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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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  कहानी

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 स्मृति-दंश


स्वर्ण-ज्योति

 

     ट्रिन.... ट्रिन... घंटी की आवाज़ लगातार सुनाई दे रही थी। अचान से वे चौंक उठे और टेलीफोन की तरफ़ देखते रहे शायद उन्हें अभी भी यहि महसूस हो रहा था कि वे सपना देख रहे हैं। ट्रिन.. ट्रिन.. ट्रिन.. घंटी बजती रही और सुब्रह्यमण्यं जी ने मानो नींद से जाग कर उठाया और हलो कहा...... ५०वीं सालगिरह की बहुत बहुत शुभकामनायें ...... उधर से यह आवाज़ आई सुब्रह्यमण्यं जी को लगा कि हजारों घंटियाँ बजने लगी है और चारों तरफ़ अनोखी सी खुशबू बिखरने लगी है। उस आवाज़ ने उन्हें बरसों पहले की उन गलियों में चंचल नटखट सुब्बू बनाकर भटका दिया।

 

गाँव के प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में बडी ही मन्नतों के बाद शिशु का जन्म हुआ था। लम्बे ऊँचे बडी-बडी मूँछों वाले रोबदार पंडित रामनाथ शर्मा जी का गाँव में दबदबा था। उनकी एकमात्र संतान हरिहर शर्मा की पत्नी को अल्पायु में आठ महीने पहले से वैधव्य का दुःख झेलना पड रहा था परन्तु उन पर उनके श्वसुर जी का अत्यधिक स्नेह था और आज उनकी गोद में पुत्र रत्न खेल रहा था । उन्हें इस बात की बडी ही खुश हो रही थी कि पुत्र की कमी को पौत्र ने पूरी कर दी थी। अपने पौत्र को सुब्रह्य्मण्यं नाम दिया पंडित जी ने और वह नन्हा शिशु सबका प्यारा सुब्बू बन गया ।


      बचपन तो हँसते खेलते गुजर गया। घर में किसी बात की कमी नहीं थी। सुब्बो अत्यंत ही होशियार और तेज बालक था। अपने दादाजी के साथ सुबह-सबेरे सूर्य देव को नमन करते हुए उन्हीं देखा-देखी होंठ ही होंठ में कुछ बुदबुदाता था। वास्तव में दादाजी के कहे आदित्य-हृदयं के श्लोक उसे समझ में तो नही आते बस उनकी नकल करता और दादाजी कनखियों से उसे देख कर मुस्कुराते खुश होते।समय के साथ-साथ उसकी तोतली ज़बान स्प्ष्ट होती गई तब दादाजी ने उसे भी सारे श्लोक सिखा दिए। माँ गौरी की दुनिया में दूर-दूर तक सिरफ़ सुब्बू ही था। पास-पडोस की महिलाएँ भी सुब्बू की बातों से बहुत खुश होती। न कोई शिकायत न कोई झगडा । सुब्बू तो सबकी आँखों का तारा था।
बचपन के दिन गुजरने में वक्त ही नही लगता । सुब्बू की भी शिक्षा ग्रहण करने का समय आ गया। वैसे तो गाँव में मातृभाषा का भी स्कूल था, परन्तु दादाजी का मानना था कि सुब्बू उर्दू स्कूल में पढेगा क्योंकि उर्दू देश की भाषा है यदि बाहर जाना पडे तो केवल मातृभाषा की पढाई और शिक्षा बहुत उपयोगी सिद्ध नहीं होगी। अतः सुब्बू को उर्दू मदरसे में दाखिल किया गया।

 

      कैसा आश्चर्यजनक विरोधाभास है कि गाँव के प्रतिष्ठित कट्टर ब्राह्मण परिवार का इकलौता पुत्र उर्दू मदरसे में पढेगा। सच ही है कि शिक्षा की कोई जाँत-पाँत नहीं होती तालीम देना खुदा के इबादत के बराबर है।

 

     पहली बार सुब्बू तैयार होकर घर से निकला। सफ़ेद कुरता पैजामा उस पर टोपी और माथे पर तिलक वैसे इस पहनावे का कोई ठीक तालमेल नहीं बैठ रहा था, परन्तु दादाजी के आगे किसी की क्या चलती । अब सुब्बू को छोडकर जरा गाँव और मदरसे की बात की जाए। छोटा सा रमणीय गाँव, दस-बारह पक्के मकानों वाला। अधिकतर लोग खेती-बाडी किसान थे। स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र हवा फैली तो थी परन्तु फिर भी लोग स्वतंत्रता और आजादी जैसे विषयों पर बात करना पसंद नहीं करते थे। उनकी अपनी ही रजनीति थी, साहूकार, बनिया या पंडित। कोई झगडा-फ़साद या फिर मज़हबी तकरार के लिए कोई स्थान नहीं था।


     इसी गाँव में वह उर्दू मदरसा था । इस मदरसे को एक मियाँ-बीवी मिलकर चलाते थे। वहीं गाँव के लडके तालीम के लिए आते । इसी मदरसे में सुब्बू को दाखिला गया । यह मदरसा क्या मियाँ-बीवी क घर ही  था। उनके चार-छह बच्चे ही दो वर्गों के बीच दीवार होते। इस तरफ़ मियाँ तो दूसरी तरफ़ बीबी पढाती। इस बीच उनके बच्चों की फ़रमाईश मदरसे में पढने वाले बच्चे पूरा करते याने बाच-बाच में उन बच्चों को बाहर ले जाना, पानी पिलाना या फिर खाना खिलाना आदि आदि।

 

    गुरुकुल की परंपरा तो कभी की खत्म हो गई थी परन्तु गाँव का यह मदरसा कुछ-कुछ गुरु कुल परंपरा से मिलता-जुलता था। बच्चे उन मियाँ-बीवी के घर का काम भी कर दिया करते थे, चारवाह भी चरा लाते और भी अनेक छोटे-बडे काम कर दिया करते थे।

 

    सुब्बू के इस मदरसे में दाखिल होने के बाद बच्चों का आना निश्चित हो गया । सबसे पहले सुब्बू आ जाता फिर ज़नाब की इज़ाज़त से घर-घर जा कर बच्चों को ले आता । यह धारणा बन गई य्ही कि जब सुब्बू ही इस स्कूल में पढ सकता है तो तो फिर उसके साथ हमारे बच्चें भी पढे तो कुछ बन जाएँगें कुछ सीख जाएँगें। सुब्बू के दादाजी का दबदबा था या सुब्बू का प्रभाव कह नहीं सकते। जो भी हो उस मदरसे में विद्यार्थियों का आना निश्चित हो गया । वहाँ की तालीम में क्या सीखा क्या नहीं यह चर्चा का विषय नहीं है परन्तु आरंभिक तालीम ने सुब्बू को प्रसिद्धि जरूर दिलवा दी। एक  बार सुब्बू मास्टर जी के भैंसों को चराने का काम कर रहा था ( यह काम बारी-बारी से सभी बच्चों को करना पडता था) कि दादाजी ने देख लिया । फिर तो मास्टरजी की वह शामत आई कि पूछो नहीं । बस साल के आखिर में दादाजी के किराने की दुकान से किराना मास्टरजी के घर पहुँच जाता और सुब्बू अगली क्लास में । दादाजी भी खुश मास्टर भी खुश और सुब्बू भी खुश। यदि एक ही तीर चलाने से इतने लोग खुश हो जाए तो तीर चलाने में हर्ज़ ही क्या----

 

     समय का पहिया हमारी आँखों की दृष्टि से भी तेज घूमता है । बस हमें ही कभी महसूस होता है कि समय धीरे चल रहा है तो कभी लगता है कि समय दौड रहा है परन्तु समय तो केवल अपनी ही गति से चलता है और आगे बढता जाता है। सुब्बू की प्रारंभिक शिक्षा समाप्त हो गई । आगे की पढाई के लिए शहर जाना था, वैसे एक और चुनाव भी था कि गाँव में ही रह कर खेती-बाडी दुकान की देखभाल करें और फिर शादी-ब्याह घर गृहस्थी बनायें और संभालें । पर सुब्बू की तो कुछ और ही चाह थी | आगे बढने की बहुत आगे जाने की कुछ नाम कमाने की और इसी धुन ने शहर का रास्ता पकडा दिया चलने के लिए और कदम खुद-ब-खुद चल पडे।

 

गाँव के वातावरण से बिल्कुल भिन्न शहरी वातावरण था।  परन्तु सुब्बू को इससे कोई फ़र्क नहीं पडने वाला था क्योंकि स्वभाव से गंभीर, बुद्धि से तेज सुब्बू को सिर्फ़ अपने आप से और अपनी पढाई से ही मतलब था । बस एक ही समस्या थी या कहें उलझन थी कि इस बार लडकियाँ भी साथ में पढती थी और यहीं से एक अए अध्याय की शुरुआत भी थी सुब्बू की ज़िंदगी की ।

 

मेरे( सुब्बू ) साथ ही एक लडकी पढती  थी नाम था शुभा। शुभा भी मेरे ही समान विषय में बहुत तेज थी। वैसे देखा जाए तो बहुत असमानतायें थी, शुभा बातूनी हँसमुख चंचल बच्ची सी पर विषय में जानकारी रखने वाली थी, हाँ कुछ पसंद-नापसंद भी मिलती-जुलती थी। नहीं मिलता था तो वह था हम दोनों का स्वभाव । शायद प्रतिस्पर्धा की भावना के कारण हम दोणों में मित्रता तो क्या जान-पहचान भी नही थी। दोनों ही अकड कर रहते थे पर शायद कनखियों से देखते भी थे। और एक दिन हमारी यही प्रतिस्पर्धा की भावना ने हमें पास भी ला खडा किया ।फिर तो क्या दोनों में खूब छँटती, हाँ दोनों का स्वभाव अलग होने के कारण दोंनों में दस मिनट की बात एक घंटे की अनबन और दो घंटे की मान-मनौवल की ही स्थिति रहती फिर भी दोंनों साथ ही रहते अनबन की स्थिति में ही या  मान-मनौवल की स्थिति में । इस परिवर्तन का बडा ही रोचक कारण था।

 

वैसे शुभा बहुत ही बोलती थी।शायद उसके घर की स्थिति ने उसको यह इज़ाज़त दे दी थी कि वह खुल कर मिलें। उसकी माँ का बचपन में ही निधन हो गया था और पिता शायद बहुत ही व्यस्त रहते थे।घर में और कोई था नहीं जिससे वह बोलें बात करें अतः उसका स्वभाव बाहर आते ही स्वतः ही खुल जाता और वह संगी-साथियों के बीच मुखर हो उठती।

 

एक दिन वह जरूरत से ज्यादा गंभीर थी। वैसे तो उसकी हालत देख कर मुझे खुशी हो रही थी मजा आ रहा था परन्तु शायद मेरी छटी ग्रंथी ने मुझे परेशान कर रखा था ।इसी परेशानी में मैंनॆं शाम को भावुक होकर उससे पूछ ही लिया  -

" क्यों शुभा क्या बात है इतनी सफ़ेद क्यों हुई जा रही हो"?

 

एक बारगी तो शुभा को आश्चर्य हुआ पर अगले ही क्षण उसने हँसते हुए कहा " नहीं ऐसी कोई बात नहीं है मै ठीक हूँ"

 

बस इस छोटी सी बात ने शुभा को मेरे करीब ला दिया क्योंकि दिल की बात कहने सुनने के लिए शुभा के पास कोई साथी नहीं  था। धीरे-धीरे शुभा मेरे आगे खुलने लगी। बातें तो अक्सर पढाई के संदर्भ में ही होती हाँ कभी-कभार फ़िल्म, राजनीति और साहित्य की भी हो जाती।धीरे-धीरे पढाई की बातों का सिलसिला बंद होने लगा और साहित्यिक गोष्ठियाँ होने लगी । पर सब कुछ बस दिन के कुछ घंटों में जब कॉलेज में कुछ फुरसत के क्षण मिल जाते ।

 

हमारे समाज का कुछ ऐसा चलन है कि जहाँ दो लडका-लडकी मिल बैठे बातें की वही एक कहानी बन जाती है। परन्तु मेरे और शुभा के मामले में एक आश्चर्यजनक तथ्य यह था कि हमारी प्रगाढ मित्रता और हमारा साथ किसी भी अफ़वाह को जन्म नहीं दे सका। सभी हमारी दोस्ती को सहज ढंग से लेते कि मानो यह कोई नई बात नहीं है हमारे बेच प्यार नाम का शब्द जुड नहीं पाया था तो फिर हमारे बीच में प्रेम् जैसी कोई भावना नहीं थी, ऐसा नही था  हमारे संबंधों में वो अनजाना