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अहसास सुरेंद्र तिवारी
सुबह पापा ने मुझे नहीं जगाया । बहुत देर तक में सोता रहा । आँखें खुलीं तो देखा, खिड़की से धूप छन-छनकर मेरे चेहरे पर गिर रही थी।
रात पापा के साथ बहुत देर तक माँ को लेकर चर्चा करता रहा था। माँ को लेकर पापा कुछ ज्यादा ही व्याकुल नज़र आ रहे थे। पापा किसी के लिए इस तरह व्याकुल हों, यह मेरे लिए कुछ चौकाने वाली बात थी। शायद इसी कारण में उनके पास इतनी देर तक बैठ भी पाया था। माँ की चिंता-चर्चा को बीच में छोड़कर शायद मैं भी उठना नहीं चाहता था। अंत में पापा ने ही कहा था, ‘बहुत देर हो गई, अब जाओ, सो जाओ।’
देर से सोया था शायद यही सोचकर पापा ने मुझे जल्दी नहीं जगाया था। एक अँगड़ाई लेकर मैं उठ बैठा । घर में चारों तरफ शांति थी। कहीं कोई हलचल नहीं । मुझ आश्चर्य हुआ । इस घर में इतनी शांति तो कभी नहीं दिखी।
अपने कमरे से बाहर आकर रघु को पुकारा मैंने । वह शायद कहीं दूर था। कुछ देर बाद आया । बड़ा निरीह-सा चेहरा । एकदम उदास । आँखे भारी-भारी, जैसे बहुत देर तक रोता रहा हो। हर रोज जब मैं जगता था, अगल-बगल के कमरों में नौकरों के काम करने की आहट आती रहती थी । बीच-बीच में पिता की आवाज़ भी गूँजती रहती ।
आज चारों तरफ अजीब किस्म का सन्नाटा फैला हुआ है ! और फिर रघु का यह रोता हुआ चेहरा !
पापा की आदत है, वे मुझे सुबह छह बजे उठाए बिना नहीं मानते । अचानक मेरी नज़र अपनी कलाई घड़ी पर चली गई, सात बजने वाले हैं। ओफ ! और आज पापा ने उठाया नहीं ! मुझे आश्चर्य हुआ। इससे ज्यादा आश्चर्य हुआ घर की इस हलचलविहीन शांति से । ऐसा क्यों है ?
मन में शंका घिर आई। रघु सिर झुकाए खड़ा था। घर में इतने नौकर-चाकर पर कहीं किसी का पता नहीं। पापा के कमरे में भी चुप्पी थी। रघु की चुप्पी मुझे खल रही थी। मैंने पूछा, क्या बात है रघु, तुम इतने उदास क्यों हो ? घर के सब लोग कहाँ चले गए ?
रघु ने कुछ बोलने के लिए मुख खोला पर बिना बोले ही सुबक पड़ा ! समझने के लिए अब कुछ बचा न था। मैं दौड़ा-दौड़ा पापा के कमरे में गया, “पापा आपन मुझे जगाया क्यों नहीं? आप मुझे लेकर अस्पताल क्यों नहीं गए ? मैं आखिरी बार माँ को देख नहीं पाया।”
मैं फूट-फूट कर रो देता, अगर पापा की आँखों में आँसू न देख लेता । मैंने अपने आपको रोका। पापा सुबक रहे थे। मैंने उन्हें ज़िंदगी में कभी उदास नहीं देखा था, आज वही पापा रो रहे थे। मेरा दिल डूबने लगा था। मैंने पापा के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा, शांत हो जाइए पापा, चुप हो जाइए।
पापा ने मेरी ओर गीली आँखों से देखा। चलिए, अस्पताल चलते हैं। वहाँ अब क्या है ? माँ। माँ का क्रिया-कर्म भी तो करना है।
पापा चुपचाप उठ गए । मैं उन्हें छोड़कर फोन की तरफ बढ़ा। मैं अस्पताल से पता करना चाहता था कि क्या सचमुच मेरी माँ यानी मिसेज जोगीन्दर पाल की मृत्यु हो गई है ? मेरे लिए यह पूछना बहुत आवश्यक था क्योंकि मैं अब तक विश्वास नहीं कर पापा था कि मेरी माँ सचमुच मर गई होगी। कल शाम को मैं भली-चंगी देख कर आया था। डॉक्टर भी संतुष्ट थे। उनका विचार था कि अब वह बच जायेगी।
वैसे माँ का चेहरा दो-दिन में एकदम बदल गया था। पहचान में नहीं आती थी। डॉक्टरों को भी पहले विश्वास नहीं था कि वह बचेंगी। ड्राप्सी में मरनेवालों की संख्या रोज बढ़ रही थी। माँ का केस भी काफी खरतनाक था। फिर भी माँ दो दिनों में काफी स्वस्थ नज़र आने लगी थी। अगर अस्पताल में भर्ती होने के एक-दो दिन बाद मर गई होती तो मुझे इतना आश्चर्य न होता, किंतु ठीक होते-होते मर जाना.......कैसे विश्वास करुँ ?
मैंने देखा, रिसीवर यों ही टेबल के नीचे झूल रहा था। शायद पापा को फोन से ही यह ख़बर मिली होगी और वे अपने को संभाल नहीं पाए होंगे। फोन उनके हाथ से छूट गया होगा। रघु इस कमरे में सुबह उन्हें चाय देने आया होगा तो पापा की हालत देख कर ही उसने स्थिति का अंदाजा लगा लिया होगा। पापा के बिना बताए ही नौकरों तक बात पहुँच गई थी । पापा स्थिर अपने कमरे में पड़े थे इसलिए मुझे जगाया नहीं । नौकर तो मुझे कभी जगाते ही नहीं । ओफ ! न जाने कितनी देर हो गई इस बात को ।
मैंने अस्पताल का नम्बर मिलाया। मेरा हाथ काँप रहा था। लगा जैसे मेरे हाथ से भी रिसीवर छूट कर नीचे गिर जायेगा। जैसे पापा के हाथ से गिरा होगा। मैंने जोर से अपनी हथेली के बीच रिसीवर को जकड़ लिया । डॉक्टर वर्मन थे। उनका स्वर कुछ उल्लसित-सा लग रहा था। मेरी बात सुनकर क्षण भर को वे जरूर घबड़ा गए होंगे। क्योंकि फोन पर मैं उनके स्वर में घबड़ाहट की गंध महसूस कर रहा था। वे क्षण भर हिचके, फिर बोले, “आप मिस्टर जोगिन्दर पाल के बेटे ?”
“जी हाँ, मेरी माँ....” “सारी बेटे, आपकी माँ की ख़बर गलत नहीं है....वे आज सुबह ही....आधी रात के बाद उनकी तबियत अचानक ही फिर गड़बड़ा गई और सुबह होते-होते.....”
पापा सूनी-सूनी आँखों से मुझे देख रहे थे। मैंने अपने आप को संयत रखते हुए रिसीवर रख दिया और मंद गति से चलता हुआ पापा के पास आ खड़ा हुआ । फिर उनके हारे थके कदमों को सहारा देता हुआ बाहर आ गया। पीछे-पीछे रघु भी था। मैंने उसे अपने कुछ परिचितों के नाम बताए जिनको यह ख़बर देनी थी।
रास्ते में कुछ जान-पहचान के लोग मिले । पापा का उदास चेहरा उनके लिए उत्सुकता का कारण था। मैं सबको कारण बताता जा रहा था। उन लोगों ने हल्की-सी सहानुभूति जताई और भीड़ में खो गए ।
आसपास के गेट पर लोगों की काफी भीड़ थी। बहुत से लोग स्वागत कक्ष में इधर-उधर चक्कर लगा रहे थे। कुछ बैठे आँसू बहा रहे थे। इस क्षेत्र में ड्राप्सी के शिकार बहुत लोग हुए थे।
पापा काफी लाचार दीख रहे थे। थके-थके खोये-खोये । उन्हें लेकर मैं इंक्वायरी की ओर बढ़ गया । वहाँ पता चला कि कुछ देर बाद माँ की लाश हमें मिल जायेगी।
हम एक जगह बैठकर अब समय का इंतजार करने लगे। एक-एक पल भारी था। कुछ देर बाद दो-चार और जाने-पहचाने नाते-रिश्तेदार आ गए। वे सब हमारी उदासी के साथ उदास बनने की कोशिश कर रहे थे। पापा को दिलासा भी दे रहे थे। बीच-बीच में कोई दार्शनिक उपदेश भी दे देता था।
कुछ देर बाद हमें लाश लेने की सूचना मिली। पापा को लेकर मैं बरफ घर की ओर बढ़ गया। मेरे साथ-साथ और लोग भी उधर ही बढ़े । मेरे हाथ में टिन का एक गोल टुकड़ा था। उस पर क्या लिखा था, मैंने नहीं देखा । अस्पताल के एक चपरासी ने वह मेरे हाथ पर रख दिया था - वहाँ चौकीदार को दे देना साब ! नम्बर मिला कर डेडबाड़ी आपको दे देगा। उसने कहा था और मैंने उसे मुट्ठियों में भींच लिया था।
बरफ घर के सामने भी अच्छी खासी भीड़ थी। हमें यहाँ भी कुछ देर तक इंतजार करना पड़ा। फिर हमें अंदर बुलाया गया । पापा इस बार मेरे पीछे पीछे चुपचाप चल रहे थे। दरवाजे के पास एक आदमी खड़ा था उसने मेरे हाथ को झटका । मेरे हाथ का गोला छिटककर उसके हाथों में चला गया था। उसने उस पर एक नज़र डाली - बहत्तर .....! वह बुदबुदाया और एक कोने की ओर इशारा करते हुए बोला - ‘उस कोने में चौथा।’
उसने जिस कोने की ओर संकेत किया था उस कोने में एक के ऊपर एक कई लाशें रखी थीं। लाशें किसी गोदाम में पड़े बोरों की तरह थीं। माँ की लाश एक तरफ पड़ी थी, और उनके लगे में वैसा ही टिन का दूसरा नम्बर रहा था - बहत्तर। थोड़ी देर के लिए पापा के साथ मैं भी स्तब्ध हो उठा । सभी लाशों की गरदन किसी ऐसे ही नम्बर से फंसी पड़ी थी। कई लाशें नंगी थीं, शायद उनके बदन से भी किसी ने कपड़े उतार लिए थे।
पापा फटी-फटी आँखों से सब कुछ देख रहे थे। यह सब अकल्पित था उनके लिए । मेरे लिए भी। मैंने एक बार और माँ की लाश को देखा और अनजाने ही फूट-फूटकर रोने लगा। मैं नहीं कह सकता कि यह रुलाई किस तरह आई । पर इतना जरूर है कि मुझे माँ को इस तरह पड़े देखकर जो तकलीफ हुई वह पापा के दर्द को महसूस करके भी नहीं। मन में टीस पैदा हो गई थी। मुझे अफ़सोस हो रहा था और अपने अफ़सोस को प्रकट करने का साधन न था मेरे पास, शायद इसलिए आँसू निकल आए थे।
माँ को श्मशान में ले जाकर जला देने के बाद भी मैंने पाया कि किसी एक बात का अफ़सोस मुझे ज्यादा है, और वह बात क्या है, चेष्टा करके भी मैं नहीं समझ पाया। शायद माँ के यों मर जाने का, शायद पापा के एकाकीपन को महसूस कर, या शायद यह सोचकर कि दो महीनों बाद होनेवाली मेरी शादी अब कुछ महीनों के लिए टल जायेगी। और इस बात को सोचते ही एक झुरझुरी मेरे सारे बदन में फैल गई जिसे छिपाने के लिए मैं पापा से थोड़ा हटकर चलने लगा।
भारतीय सूचना सेवा नई दिल्ली
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