे बाजार के स्पेस को खत्म कर दिया है। हम एक तरह के उत्पाद में बदल गए हैं, यह चिंता की बात है।

 

लेकिन इस बाजार ने हमें बहुत सारी सुविधाएँ दी हैं । आज का बाजार विक्रेता नहीं, क्रेता का हो गया है?

पर आज के बाजार में बहुत सारी चीज़ें हमारे काम की नहीं हैं। आज झुग्गियों में टीव्ही, स्कूटर या और भी बहुत सारी चीज़ें मिल जाएँगी, लेकिन शौचालय नहीं मिलेगा। हम जीवन की बुनियादी सुविधाएँ - घर, पीने का स्वच्छ पानी नहीं दे पा रहे हैं, पर और दूसरी तरह की चीज़ें दे रहे हैं, जो आम आदमी के काम की नहीं हैं। हमें सोचना होगा कि हम कैसा समाज बना रहे हैं या बनाना चाह रहे हैं ?

 

ऐसे में राजेश जोशी की इच्छा कबीर की तरह हाथ में लुकाठी लेकर बाजार में खड़ा होने की होती है या बाजार में खड़ा हूँ, खरीददार नहीं हूँ की तरह तटस्त रहने की ?

तटस्थ मुद्रा में तो कतई नहीं रहना चाहूँगा क्योंकि तटस्थ होकर आप समाज को कुछ नहीं दे पाएँगे । बाजार का विरोध करूँगा, लेकिन अंधा विरोध नहीं।

 

आपकी काव्य पंक्तियाँ जनादोलनों में नारे का काम करती हैं। इन पंक्तियों की तलाश कहाँ से करते हैं ?

ढूंढ़तेक्या हैं, समाज में जिस तरह का आंदोलन होगा, प्रतिरोध की शक्तियाँ जितनी विकसित होंगी, अन्याय के विरूद्ध एक समाज जितना ज्यादा खड़ा होगा, उतनी ज्यादा आंदोलन की पंक्तियाँ भी मिलेगी। मैंने कई बार ऐसी पंक्तियाँ भी लिखीं, जो अन्याय या साम्प्रदायिक दंगों से आहत होने की स्थिति में जनउभार से प्रेरित है। इसलिए वो ऐसी बनीं, जो ज्यादा से ज्यादा लोगों से संवाद स्थापित कर सकें।

 

क्या पढ़ रहे हैं इन दिनों ?

सुभाषित रत्नकोश, इसमें संस्कृत के उन कवियों की कविताएँ संकलित हैं, जो मुख्य धारा के नहीं थे, जैसे कालिदास, भास आदि। बहुत सारे अज्ञात कवि, जो नहीं जाने गए या फिर जिनकी कम कविताएँ मिलीं, जिनके ग्रंथ नहीं छपे, उनको इनमें संकलित किया गया है। वे ज्यादा बेहतर कवि हैं।

 

मुख्य धारा के कवियों से बेहतर ?

निश्चित रूप से इनमें लाइफ ज्यादा है।

 

फिर वे गौण क्यों हुए ?

जैसी धारा चली होगी, उस समय वे उसके साथ नहीं होंगे या फिर उन्होंने उस तरह से काफी लिखा नहीं होगा। बाद में उन पर ध्यान गया। संस्कृत में दूसरी परंपरा के जो कवि और कथाकार हुए हैं, उनमें से एक का अनुवाद राधावल्लभ त्रिपाठी ने किया है, वो मिलती है। सागर विश्वविद्यालय से छपा है। पढ़ने पर बिल्कुल आधुनिक कविता लगती है। ऐसा तो इस काल में भी हो रहा है, बहुत सारे कवियों पर ध्यान दिया ही नहीं जा रहा है। ऐसा हर काल में होता है। छायावाद में सिर्फ चार कवि थोड़े ही थे या भक्तिकाल में सिर्फ चार कवि थोड़े ही थे या भक्तिकाल में सिर्फ सूर-तुलसी ही नहीं थे, और भी थे। हमें रामचंद-शुक्ल का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उन्होंने औरों का पता दिया।

 

गौण होने में क्या उनके समकालीन आलोचकों का योगदान नहीं होता ?

देखिए, आलोचक कुछ नहीं करता । जो दृश्य में है, आलोचक उसी को देखता है। कुछ कवि तो विड्रा कर जाते है या फिर वे कुछ अजीब से मोह में पड़ जाते हैं। क्लासिक होने के लिए उन्हें कुछ अजीब से रास्ते दिखते हैं। क्लासिक कोई इस वज़ह से नहीं होगा। क्लासिक वही होगा, जो समकालीन हो । कभी-कभी क्या होता है कि कवि कहीं ऐसी जगह चला जाता है, जहाँ कनवसेंशन खत्म हो जाता हैं और वे फिर जान ही नहीं पाते कि क्या धारा चल रही है ? वे कुछ अपने ढंग से लिखने लगते हैं या चुप हो जाते हैं।

 

मुक्तिबोध, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और नागार्जुन को आपने हिंदी कविता का पाँच तत्व माना है और प्राण तत्व निराला को । क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि आपने अज्ञेय के साथ कुछ अन्याय कर दिया, क्योंकि अज्ञेय के बिना तो समकालीन हिंदी कविता की चर्चा पूरी ही नहीं होती ?

 नहीं, अन्याय नहीं है। काया में और भी बहुत सारी चीज़ें हैं, लेकिन मुख्य ये पाँच  तत्व ही हैं। मैं ऐसा थोड़े ही कह रहा हूँ कि अज्ञेय महत्वपूर्ण नहीं हैं। समकालीन काव्य की जो धारा है, उसमें वात्स्यायन (अज्ञेय) जुड़ते तो हैं, लेकिन एक कवि के रूप में वे मुझे कभी बड़े नहीं लगे। वे गद्यकार बहुत अच्छे हैं।

 

कहीं आपका वाम तो आपको यह कहने के लिए बाध्य नहीं कर रहा ?

नहीं, बाबा (नागार्जुन) को छोड़ दें तो चारों कवि ऐसे हैं, जो किसी वाद से उतने ही मुक्त हैं।

 

कविता हाशिए की चीज़ हो गई है। कवि जैसे-जैसे आम आदमी के करीब होने की कोशिश कर रहा है, आम आदमी कविता से उतना ही ज्यादा दूर होता जा रहा है। क्या कारण लगता है इसका आपको ?

कविता से समाज की दूरी अकविता के दौर में बनी थी। अकविता ने मूल्यगत स्तर के साथ-सथ भाषा और शिल्प के स्तर पर भी काफी परिवर्तन किए । एक जो ट्रेडिशन बना हुआ था पढ़ने का, उसको बहुत देर तक भटका दिया। लोगों को आज भी लगता है कि नई कविता लिखी जा रही है। वो प्रॉब्लम दे रहा है, पर आज की कविता संप्रेषणीय कविता कभी नहीं थी।

 

लेकिन जिसके लिए किया, वही सुनना-पढ़ना नहीं चाहता....

इसके बहुत सारे कारण हैं। मीडिया और हमारे एजुकेशन सिस्टम जब तक कविता को स्वीकार नहीं कर लेते, तब तक अकेला कवि कुछ नहीं कर सकता । हमारे पास जितनी व्यावसायिक पत्रिकाएँ थीं। जो बड़े दायरे में सर्कुलेट लेती थीं, वो सब बंद हो गईं। अब इक्का-दुक्का अखबार और लघु-पत्रिकाएँ, लोकप्रिय माध्यमों का समाप्त हो जाना एक बड़ा संकट है।

 

आज जिस लोकप्रिय माध्यम की बात करते हैं तो जब हमारे कवि कविता में समाज की बात नहीं करते थे, जैसे विद्यापति, वे तो शुद्ध दरबारी कवि थे, लेकिन उनकी कविताएँ आम जनता में तब भी लोकप्रिय थी, आज भी हैं। उन्हें संकट न तब था, न अब है ?

तब एक तो वाचिक परंपरा थी, दूसरे समाज बहुत छोटे-छोटे थे, उतनी जटिलताएँ नहीं थीं, आपाधापी नहीं ती, जनपद थे तो वाचन से चीज़ें चली जाती थीं, आज वैसा वाचिक माध्यम नहीं हो सकता । अब यह हो सकता है कि जो संचार माध्यम हैं, वे अपना योगदान दें। उस परंपरा को लौटाएँ। शुरू के दिनों में दूरदर्शन ने यह कार्य किया । हिंदी के जितने अच्छे कवि थे, सबने उस पर काव्य पाठ किया । सबसे अच्छे उपन्यासों पर सीरियल बने, लेकिन जैसे ही बहुत हो गया। इस तरह संचार माध्यम कविता, साहित्य और संस्कृति के विकास में कोई रुचि नहीं  दिखा रहे। वे उच्चवर्गीय विलासिता का माध्यम बन गए हैं।

 

तो ऐसे में एक कवि या रचनाकार का दायित्व क्या बनता है ?

रचनाकार तो लड़ रहा है, लेकिन उसकी आवाज़ को प्रसारित करने के लिए कोई माध्यम नहीं है। समाज में एक माध्यम ऐसा जरूर होना चाहिए, जो एक सही बात को प्रसारित कर सके, पर सब चीज़ों पर बाजार हावी हो, सब चीज़ों को बाजार ने अपने कब्जे में ले लिया हो, तब आप क्या करेंगे ?

 

क्या इसके लिए रचनाकार दोषी नहीं है ?

मुझे लगता है कि रचनाकार उतना दोषी नहीं है। सोवियत संघ के विघटन के बाद से प्रतिरोध की शक्तियों का क्षरण हुआ है। जब तक प्रतिरोध की शक्तियाँ थीं और दो ध्रुवीय समाज था संसार में तो एक दूसरी आवाज़ आपको समानांतर रूप से सुनाई देती थी। सोवियत संघ के पराभव के तत्काल बाद संसार एक ध्रुवीय हो गया और दूसरी आवाज़ के लिए कोई स्पेस नहीं रहा । ये संकट केवल साहित्यिक नहीं है। वह प्रतिरोध की सारी शक्तियों का संकट है, इसमें प्रतिरोध की तमाम शक्तियों का क्षरण हो रहा है। विचारों का क्षरण हो गया है। राजनीति में विरोध का कोई मतलब नहीं रह गया है। ऐसा नहीं है कि कवि या साहित्यकार चुप बैठा है, वह लगातार प्रतिरोध कर रहा है। लिख रहा है, बोल रहा है, पर उस आवाज़ को हम महसूस नहीं कर पा रहे ।

 

यही तो मैं कह रहा हूँ कि हम जिनकी बात कर रहे हैं, वही हमें सुनने को तैयार नहीं, जहाँ तक पाठकीयता का सवाल है तो अँगरेज़ी किताब की प्रतियों की प्रसार संख्या दिनोदिन बढती जा रही और हिंदी किताबों की प्रसार संख्या घटती जा रही है।

इसमें बहुत सारी चीज़ें एक दूसरे से जुड़ी हैं और काम्पलिकेटेड हैं। पूरा प्रकाशन जगत एक तरह से दिल्ली केंद्रित है। दिल्ली में भी वह लगभग व्यापारियों के हाथों में चला गया है। पहले प्रकाशन जगत से जुड़े हुए लोगों में खास तरह की प्रतिबद्धता थी। कवि-लेखक रहे या लेखन से जुड़े लोग, इसके कर्ताधर्ता होते थे। अब सभी व्यापारी किस्म के लोग आ गए। आज ऐसा कोई प्रकाशन नहीं ढूँढ़ सकते, जिसकी कोई दृष्टि है प्रकाशन या साहित्य के बारे में ।

 

आप कहते हैं कि हिंदी प्रकाशन व्यावसायियों के हाथों में हैं तो व्यवसायी जितना ज्यादा व्यावसाय करेगा, उतना ज्यादा लाभ कमाएगा, फिर प्रतियाँ कम क्यों हो रही हैं

वो कम काम कर ज्यादा लाभ चाह रहे हैं ?

 

यह कैसे कह सकते हैं ?

इसलिए कि उनका कोई नेटवर्क नहीं है बिक्री का । वे करते क्या हैं कि तीन सौ प्रतियाँ छापी, उसे तत्काल लाइब्रेरी में भेजा। पहले उत्पादन खर्च का पाँच गुणा मूल्य पुस्तकों का रखा जाता था, आज पुस्तकों के मूल्य निर्धारण का कोई तर्क नहीं रह गया है। वे बेहद करना नहीं चाहता, क्योंकि उसमें रिटर्न देर से आएगा।

 

ऐसा क्यों नहीं होता कि लेखक प्रकाशन इकाई बनाकर, जैसा कुछ पूर्ववर्तियों ने किया था, इस समस्या का समाधन निकाल लेते ?

यह सच है कि हिंदी में वैसे सहकारी प्रकाशन नहीं बने, यह काम पीपीएच कर रहा था, लेकिन सोवियत संघ के बिखरने के बाद वह भी बिखर गया।

 

क्या आपके मन में कभी ऐसा आया कि पुस्तक प्रकाशन और बिक्री, जिसकी चर्चा आप कर रहे हैं, उसका नेटवर्क बने ?

खूब आया, हर बार हम लोगों ने (जब मैं प्रगतिशील लेखक संघ में था) शरद बिल्लौरे का कविता संग्रह छापा। बहुत ही सस्ता और प्रगतिशील लेखक संघ की इकाइयों द्वारा उसकी बिक्री हुई थी, फिर तीन किताबें हमने और छापीं, पर उसे कंटीन्यू नहीं कर पाए, जैसा कि करना चाहिए। अगर करता तो प्रकाशन का रूप ले लेता। प्रकाशन आज भी उतनी ही बड़ी समस्या बनी हुई है, जितनी पहले थी, बल्कि पहले कम से कम चार-पाँच बड़े पाठक वर्ग तक जाने वाली पत्रिकाएँ थीं। पारिवारिक पत्रिका की जो अवधारणा है, वह खत्म हो गई। आज ऐसी कोई पारिवारिक पत्रिका नहीं है, जो मध्यवर्ग के परिवार में नियमित रूप से आए और पढ़ी जाए। अभी जो साहित्यिक पत्रिकाएँ हैं, उन्हें या तो केवल आप पढ़ेंगे या कोई कहानी है तो परिवार में लोग उसे पढ़ेंगे, लेकिन जो साहित्यिक बहसे हैं, उससे किसी सामान्य मध्यवर्गीय परिवार का कोई लेना-देना नहीं रह गया है।

 

पारिवारिक पत्रिकाओं का समाप्त हो जाना, सम्मेलनों का समाप्त हो जाना, किताबों की बिक्री का कम हो जाना यह सब आखिर हिंदी में ही क्यों हो रहा है, तब भी जब हर रचनाचाकार-पत्रकार आम आदमी के करीब होने और उसकी समस्या को सार्वजनिक करने का दावा कर रहा है ?

हिन्दी में ये काम बड़े प्रकाशन गृहों के पास थे, उन्हें इसमें लागत के अनुरूप कोई तत्काल लाभ नहीं दिखाई दिया।

 

जब बड़े प्रकाशन गृह इन कार्यों में लगे थे तो उन्हें सेठाश्रयी संस्थान कहा जाता था और रचनाकारों का एक वर्ग उनके विरुद्ध था। उससे जुड़ना नहीं चाहता था और जब सेठों ने उनसे अपने हाथ खींच लिये तो रचनाकारों के उसी वर्ग द्वारा कहा जा रहा है कि उनके पोषण के अभाव में यह स्थिति उत्पन्न हुई है।

यह सच है कि एक समय में उन संस्थाओं का विरोध हुआ था, क्योंकि उनका चरित्र कुछ गड़बड़ था। एक खास तरह की चीज़ें वे परोस रहे थे। उन्हें जिस तरह के साहित्य को जगह देनी चाहिए थी, उसे नहीं दे रहे थे, पर हमारी पूर्ववर्ती पीढ़ी जो उनका विरोध कर रही थी, उसे शायद यह उम्मीद कर रही थी, उसे शायद यह उम्मीद नहीं रही होगी कि वे इससे इस तरह से अपने हाथ खींच लेंगे।

कमशः...

मुकेश प्रत्यूष

 

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