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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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  कहानी

 

गुलमेंहदी की झाडियाँ


तरुण भटनागर

 

स दिन धूप बहुत तेज थी । सुबह से ही लू चल रही थी । रेल्वे ब्रिज की रोड़ से उchild labourठती गर्म हवा सड़क के ऊपर दीख रही थी।मानो कोई पारदर्शी पर्दा हवा में डोल रहा हो।गर्मी के कारण रोड पर जगह-जगह पानी गिरे होने का भ्रम होता था। डामर पिघलकर फिसलन भरी हो गई थी । इस रोड़ से चलकर, ब्रिज के नीचे उतरते समय वह पिघली डामर से सावधान रहती थी । पिछले साल ऐसी ही गर्मी में रोड से उतरते समय उसकी चप्पल डामर में फंसकर टूट गई थी। चप्पल ऐसी टूटी कि फिर जुड़ नहीं पाई । उसे पूरी गर्मी नंगे पैर ही चलना पड़ा था ।पीछले साल वह पूरी गर्मी पिघलते डामर पर नंगे पैर चली थी। पिघलते डामर वाली रोड पर तपती धूप में नंगे पैर चलते हुए उसे तकलीफ होती थी । पैर का तला जलने लगता । वह थोडी देर तक ब्रिज के नीचे खडे रहकर खुद को तैय्यार करती थी,कि वह इस जलते पुल को कैसे पार करेगी।फिर वह अंगूठे और ऐडियों को रोड पर टिकाकर और पैर का तला ऊपर खींचकर तेजी के साथ दौड़ती सी रोड़ पार करती थी।वह पूरी गर्मी माँ से चप्पल के लिए जिद करती रही। उसने मा¡ से चप्पल के लिए बहुत जिद की । वह रोती झींकती सी जिद करती थी । तब जाकर उसे नई चप्पल मिल पाई । बरसात बाद उसे माँ ने नई चप्पल लाकर दी । अब वह पिघली डामर पर सतर्क होकर चलती है।इस चप्पल को वह डामर में फंसाकर खोना नहीं चाहती है।

 

रोड़ से नीचे उतरकर रेल्वे का यार्ड है । यार्ड से ओव्हर ब्रिज और स्टेशन दोनों दिखते हैं । पर गर्मियों की दोपहर में, दोनों जगह वीरानी सी छाई रहती है । दिन की भरी दोपहर की वीरानी, जो रात के चिर-परिचित सन्नाटे से कहीं ज्यादा भयावह होती है।चमकते सूरज के साथ का सन्नाटा,जो रात के सन्नाटे से ज्यादा मनहूस होता है।रेल्वे स्टेशन में सवारी गाड़ी, महज रूकने के नियम के कारण रूकती है । ना कोई चढ़ता है और ना कोई उतरता है । ओव्हर ब्रिज पर भी कोई नहीं दिखता है । एक्का-दुक्का थ्री व्हीलर या कोई ट्रक थोड़े-थोड़े समय के अन्तराल में, मुर्दानगी को चीरते हुए दिख जाते हैं ।

 

वह यार्ड के पास तक उतर आई । तपती हुई पटरियों पर एक मालगाड़ी खड़ी है । वह यहाँ तीन दिन से खड़ी है । उसके वैगनों के गेट लटके हुए हैं । आने के बाद वह इस मालगाड़ी की छाया में क्षण भर को सुस्ताती है । उसकी काली देह में जगह-जगह खरोंच के निशान हैं । जब वह अपने काम में मशगूल रहती है तब गुलमेहंदी की सूखी डाल गर्म हवा के झोंको के साथ उसके शरीर से रगड़ जाती है और ऐसा एक और निशान बना देती है । उसकी फ्रॉक में बटन नहीं हैं । पीठ पर वह व्ही के आकार में खुली रहती है । कभी-कभी वह इतनी ज्यादा खुल जाती है कि उसकी एक बाँह कुहनी तक उतर आती है और फिर वह एक झटके के साथ उसे कंधे पर चढ़ा लेती है । उसके रूखे बिखरे बाल, उसके छोटे-नाज़ुक कन्धों पर गुच्छे के गुच्छे बिखरे रहते हैं । धूप में जब वह काम करती है, तब उसका सिर बहुत खुजाता है।वह बुरी तरह से बाल खुजलाती है और फिर उसके बाल नारियल के जूट की तरह खड़े हो जाते हैं ।

 

वह मालगाड़ी की छाया में, पटरी के किनारे पड़े गिट्टी के ढेर पर थोड़ी देर बैठी रही । रोज वह सुन्दर के आने तक इसी तरह बैठी रहती है । सुन्दर उससे छोटा है और उसकी माँ की झुग्गी के पास ही रहता है। पहले वह एक होटल में काम करता था । उसने, उसे एक बार वह होटल दिखाया था । जहाँ वह रहती है, उससे थोड़ी दूर एक देसी शराब की दुकान है और उसी के पास वह होटल है । वह वहाँ बर्तन साफ करने वालों की मदद करता था । साबुन और राख से मँजी प्लेट, गिलास धोने का काम । पहले होटल के मालिक ने उसे पानी लाने के काम में लगाया था । पर वह पानी की बाल्टी उठा नहीं पाता था, सो उसे बर्तन माँजने का काम मिल गया । उसको महीने के ढाई सौ रूपये मिलते थे । होटल के मालिक ने उसकी पगार पचास रूपये और बढ़ाने की बात की थी । पर एक लफ़ड़ा हो गया । एक रोज सरकारी दफ़्तर से कोई इंस्पेक्टर आया और होटल मालिक को कहने लगा कि इतने छोटे लड़के से वह काम नहीं करवा सकता है । मालिक ने उसे समझाया । सुन्दर ने भी कहा कि उसके लिए यह काम ठीक ठहरता है । उसको कोई परेशानी नहीं है । उस रोज तो वह इंस्पेक्टर चला गया, पर हफ़्ता दस दिन बाद पुलिस का एक आदमी आया और होटल के मालिक को अपने साथ ले गया । लफ़ड़ा बहुत बढ़ गया था। कोर्ट-कचहरी तक का चक्कर हो गया था । फि़र एक रोज मालिक ने सुंदर के पगार का हिसाब किया और उसकी छुटटी कर दी । सुंदर के बाप ने मालिक से खूब मन्नत माँगी । गिड़गिड़ाया भी। पर वह नहीं माना। बोलने लगा-उसको कोई झंझट नहीं चाहिए । इसलिए उसने सुंदर को निकाल दिया है। फिर सुंदर को होटल वाला काम नहीं मिल पाया और वह भी उसके साथ कचरा बीनने आने लगा।

 

आज भी जब वह सुंदर से होटल वाले काम के बारे में पूछती है, तो वह होटल की बातें और किस्से सुनाने लगता है। उसके पास उस होटल के बहुत से किस्से हैं । तरह-तरह के लोग जो उस होटल में आते थे । ज्यादातर दारूबाज लोग रहते थे, पर कुछ लोग बड़े नेक थे । एक आदमी ने तो एक बार सुंदर को पचास रूपये का नोट दे दिया था । उस रोज सुंदर को बहुत अच्छा लगा था । सुंदर के बापू ने उस पैसे से सुंदर को फेरी वाले के पास से एक हाफ़ पेन्ट खरीद दी थी । उस होटल के किस्से सुनाते वह नहीं थकता है । जब भी वह पूछती, वह उसे कोई ना कोई नया किस्सा सुना ही देता है । फिर वह कभी-कभी उदास हो जाता उससे पूछता कि, क्या उसे फि़र से होटल वाला काम मिल पायेगा ? वह उस इंस्पेक्टर को गाली भी देता, जिसके कारण उसकी नौकरी चली गई । वह इंस्पेक्टर सुंदर को चाल्ड लेबुर(चाइल्ड लेबर)कहता था । पता नहीं इसका क्या मतलब है ? बड़ा अजीब सा शब्द है - चाल्ड लेबुर । कभी-कभी वह सुंदर को चिढ़ाती है - चाल्ड लेबुर और वह पटरी के किनारे पड़ी गिट्टी को उठाकर मुठ्ठी में भर लेता है । एक दो बार तो उसने उसे गिट्टी से मार ही दिया था । लेकिन फि़र भी, जब उसका मन करता है वह सुंदर को इसी तरह चिढ़ाती है । उसने कई लोगों से पूछा था, कि चाल्ड लेबुर के क्या मायने हैं ? पर उसे कोई नहीं बता पाया । पर सुंदर को चिढ़ाने के लिए यह शब्द बड़ा अच्छा है- चाल्ड लेबुर ।

 

उसने ओव्हर ब्रिज की ओर देखा । शायद तपती रोड पर से उठती गर्म हवा के लहरदार पर्दे और रोड पर बिखरे पानी की तरह दिखने वाले धोखे में, सुंदर  दिख जाय । आज देर हो गई । वह नहीं आया । वह थोड़ी देर तक देखती रही। शायद ओव्हर ब्रिज से उतरता हुआ, छोटे गुड्डे की तरह सुंदर दीख जाये । पर वह नहीं दिखा ।

 

तभी उसे रेल्वे के स्कूल की एक सी ट्रिन्न......... करती घण्टी सुनाई दी । वह थोड़ा घबरा गई । आज बहुत देर हो गई और उसने अब तक अपना काम शुरू नहीं किया । वह उठ खड़ी हुई। पर दूसरे ही क्षण उसे लगा वह थोड़ी और देर सुंदर का इंतजार कर सकती है । फि़र वह जल्दी-जल्दी काम करेगी । थोड़ी देर और । थोड़ी देर में कुछ नहीं होता । पर दूसरे ही पल उसे लगा कि, जल्दी-जल्दी काम करने से गुलमेंहदी की टहनियों का ध्यान नहीं रहता ।वे पूरी देह को खरोंच डालती हैं। पर इससे कोई खास फ़र्क नहीं पड़ता । देह पर पड़ने वाली खरोंच धीरे-धीरे खुद ही ठीक हो जाती है । बस एक खुरण्ट रह जाता है और खुरण्ट के झड़ने के बाद एक चिकनी चमड़ी वाली लकीर। पता नहीं यहाँ कितनी गुलमेंहदी उगी है और हर साल बढ़ती जा रही है । कहीं-कहीं तो वह रेल की पटरी तक बढ आई है। जब मुनिस्पलिटी की कचरा फ़ेंकने वाली गाड़ी आती है, तब वह बहुत सी गुलमेंहदी की झाडि़यों को कुचल देती है। पर फिर भी वह हर साल उग आती है । वह और सुंदर अक्सर इन झाडि़यों के छोटे-छोटे फ़ल तोडकर इकठ्ठा कर लेते थे। उन्होंने एक दो बार ये फल खाये भी। उन्हें ये फल बड़े अच्छे लगते थे। पर एक दिन फल खाने के बाद सुंदर के पेट में बहुत दर्द हुआ और वह वापस घर चला गया । उसकी तबियत खराब हो गई । उस रोज मॉं ने उसे भी फ़टकार लगाई और गुलमेंहदी के बीज नहीं खाने को कहा । तब से उन्होंने उसे खाना बंद कर दिया है ।

 

वह उठ खड़ी हुई । उसकी छोटी-छोटी हथेलियाँ पसीने से भीग गईं थीं और हथेली की लकीरों में फँसा काला मैल चिपचिपा रहा था । उसने अपना हाथ अपनी फ्रॉक से पोंछा । अपनी हथेली की लकीरें देखकर उसे एक बात याद आई। रोज जब वह आती है, तब ओव्हर ब्रिज से पहले, रोड़ की पटरी पर आम के पेड़ के नीचे एक बाबा बैठता है । वे लोगों का हाथ देखता है। जाने हाथ में क्या देखता है ? एक बार उसकी इच्छा हुई कि बाबा से पूछे कि वह हाथ में क्या देखता है ? क्या वह उसका हाथ देख सकता है? फिर उसने अपना हाथ देखा । पूरे हाथ में पसीना था और लकीरों में फँसा काला मैल चिपचिपा रहा था । उसे अपने पर शर्म आई । ऐसा गंदा हाथ वह बाबा को कैसे दिखा सकती है । किसी दिन हाथ साफ़ कर आयेगी, तब दिखायेगी। पर फिर मौका नहीं बना । आजकल तेज़ गर्मियाँ हैं, सो बाबा नहीं बैठता है ।

 

वह मालगाड़ी के खाली वैगन को पास आकर खड़ी हो गई । वैगन का दरवाजा लटक रहा था । उसने एक हाथ से वैगन के दरवाजे के किनारे की सरियों को पकड़कर वैगन के नीचे लटकते लोहे के क्लैंप में अपना एक पैर फंसाया और दूसरा लटकते दरवाजे की लोहे की पट्टी पर टिकाया और वैगन पर लटक गई । उसने दरवाजे की भीतर झांककर देखा । वैगन खाली थी । जैसे किसी ने पूरी वैगन में झाडू लगा दी हो । कोयले का एक भी टुकड़ा नहीं था । ......स्साले सब ले गये उसने मन ही मन सोचा । उसे उन लोगों पर बहुत गुस्सा आता है । वे रेल्वे लाइन के पार वाली झुग्गियों में रहते हैं । वे बहुत बड़े लड़के हैं । उससे और सुंदर से कहीं ज्यादा बड़े । सुना है जब रेल्वे वाले वैगन का सारा कोयला उतार लेते हैं, तब वे सब शाम को यहाँ आते हैं और वैगनों में पडा़ बाकी कोयला झाड़ पोंछकर पूरी रात इकठ्ठा करते हैं और फिर सुबह-सुबह चंपत हो जाते हैं । एक बार सुंदर ने एक वैगन से कुछ कोयला निकाल लिया था और कचरा भरने के अपने बोरे में छिपा लिया था । सुंदर का बाप बहुत खुश हुआ । सुंदर के बाप ने सुंदर से कहा कि, वह रोज कोयला ले आया करे । पर थोड़ा सावधान रहे, किसी को पता ना चले । सो सुंदर कचरे के बोरे में नीचे कोयला भरता और और ऊपर कचरा। इस तरह वह छिपाकर कोयला ले जाता था । फिर कुछ दिन वह भी ले जाती रही । मॉं ने उससे कुछ नहीं कहा । पता नहीं यह बात उन लडकों को कहाँ  से पता चल गई । सुंदर कहता है, जरूर यार्ड के उस बूढ़े चौकीदार ने बताया होगा जो अक्सर उन दोनों को वहाँ  से भगा देता है। राम जाने सच क्या है ? पर एक दिन वे लडके वहाँ  आ गये और उन्होंने   सुंदर और उसकी पिटाई कर दी । सुंदर को तो उन्होंने रेल्वे की पटरी पर ही पटक दिया था । उस दिन को याद करके वह आज भी बुरी तरह डर जाती है। वह कचरा बटोरते समय सतर्क रहती है कि कहीं वे लडके फिर से ना आ जायें । उसने सोच रखा है कि अगर वे आ गये तो वह गुलमेंहदी की झाडि़यों में छुप जायेगी । उसे गुलमेंहदी के छोटे-छोटे काँटों से डर जो नहीं लगता । तो वह छुप जायेगी । सुंदर भी छुप जायेगा, फिर वे उन्हें ढूंढ नहीं पायेंगे । जिस दिन उन लडकों ने उसे और सुंदर को मारा था, उस दिन वह बहुत रोई थी । वो और सुंदर रोते-रोते अपनी झुग्गी तक गये थे । सुंदर के तो पैर से खून भी निकल आया था । मॉं ने सुंदर की चोट को पानी से साफ़ किया था । उस रोज उसने मॉं से कहा था, कि वह अब कचरा बीनने नहीं जायेगी । वे लडके फिर आ गये तो । पर मॉं ने उसकी एक ना सुनी। उस दिन उसे अपनी माँ  पर बहुत गुस्सा आया था। उस दिन से उसे माँ  किसी राक्षस की तरह लगती है। जो जल्लाद की तरह उससे कचरा बिनवाती है और खुद मस्ती करती रहती है। उस दिन उसने माँ  से कह दिया - वह कचरा बीनने नहीं जायेगी। कहीं लडके फिर आ गये तो.....। पर माँ ने उसे अनसुना कर दिया। जब अपनी बात ना सुनी जाना देखकर वह जिद करने लगी। पर माँ  के कान पर जूं तक ना रेंगी।फिर वह माँ को गाली देने लगी। माँ किसी पागल कुत्ते की तरह उस पर लपकी और उसकी जमकर सुताई कर दी। वह बहुत रोई और फिर उसे यहाँ रोज की तरह आना पडा। सुंदर को भी आना पड़ा ।

 

 उसने सुंदर को समझाया- कुछ नहीं होता, वे लडके भला अब क्यों आयेंगे? वे उनके हिस्से का कोयला जो नहीं लेते । उसने उस बूढ़े चौकीदार को भी बता दिया है, कि वे कोयला नहीं लेते हैं, वे अब कोयला नहीं लेंगे । तो फिर वे क्यों आयेंगे? उसने सुंदर को समझाया और सुंदर समझ गया था । उसे अच्छा लगा कि सुंदर समझ गया । वह बड़ी जो है । उसकी बात तो समझेगा ही । समझना ही चाहिए । वह सुंदर से बड़ी है। वह सुंदर को समझा सकी है, ऐसा सोचकर उसे अच्छा लगा । उसे अच्छा लगा कि वह बड़ी है । पर सुंदर को समझाने के बाद, वह खुद डरती रही थी । वह आज तक डरती है । सुंदर नहीं डरता है । क्योंकि सुंदर को वह समझा चुकी है । सुंदर को विश्वास हो गया है, कि वे लड़के अब नहीं आयेंगे । पर वह डरती है । सो उसने सोचा है कि अगर वे आ गये तो वह गुलमेंहदी की झाड़ी में सुंदर के साथ छुप जायेगी।

 

वह वैगन से नीचे उतर आई । उसके मन में अब भी गालियां थीं स्साले, भोसड़ी के, हरामी.... सारा बचा हुआ कोयला ले गये । वैगन में झाड़ू लगाकर ले गये । इनकी तो...।

 

उसने गिट्टी के ढेर पर रखा अपना बोरा उठाया और कचरा बीनने लगी । टूटे काँच के टुकड़े, प्लास्टिक की टूटी फूटी चीज़ें, कागज़ और गत्ते की चीज़ें वह बड़ी तेज़ी से बटोर रही थी । उसे मालूम है, उसे क्या बटोरना है और क्या नहीं ? मॉं कह रही थी, पंचू (कबाड़ी वाला) आजकल हर चीज़ देखकर लेता है । तोल भाव भी ज्यादा करने लगा है । कचरे की कोई भी अच्छी चीज़ उसकी निगाह से नहीं बच सकती । पहले वह काँच और प्लास्टिक के टुकड़े बटोर लेती है और फिर कपड़ों की चिंदिया, रद्दी और गत्ते के टुकडे बटोरती है। वह धूल भरे कचरे के ढेर को अपने हाथों से उलट पलट देती है। वह कचरे को भीतर तक खखोलती है। ढेर को उखाड़ती है। कांच के कुछ और टुकड़ों और प्लास्टिक के नये टुकड़ों के लिए, वह कचरे से लगभग लड़ती है ।

 

वह पूरी तन्मयता से अपने काम में लगी रहती है। उसके सामने सब हार जाते हैं, तपती, झुलसा देने वाली लू, आग उगलता सूरज, सब उसके सामने हार जाते हैं । वह तपते सूरज और झुलसाने वाली लू को ठेंगा दिखा देती है। बीच-बीच में थककर वह थोड़ा रूक लेती है । उसका तांबई चेहरा, सूरज की रौशनी में दमकता है । कचरे से बटोरी हर चीज़ वह अपने बोरे मे बेतरतीब ढंग से भरती जाती है । एक ढेर से कचरा बटोर लेने के बाद वह बोरा अपनी पीठ पर लटकाये, दूसरे ढेर की ओर बढ़ जाती है। यदा-कदा वह रेल्वे स्टेशन की ओर देखती है। खासकर तब जब कोई ट्रेन वहाँ आकर रूकती है। कभी-कभी वह पलटकर ओव्हर ब्रिज की ओर देख लेती है । क्या पता सुंदर आता हुआ दीख जाय ? पता नहीं आज क्यों नहीं आया ?

 

पहले-पहल जब उसने कचरा बीनना चालू किया था, उसे यह काम अच्छा नहीं लगा था । वह बहुत जल्दी थक जाती थी । पर अब वह इस काम की अभ्यस्त हो गई है। कभी-कभी कचरे में उसे कोई अच्छी अनमोल सी चीज़ मिल जाती है। अभी कुछ दिनों पहले उसे कचरे में शाहरूख खान की पूरी साबुत फोटो मिली थी । वह फोटो बिल्कुल ठीक थी । बस उसका कांच एक तरफ से चटक गया था । शाहरूख खान उसे अच्छा लगता है। उस फोटो को पाकर वह बहुत खुश हुई । फिर उसने उस फोटो को झाड़-पोंछकर अपनी झुग्गी में लगा लिया । कभी-कभी कचरे से कुछ अद्भुत चीज़े मिल जाती हैं । उसे अब कचरा बुरा नहीं लगता है। उसे लगता है, पता नहीं उसमें से क्या ना निकल आये ? कांच और प्लास्टिक के टुकड़े बटोरते बटोरते कभी कभी कुछ अनमोल निकल ही आयेगा । इतना अनमोल कि उसकी खुशियों का ठिकाना ना हो । पता नहीं क्या है ? पर इतना तय है कि कचरा अब उसे बुरा नहीं लगता । उसे उसमें कुछ उम्मीद सी लगती है।

 

उस दिन भी उसे कचरे से एक अद्भुत चीज़ मिली । एक पेंसिल । एक पूरी साबुत पेंसिल । बस वह एक तरफ से थोड़ा टूटी थी, बाकी वह पूरी ठीक थी । उस पेंसिल को पाकर उसे खुशी हुई। वह अपना बोरा लेकर वापस गिट्टी के ढेर पर आकर बैठ गई । उसने पेंसिल को अपने दाँतो से छीला । एक अजीब सा कसैला स्वाद उसके मुँह में भर गया। और फिर गत्ते के एक टुकड़े को वह पेंसिल से गोदने लगी ।

 

गिट्टी के ढेर पर बैठे-बैठे उसने अपनी फ्राक ठीक की। घुटने मोड़े और ठीक उसी स्टाइल में बैठ गई, जैसा कि रेल्वे स्कूल के बच्चे अपनी बैंचों पर बैठते हैं । पेंसिल से कागज़ को गोदते-गोदते वह सोचने लगी, कि अगर वह स्कूल जाती तो क्या क्या होता ? कैसा लगता ? वह कई बार तरह-तरह की बातें सोचती रहती है। खासकर कचरा बीनते समय जब वह बिल्कुल अकेली होती है, तब तो वह जाने कहाँ-कहाँ की बातें सोचती है । पर स्कूल की बातें सोचना उसे सबसे अच्छा लगता है।

 

कचरा बीनते समय स्कूल की घण्टी थोड़े-थोड़े समय बाद सुनाई देती है। आजकल बच्चों की परीक्षा चल रही हैं । सो स्कूल नहीं लगता है । हर गर्मी ऐसा ही होता है। पिछले साल भी ऐसा ही हुआ था और उसके पिछले साल भी । कुछ दिनों में स्कूल की छुट्टी हो जायेगी । स्कूल बंद हो जायेगा । स्कूल की घण्टी की आवाज़ भी आना बंद हो जायेगी । सुंदर बता रहा था कि सब स्कूल गर्मियों में बंद हो जाते हैं । फिर कोई भी स्कूल नहीं जाता है। जोर की गर्मियाँ जो पड़ती हैं । ऐसी तेज गर्मी में सब लड़के लड़कियाँ अपने घ&#