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हिंदी को
किसी से कोई खतरा नहीं
नामवर सिंह से संजय
कुंदन की बातचीत
अस्सी
के नामवर
सिंह
हिंदी के साहित्यिक-बौद्धिक जगत में लोकप्रियता के
शिख र पर हैं। कुछ लोग तो मजाक
में उन्हें हिन्दी साहित्य का अमिताभ बच्चन कहते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि
हिन्दी के साहित्यिक-वैचारिक विमर्श का हर रास्ता
नामवर सिंह से होकर गुजरता है।
क्या मजाल,
जो कोई उन्हें नकार दे। लोग या तो उनसे सहमत होते हैं
या उनका विरोध
करते हैं। हिंदी आलोचना को नई ज़मीन देने वाले नामवर
सिंह ने कविताएं लिखीं,
पत्रकारिता की,
कम्युनिस्ट पार्टी में काम किया,
चुनाव लड़ा और अनंत यात्राएं कीं।
वे पेशे से अध्यापक रहे हैं,
शायद इसीलिए व्याख्यान देने का उन्हें व्यसन सा हो
गया। पहले क्लास में व्याख्यान देते थे,
अब देश भर में घूम-घूम कर व्याख्यान दे रहे
हैं। लेखक हों या पत्रकार,
साहित्य के छात्र हों या संस्कृतिकर्मी,
सब उन्हें सुनना
चाहते हैं। वे बुजुर्गों से लेकर युवाओं के भी स्टार
हैं। भारतीय से लेकर पाश्चात्य
काव्यशास्त्र,
अपभ्रंश से लेकर उत्तर आधुनिक साहित्य पर समान अधिकार
रखने वाले
नामवर सिंह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों से मुठभेड़ करते
हैं और युवतर लेखन पर पैनी
नजर रखते हैं। उनका मानना है कि साहित्य की
प्रासंगिकता हर युग में बनी रहेगी। वे
कहते हैं कि हर तरह के प्रहारों के बावजूद हिंदी पूरी
मजबूती के साथ बची रहेगी।
भाषा-साहित्य,
समाज और राजनीति के कुछ ज्वलंत सवालों पर डॉ. नामवर
सिंह से युवा
कवि संजय
कुंदन की बातचीत :
हिंदी के बारे में इन
दिनों दो तरह की बातें कही जा रही हैं। एक तो यह कि
बाजार के बढ़ते असर और सूचना
क्रांति के विस्फोट ने इसके अस्तित्व पर संकट पैदा कर
दिया है,
लेकिन एक तबका यह भी
कहता है कि इसका निरंतर प्रसार हो रहा है और हिंदी ने
अपने को नए समय के अनुरूप ढाल
लिया है,
आधुनिक तकनीक और संचार की जरूरतों के हिसाब से उसका एक
नया रूप विकसित हो
रहा है। आप क्या सोचते हैं?
नामवर सिंह -
हिंदी के साथ विडंबना यह है कि इसकी तीन
दुनियाएं हो गई हैं। यानी आज इसके तीन रूप हैं। पहला
तो राजभाषा वाला रूप है,
दूसरा
वह जिसमें साहित्य रचा जा रहा है और तीसरा वह जो टीवी
या मीडिया में प्रचलित है।
आजादी की लड़ाई के दौरान हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने
का अभियान चला। उस समय हिंदी
के एक निश्चित रूप की तलाश चल रही थी,
उसे एक व्यवस्थित रूप दिया जा रहा था। आजादी
के बाद उसे राजभाषा घोषित किया गया और इस तरह एक
सरकारी हिंदी सामने आई। सरकारी
कामकाज के हिसाब से उसे विकसित किया गया। अब इसी क्रम
में उसे विश्व भाषा बनाने पर
भी जोर है। इसके लिए उसमें कुछ अंग्रेजी के शब्द शामिल
किए जा रहे हैं। लेकिन गौर
करने की बात है कि इन कोशिशों में हिंदी का साहित्यकार
शामिल नहीं है। यह काम गैर
साहित्यिक लोगों ने किया और कर रहे हैं। हिंदी का
दूसरा रूप वह है जिसमें साहित्य
रचा जा रहा है। यह हिंदी के वृहत्तर समाज की भाषा है,
जनता की भाषा है। इसमें समाज
की आत्मा बोलती है। इसमें अद्भुत वैविध्य है। इसमें
विभिन्न अंचलों,
क्षेत्रों की
बोलियों की खनक है,
मुहावरे हैं। यह एक तरफ रेणु,
केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन
जैसे रचनाकारों की भाषा है तो दूसरी तरफ प्रभाष जोशी
जैसे पत्रकार की। इनमें ठेठ
हिंदी का ठाठ झलकता है। तीसरी हिंदी वह है जिसका
प्रयोग मीडिया कर रहा है। असल में
यह बाजार की भाषा है। वैसे बाजार की भाषा तो उर्दू भी
थी,
लेकिन वह एक अलग तरह का
बाजार था। आज का बाजार अलग है। यह विश्व बाजार है,
जिसमें उत्पादन और विपणन की
प्रणाली बिल्कुल बदल चुकी है। आज ब्रैंड पर जोर है। आज
उत्पादों और ब्रांडों के नाम
अंग्रेजी में हैं,
इसलिए भाषा में अंग्रेजी के शब्द आ रहे हैं। देश का नव
धनाढ्य
वर्ग खुद को इसी में अभिव्यक्त कर रहा है।
कुछ लोग इस भाषा से चिंतित हैं और इसे हिंदी पर खतरे
के
रूप में देखते हैं।
नामवर सिंह -
ऐसी बात नहीं है। हिंदी को किसी से कोई खतरा
नहीं है। कोई भी जीवित भाषा दूसरी भाषाओं से शब्द लेती
है और उन्हें अपने भीतर पचा
लेती है। हिंदी ने भी यह काम किया है और कर रही है।
अंग्रेजी के कई शब्द हिंदी में
घुल-मिल गए हैं। एक दौर में फारसी का वर्चस्व था।
लेकिन फारसी से हिंदी को कोई
नुकसान नहीं पहुंचा। फारसी से अनेक शब्द हिंदी में आए
और उनका तद्भवीकरण हुआ।
तुलसीदास की रचनाओं में फारसी के शब्द भरे पड़े हैं।
इसलिए अंग्रेजी से हिंदी को
कोई नुकसान नहीं होगा। वैसे साहित्य की जो भाषा है वही
सबसे ज्यादा टिकाऊ रहेगी।
हां,
शिक्षण के स्तर पर यह ध्यान रखना होगा कि हम व्याकरण
का ज्ञान कराते रहें,
उसे
न छोड़ें।
साहित्य के पाठक कम हुए हैं,
किताबें कम बिकती हैं। क्या इसे साहित्य की कम होती
प्रासंगिकता के लक्षण मानें?
क्या समाज साहित्य से मुंह मोड़ रहा है?
नामवर सिंह -
साहित्य की प्रासंगिकता न
कम हुई है न होगी। किसी भी सभ्यता को हम उसके साहित्य
और कला के जरिए ही जानते हैं।
एक लुप्त हो गई सभ्यता-संस्कृति के बारे में जानकारी
प्राप्त करने का एक अहम जरिया
साहित्य ही होता है। अब जैसे गुप्त काल को लें। इसके
बारे में हम उस दौर के साहित्य
से ही बहुत कुछ जानते हैं। कालिदास की रचनाएं उस दौर
के मानस को अभिव्यक्त करती
हैं। यही बात वैदिक और मौर्य काल के साथ भी है। उस समय
के सामाजिक-आर्थिक जीवन की
जानकारी साहित्य से होती है। मुगल काल को हम साहित्य
से जानते हैं या स्थापत्य से।
लेकिन सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में हमारी जानकारी
अपेक्षाकृत कम है,
क्योंकि उसका
साहित्य हमारे पास नहीं है। हम उसकी लिपि तक नहीं पढ़
पाए हैं। स्वाधीनता संग्राम
या उस दौर के बारे में कई चीजें तो सरकारी रिपोर्टों
और बहसों में भी उपलब्ध है मगर
हकीकत बयान करेगा साहित्य ही। साहित्य तो हमारी
धड़कनों से जुड़ा है। इसे किसी
व्यवस्था ने नहीं शुरू किया। यह न तो राजतंत्र की देन
है,
न धर्मतंत्र की न
भूमंडलीकरण की। साहित्य हर दौर में रहेगा। इसकी मूल
आत्मा है लोकतंत्र। प्रजातंत्र
इसका मूल स्वभाव है। यह जनतंत्र ही तो है कि साहित्य
में अज्ञेय और मुक्तिबोध एक
साथ हैं। भक्तिकाल में वैविध्य देख लीजिए। जिस रीतिकाल
में विविधता में कमी थी,
उसका साहित्य कमजोर माना जाता है और उस दौर को
सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं है।
समाज में लोकतंत्र खत्म भी हो जाए,
साहित्य में वह जीवित रहेगा। जब देश में
आपात्काल लागू हुआ,
तो साहित्य ने उसका विरोध किया। इसलिए साहित्य हमेशा
प्रासंगिक
रहेगा। उसे इस आधार पर न आंका जाए कि उसे ज्यादा लोग
पढ़ रहे हैं या कम। लोकप्रियता
उत्कृष्ट साहित्य का कोई मापदंड नहीं है। श्रेष्ठ
साहित्य या कला सर्वसुलभ हो यह भी
जरूरी नहीं। हर समय में उत्कृष्टता का एक उच्चतर
पैमाना होता ही है। नोबेल पुरस्कार
किसी कमजोर लेखक को नहीं मिल जाता। हॉलिवुड की फिल्में
बिजनेस खूब कर लें पर वे
उत्कृष्ट नहीं मानी जातीं। बड़े पुरस्कार कला फिल्मों
को ही मिलते हैं। कान्स फिल्म
फेस्टिवल जैसे आयोजनों में अच्छी और कलात्मक फिल्मों
का ही दबदबा रहता है। यूरोप
में तो कला फिल्में ही मुख्यधारा की फिल्में मानी जाती
हैं। इसलिए जिस पॉपुलर कल्चर
की बात की जा रही है,
वह बहुत टिकने वाला नहीं है। अभी हम एक संक्रमण काल से
गुजर
रहे हैं। जल्दी ही लोग श्रेष्ठ साहित्य और कला की तरफ
मुड़ेंगे।
साहित्य में इन दिनों व्यक्तिगत टीका-टिप्पणियां खूब
हो
रही हैं। एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का सिलसिला सा चल
पड़ा है।
नामवर सिंह -
यह
कोई नई बात थोड़े ही है। पहले भी ऐसा होता आया है। असल
में हमलोग निम्न मध्यवर्गीय
पृष्ठभूमि से आए हैं। हमारी प्रतिक्रिया कई बार निजी
और वैयक्तिक कोण ले लेती है।
आज भी साहित्य में कई गुट हैं। इनमें खींचतान चलती
रहती है। लेकिन सचाई यह है कि
इनमें आपस में कोई बुनियादी मतभेद नहीं है। साहित्य के
सरोकारों को लेकर सब एक राय
रखते हैं।
इधर कहा जाने लगा है कि नई
पीढ़ी कुछ खास नहीं कर रही है। वह पुरानी चीजों को ही
दोहरा रही है।
नामवर सिंह -
यह गलत आरोप है। हिंदी साहित्य की विशेषता है कि इसमें
हर दस साल के
बाद एक नई पीढ़ी एक नई भाषा,
एक नई पहचान के साथ सामने आ जाती है। पिछले एक दशक में
जो पीढ़ी आई है,
वह पुरानी पीढ़ी से काफी अलग है। लेकिन इस नई पीढ़ी ने
अपनी पुरानी
पीढ़ी को खारिज नहीं किया है,
उससे काफी कुछ ग्रहण कर अपना अलग रास्ता तैयार किया
है। इस पीढ़ी का अपना एक अलग अंदाज है,
मुहावरा है। आज हर क्षेत्र में एक ताजगी
दिखती है चाहे वह कविता हो,
कहानी हो या आलोचना।
कहा तो यह भी जाता है कि युवा कवियों ने केदारनाथ
सिंह या विष्णु खरे की भाषा की नकल की है।
नामवर सिंह -
जो कह रहे हैं उन्हें
कहने दीजिए,
पर मैं ऐसा नहीं मानता। आज जो भी नए कवि हैं उन पर
किसी का प्रभाव नहीं
है। वे लीक नहीं पीट रहे। उनकी अपनी भाषा है जो सिर्फ
उनकी है। आप युवतर कवियों को
देख लीजिए,
चाहे वे शिरीष मौर्य हों या हरे प्रकाश उपाध्याय,
सबका अपना तरीका है
बात को कहने का। ये अपने विशिष्ट अनुभव के साथ आए हैं।
कहानियों के साथ भी यही बात
है। नीलाक्षी सिंह की कहानी
'परिन्दे
का इंतजार-साकुछ'
एक अद्भुत प्रेमकथा है,
जिसमें बाबरी मस्जिद विध्वंस का सिर्फ रेफरेंस आया है,
लेकिन यह इस मामले पर लिखी
गई कई कविताओं और कहानियों से बेहतर है। आलोचना में भी
बहुत अच्छा काम हो रहा है।
कृष्णमोहन की हाल में आई किताब उल्लेखनीय है। उनके पास
काफी अच्छी समझ है। इसी तरह
मनमोहन (हालांकि उम्र के हिसाब से वे वरिष्ठ हैं) की
किताब भी महत्वपूर्ण है। आप
साहित्य से हटकर देखिए। मीडिया में भी एक नई पीढ़ी आ
चुकी है। अब पुराने लोग नहीं
रह गए हैं। इस नई पीढ़ी की सोच और तरीका बिल्कुल अलग
है। इसने मीडिया को काफी बदला
है। मैं युवाओं को लेकर आश्वस्त हूं। और यह बात मैं
किसी रणनीति के तहत नहीं कह रहा
हूं।
आपने वामपंथी राजनीति को करीब से
देखा है। क्या आपको नहीं लगता कि वामपंथ की चमक कमजोर
पड़ी है,
उसमें बिखराव आया
है।
नामवर सिंह -
उसमें बिखराव कहां आया है। आज भी उनका एक मोर्चा है।
चाहे वह
पश्चिम बंगाल में हो या केंद्र की राजनीति में।
महत्वपूर्ण सवालों पर ये पार्टियां
स्टैंड लेती हैं। मुझे लगता है नेपाल की घटना का इन पर
भी असर होगा। आने वाले समय
में इनमें नए सिरे से गोलबंदी हो सकती है और इनकी
गतिविधियां भी तेज होंगी।
लेकिन वामपंथ से प्रभावित
साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों की गतिविधियों में एक
ठंडापन आया है।
नामवर सिंह -
ऐसा ऊपरी तौर पर लगता है,
पर हकीकत यह नहीं है। सभी लेखक संगठन
सक्रिय हैं,
उनके बीच में कोई दीवार नहीं है,
एक खुलापन है। सब एक-दूसरे से मिल रहे
हैं,
विचार विमर्श और बहस कर रहे हैं। उनकी पत्रिकाएं निकल
रही हैं,
वे बड़े-बड़े
आयोजन भी कर रहे हैं। अभी
1857
के सवाल पर सबने अपने-अपने तरीके से बहस में हिस्सा
लिया। इसी पर केंद्रित
'नया
पथ'
का अंक आया। लेखक और संस्कृतिकर्मी
सामाजिक-राजनीतिक सवालों पर अपनी राय व्यक्त कर रहे
हैं,
स्टैंड ले रहे हैं। पिछले
दिनों नंदीग्राम के मुद्दे पर वामपंथी बुद्धिजीवियों
ने लेफ्ट सरकार की आलोचना की।
मायावती की सोशल इंजीनियरिंग को कुछ लोग
राजनीति के नए प्रस्थान बिंदु के रूप में देख रहे हैं।
माना जा रहा है कि इससे समाज
का बना-बनाया ढांचा टूटेगा,
एक नया समीकरण तैयार होगा और जाति प्रथा शिथिल होगी।
नामवर सिंह -
मायावती की इस सोशल इंजीनियरिंग में कुछ भी नया नहीं
है। कांग्रेस
ने इस जातीय समीकरण को पहले ही आजमाया है। दरअसल
आरक्षण की राजनीति की अपनी एक सीमा
है। बाबा साहब आंबेडकर ने भी कहा था कि रिजर्वेशन एक
खास समय तक के लिए ही लागू
किया जाए। लेकिन उनके अनुयायियों ने इसे एक हथियार की
तरह इस्तेमाल करना शुरू कर
दिया है। इससे एक अलग तरह का कास्ट सिस्टम बनता जा रहा
है। जाति प्रथा के बावजूद
पहले सामाजिक जीवन में सौहार्द था,
भाईचारा था। हिंदू-मुस्लिम या कुछ जातियों के
बीच खानपान न होने के बावजूद उनमें विद्वेष नहीं था।
संबंधों में एक सहजता थी।
प्रेमचंद की
'पंच
परमेश्वर'
कहानी याद कीजिए। पर आज कटुता बढ़ गई है। सहजता खत्म
हो
गई है। सरकारी नौकरियों में जगह पा लेने या सुविधाएं
जुटा लेने के लिए एक होड़ सी
लगी हुई है। जबकि सिर्फ इससे कुछ नहीं होने वाला है।
इससे आगे बढ़कर सोचना होगा।
हां,
एक बात जरूर है कि लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति एक
जागरूकता आई है। सभी
समुदाय इसे लेकर सचेत हो रहे हैं।
आज
दुनिया में साम्राज्यवाद का खतरा बढ़ा है। लेकिन इसे
लेकर कोई मजबूत प्रतिरोध नहीं
दिखाई देता।
नामवर सिंह -
प्रतिरोध शुरू हो गया है। आज बुश का वर्चस्व टूटा है।
खुद उन्हीं के देश में उनका विरोध हो रहा है। इराक में
उन्होंने जो कुछ किया वह
फासिज्म था। आज उनके इराक अभियान की अपने ही देश में
आलोचना हो रही है। मुझे लगता
है इराक उनकी कब्र बनेगा। नए पूंजीवाद को लेकर भी
अर्थशास्त्रियों में बहस शुरू हो
गई है। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के अंतर्विरोध सामने
आने लगे हैं। अब इस बात की
पड़ताल की जाने लगी है कि इसका कृषि पर क्या असर पड़ा
है,
पर्यावरण पर क्या असर पड़
रहा है। एक नए वैकल्पिक ढांचे की तलाश जारी है। दुनिया
में अलग-अलग स्तरों पर विरोध
शुë |