|
|
|
||||||||
|
|
|||||||||
|
|
||||||||||
|
कुर्बानी अभिमन्यु अनत
मॉरीशस की स्वतंत्रता के बस चंद सप्ताह बाकी थे। 1968 के प्रथम चरण गर्मी की पराकाष्ठा लिये हुए थे ही, जब द्वीप की राजधानी पोर्टलुई में दो कौमों के बीच हिंसा की वह आग भड़क उठी थी। लोग अभी एक-दूसरे से पूछ ही रहे थे कि यह क्या हो रहा है ? कि शहर के उत्तरी प्रांत की गलियों और घरों में तहलका मच उठा। हमीद की आँखों के सामने कल रात उसके घर के पिछवाड़े वाली गली में एक के बाद एक कई घर धू-धू करके जल उठे। दुकानों पर डाईनामाईट फेंके गये। उसने अपने आपसे पूछा।
“आखिर ये क्रिओल लोग हम मुसलमानों के खून के प्यासे क्यों हो गये ?” उधर मुसलमान इलाके से कुछ ही दूरी पर रोशबुआ की क्रिओल बस्ती की एक झोंपड़ी में सात साल का एक लड़का अपनी माँ से पूछ बैठा, “मुसलमान हमें क्यों मारना चाह रहे हैं ? ” उसकी माँ के पास जवाब नहीं था, आँखों में भय था जबकि रेमों के छोटे बच्चे रोलां की आँखों में अगर कोई भाव था तो बस हैरानी का।
उत्तर प्रांत से शहर पहुँचने वाले रास्ते बन्द थे। शहर में प्रवेश करने वाले चौराहे पर दस से अधिक गाडि़यों को तोड़ा-फोड़ा गया। दो बसें जला दी गयीं। पाँच व्यक्तियों की जानें बेरहमी से ली गयीं। एक आदमी जो बच पाया, उसका पूरा चेहरा तेजाब से झुलसा दिया गया था। एक दूसरा तलवार की धार से बचकर भी अपना एक हाथ गँवाकर पुलिस थाने में पनाह ले पाया। पेट्रोल भरी बोतल के विस्फोट से एक बच्चे की आँखें जाती रहीं।
परसों हमीद ने ये खबरें अपने पड़ोस के लोगों से सुनी थीं। वह इनायत और प्रमोद को देखता रहा था और जब इतने पर भी उसकी समझ में कुछ नहीं आया था तो वह अपने दोनों मित्रों से पूछ बैठा था, “यह किसकी लड़ाई है जो हर गली-कूँचे में लड़ी जा रही है। क्यों बेगुनाह मारे जा रहे हैं ? किसके गुनाहों की सजा बच्चों और औरतों को दी जा रही है ?”
कल जब फिर से वह अपने दोस्तों के सामने था तो उसके चेहरे का भाव बदल चुका था। उसके प्रश्न के तेवर और लहजे बदले हुए थे। “हम अपने लोगों के घर क्यों जलने दे रहे हैं ? क्यों अपने लोगों को मरने दे रहे हैं ? मैं भी औरों की तरह क्यों नहीं बढ़ रहा ! क्या सचमुच मैं डरपोक हूँ ? इन सवालों के साथ हमीद के जेहन में तीन साल पहले की वह बात याद आ गई जब आंत्वानेत के सामने उसने अपने को इसी तरह के उधेड़बुन में पाया था। तब भी उसने यही कहा था। “मैं कायर हूँ आंत्वानेत। डरपोक हूँ। मज़हबी ताकत से लड़ नहीं सकता।” तब वह दूसरी तरह की बेबसी थी। उसके हौंसले को बनाये रखने के लिए आंत्वानेत ने उससे कहा था।
“मैं जानती हूँ हमीद कि तुम मज़हबी भेद-भावों से अपने को अलग रखने वालों में हो। तुम अपने को उस जकड़बंदी में नहीं रख सकते। हम दोनों मुसलमान और क्रिओल से कहीं अधिक दो प्रेमी हैं। बस प्रेमी बने रहें।
“राह पायेंगे क्या ? इस डर और झिझक के बीच लगता है हम एक-दूसरे के नहीं बन पायेंगे। मैं अपने लोगों से बहुत डरने लगा हूँ ।” तीन वर्ष बाद वही हमीद आज अपने आपसे पूछ बैठा। -आज एकाएक मैं अपने को इतना दिलेर कैसे पाने लगा ? हाथों में तलवार और पेट्रोल के गेलन लिये गलियों में क्यों दौड़ रहा हूँ ? क्यों ? यही सवाल इस दंगे-फंसाद के शुरू होने के दूसरे दिन बाद जब प्रमोद के घर पर था तो इनायत ने उससे पूछा था। -क्रिओल मुसलमानों को खत्म करना चाह रहा है और मुसलमान क्रिओलों को। हमने उनका क्या बिगाड़ा है, उन्होंने हमारा क्या बिगाड़ा है ? आज प्रमोद ने हमीद से सवाल किया। -क्यों अपने को इन पागलों के खेमे में डाल रहे हो ? अभी कल तक तो तुम रेमों और गायतां के साथ अरब गली के रेस्तरां में बीयर पीते थे। तुम तीनों एक ही फुटबाल टीम में साथ-साथ खेलते रहे और कई कप जीतने की खुशियाँ साथ-साथ मनायीं। प्रमोद के चुप होते ही ईनायत ने बात आगे बढ़ायी। -एक बार जब मुस्लिम स्काऊट टीम के मैनेजर ने तुम्हारे घर पहुँच कर तुमसे उसकी टीम में खेलने की माँग की थी तो तुमने कहा था कि तुम स्पोर्ट को मज़हबी रंग नहीं दे सकते। आज जब तुम जैसे व्यक्ति को इन दोनों खूँखार पागलों के बीच खड़े होकर इस कत्लेआम को रोकना चाहिये था तो तुम खुद मारने-मरने के लिए निकल पड़े ? तीनों मित्र शहर की बनारस गली के उस ठौर पर खड़े थे जहाँ रात के हमले के बाद पूरी गली जली-अधजली लकड़यों, टीनों, लोहे के टुकड़ों के मलबे से भरी हुई थी। अपने परिवार के साथ हमीद जब अपने गाँव लालमाटी छोड़कर शहर में बसने आया था, उस समय बनारस गली उसे अपने गाँव-सा सुन्दर नहीं लग पाया था। पर वक्त के साथ पड़ोसी के रूप में एक तरफ प्रमोद के परिवार और दूसरी तरफ इनायत के परिवार की आत्मीयता पाकर वह अपने गाँव की याद के उस दर्द को भूल सका था। गली के सभी युवकों के बीच हमीद अगर अपनी घनिष्टता केवल इनायत और प्रमोद से ही बढ़ा पाया था तो इसके कुछ कारणों में एक सबसे बड़ा कारण यह था कि तीनों साम्यवाद पर लम्बी बहस कर लेते थे। पहली बार प्रमोद के घर जाने पर जब उसने उसके आँगन में हनुमान जी का चौंतरा और लाल झंडियाँ देखी थीं तो प्रमोद से पूछे बिना नहीं रहा था। - यार लेफ्टिस्ट होते हुए भी। प्रमोद ने उसके वाक्य के पूरे होने से पहले कह दिया था। - लाल झंडे पर हँसिया और हथौड़ा न पाकर निराश हो गये। इस पर तीनों मित्र हँस पड़े थे। आज प्रमोद के मन में आया कि वह हमीद से पूछे - क्यों यार, वामंपथी होकर हँसवे और हथौड़े की जगह तलवार क्यों लिये फिर रहे हो ? चाहकर भी नहीं पूछ पाया( क्योंकि दूसरी गली से कोई पचासों नवयुवक हाथों में लाठियाँ, तलवार और बन्दूकें लिये सामने आ गये। इनायत के झपट कर रोकने पर भी हमीद उस हुजूम के साथ जा मिला। वे नारे लगाते हुए रोशबुआ की ओर बढ़ गये। अपने नारों के शोर में हमीद इनायत का यह प्रश्न नहीं सुन पाया। - क्या अपने इलाके की रखवाली से यह हमला अधिक मायने रखता है जो तुम करने जा रहे हो ?
अगले चौबीस घंटों में दोनों पक्षों के बीच के खून-खराबे इतने बढ़ गये कि कुछ इलाकों में पुलिस अपनी पूरी ताकत के बावजूद असमर्थ थी। लोगों पर भूत सवार था। आवेश में आये बदले की भावनाओं और हिंसा को लोगों के भीतर से निकाल बाहर करने की कोशिशें दोनों तरफ से होती रहीं। कुछ भले क्रिओलों ने दौड़-दौड़कर क्रिओलों के क्रोध को शान्त करना चाहा तो कुछ भले मुसलमानों ने मुसलमानों की बढ़ आई नाराज़गी को कम करना चाहा। कुछ धार्मिक नेताओं ने भी बहुत कोशिश की उस उफन रही हिंसा को रोक लेने की, पर उस उफन चुकी बाढ़ को थाम पाना आसान नहीं था। पुलिस के द्वारा सख्त कदम उठाये गये। पर न तो पुलिस की गोलियों की परवाह की गयी और न ही अश्रुगैस किसी को पीछे कर पाया। इमरजेंसी और कर्फ्यू लग जाने पर भी एक की जगह दो घर जलते रहे, जानें जाती रहीं, दुकानें लूटी जाती रहीं और जब इनायत ने हमीद की आँखों में हमले के बाद लौटने पर फर्क झलकते पाया तो वह चिल्ला उठा। - तुम सरकार में उच्च ओहदे पर हो। गुंडों के साथ गुंडा बन गये ? हमीद भी उसी बुलंदी के साथ चिल्लाया। - तुम कह रहे हो ये सारी बातें ? तुम जो मुझे इस बात के लिये कोसते रहे हो कि मैं तुम्हारी तरह सिर से पाँव तक मुसलमान क्यों नहीं। तुम उन सालों की पैरवी करने लगे जो हमारी माँ-बेटियों तक को नहीं बख्श रहे ? वे मेरे बाप को अस्पताल भेज सकते हैं तो मैं उन्हें श्मशान भेज सकता हूँ। - तुम लोग बख्श रहे हो क्या ? - तुम ऐसा कह रहे हो ? क्यों ? - क्योंकि मैं अपने को एक अच्छा मुसलमान मानता हूँ। तुम्हें खुदा की मर्ज़ी के खिलाफ़ जाने को नहीं छोड़ सकता। मुसलमान हो, मुसलमान बने रहो। - कमाल है। तीन साल पहले जब क्रिओल लड़की से प्यार किया था, जब उससे शादी करनी चाही थी, तब मेरे बाप ने यही स्टीरीमोटाईप डॉयलाग कहा था। उस समय क्रिओल को गले लगा कर मैं खुदा की मर्ज़ी के खिलाफ़ था और आज इन क्रिओलो के नापाक इरादे को रोकने में लगा हूँ तो भी खुदा की मर्ज़ी के खिलाफ़ जा रहा हू। कोई तो समझाये कि इन नसीहतों का क्या मतलब होता है ?
रात को मुसलमान इलाकों में कुछ लोगों ने सभी घरों में लोगों को सावधान और तैयार रहने की हियादतें दीं। वे सभी घरों में बोलते फिर रहे थे कि वे काफ़िर हमें ईंट का जवाब पत्थर से देने की सोच रहे हैं। हम सभी को उन्हें पत्थर का जवाब लोहे से देना है।
प्रमोद ने पहली बार हमीद की आँखों में भय देखा। वह डर उसकी आवाज़ में भी था, जब उसने प्रमोद के कंधों को थाम कर कहा। - मुझे अपनी माँ और दोनों बहनों की चिन्ता है। - वे लोग मेरे घर मेरी माँ और मेरी पत्नी के साथ हैं, क्यों चिन्ता कर रहे हो ? - वे लोग मेरे घर तक आ गये तो तुम्हारे घर को भी नहीं छोड़ेंगे। - उन लोगों ने अब तक किसी भी हिन्दू के घर में दाखिल होने की भूल नहीं की है। - पर उन्हें क्या मालूम होगा कि तुम्हारा घर एक मुसलमान घर नहीं ? - हनुमान जी के चौंतरे की लाल झंडियाँ। - मैं उन लोगों की हिट-लिस्ट में हूँ। अगर उन्हें पता चल गया कि मेरी माँ और बहनें तुम्हारे घर में हैं तो वे तुम्हारे घर के भीतर पहुँच कर रहेंगे। - फिर भी चाची, सलमा और शहनाज को कुछ नहीं होगा। - इतने यकीन के साथ कैसे बोल सकते हो ? - आओ चलकर देखो, मेरी माँ ने उन्हें कितनी बड़ी सुरक्षा दी है।
दूसरे मिनट बाद हमीद प्रमोद के घर अपनी माँ और बहनों के सामने था। अवाक्, और फिर उसने एक राहत की साँस ली। उसकी माँ और दोनों बहनों के माथे पर लाल टीके थे। प्रमोद ने धीरे से कहा। - अभी तक माथे पर टीका लिये किसी औरत पर इस दंगे-फंसाद में हाथ उठाने की चेष्टा नहीं हुई है। बनारस गली पूरी की पूरी रात भर आतंकित रही। गली को दोनों तरफ से और उससे मिलने वाली सभी छोटी-मोटी गलियों को भी पत्थरों, लकडि़यों, लोहों से घेर कर दाखिल होने के सारे रास्ते रोक लिये गये थे। जहाँ-तहाँ युवकों की टोलियाँ गाडि़यों के पुराने पहियों को जलाये हथियारों से लैस हमला बोलने वालों की ताक में थे। कुछ क्षण के लिए अपने घर के भीतर अकेले बैठे हमीद ने अनचाहे पुरानी बातों को अपने ज़ेहन में कौंधते हुए पाया।
आंत्वानेत को लेकर बात चल रही थी। वह अपनी माँ को एक आखिरी बार मनाने में लगा हुआ था। उसकी माँ उसे जिसे क्रिओली बहुत कम आती थी, भोजपुरी में बोलती गयी थी। - हमीद ज़िद छोड़ो। तुम अपने मज़हब से बाहर जाकर शादी की बात भूल जाओ। - अगर खुदा एक है और हम मुसलमान उसी के बन्दे हैं तो फिर ये जो मुसलमान नहीं हैं, वे आखिर किसके पैदा किये हुए हैं ? और जैसा कि तुम लोग बार-बार कहते हो कि मालिक एक है तो एक ही मालिक के दो बन्दों में फ़र्क करके हम मालिक का अपमान नहीं कर रहे ? उसकी माँ ने पहले ही से तैयार जवाब उसके सामने रख दिया था। - रहन-सहन, खान-पान, रंग-रूप, रीति-रिवाज़ आदमी के बीच में बातें अलग-अलग होती हैं। - रहा करें, इससे क्या होता है। मैं दुनिया का पहला मुसलमान थोड़े होऊँगा जो किसी दूसरी जाति में शादी की हो। यहाँ के डॉक्टर, वकील फ्रांस और इग्लैण्ड से लड़कियाँ उठा लाते हैं और यहाँ पचा ली जाती है। मैं तो अपने ही देश की लड़की को ब्याहना चाहता हूँ। - देखो हमीद ! यह लड़की सिर्फ एक गैर जाति की ही नहीं है बल्कि एक मछुवे की बेटी है, लोग क्या कहेंगे। - लोग जो चाहें कह लें, इससे क्या ? - और जब लोग तुम्हारी बहनों को यह कहकर ठुकराते रहें कि वे उस घर से नाता नहीं जोड़ सकते । हमीद ने चिल्लाकर अपनी माँ को चुप रह जाने को कहा था। अपनी माँ से अपने ख्याल को हटाकर उसने उसे आंत्वानेत पर जा टिकने दिया। उस शाम आंत्वानेत उसे हमेशा से अधिक सुन्दर प्रतीत हुई थी। उसके सांवले रंग पर गुलाबी फ्रॉक और ब्लाऊज इतने फब रहे थे कि हमीद उस दिन उससे बात न करके केवल उसे निहारते रह जाना चाहता था और शायद ऐसा ही होता, अगर आंत्वानेत पूछ न बैठती तो। - अपनी माँ से बात कर पाये ? - मेरी माँ भी तुम्हारी माँ की तरह यह मानने को तैयार नहीं कि दो गैर मज़हबी एक सूत्रा में बंध सकें। वह तो यह मानकर चल रही है कि ऊपर वाला ऐसे ब्याह के लिये कभी भी राजी नहीं होगा।
वे दोनों मारी-रेन-दे-लापे की मूर्ति के सामने खड़े नीचे पूरे पोर्टलुई शहर को देख रहे थे, जब हमीद ने आगे कहा था। - हमारे प्यार को एक साल होने को है। साल भर मैं न तुम अपने माँ-बाप को मना पायीं और ना ही मैं। - तुम्हारा परिवार अगर इस बात पर अड़ा हुआ है कि मैं तुम्हारा मज़हब कबूल करके ही तुम्हारी बीवी बन सकती हूँ तो फिर। - नहीं आंत्वानेत, मैंने तुम्हें जिस रूप में चाहा है, उसी रूप में अपना बनाना चाहता हूँ। मैं तुमसे तुम्हारा मज“हब खरीद कर अपने मज़हब के कठमुल्लों को खुश नहीं कर सकता। मैं तुम्हें खुशी देकर खुश रहना चाहता हूँ। अगर तुम मुझे प्यारी हो तो तुम्हारा मज़हब भी मुझे प्यारा है, उतना ही जितना मेरा मज़हब और मैं यकीन करता हूँ कि लोग यह मानकर रहेंगे कि न तो आदमी-आदमी में भेद होता है और ना ही कोई मज़हब पाक और नापाक होता है। - तुम्हें यकीन है ? - मुझे यकीन है। अपने इस यकीन पर हमीद को खुद यकीन नहीं था, पर वह अपने घर में हुई कल वाली घटना से आंत्वानेत को दु:खी करना नहीं चाहता था। गुलाबी कपड़ों से और भी निखर आयी उसकी उस खुबसूरती को उदासी में नहीं बदलना चाहा था उसने। रात में ज“मात के कई लोग उसके घर आए हुए थे। ज“मात का सरदार और मस्ज़िद का इमाम तीन घंटों तक बातें करते रह गये थे और घूम फिर कर वही एक बात रटी जाती रही थी। - वह इस्लाम होकर पाक हो जाये फिर तो यह निकाह कबूल हो सकता है। अन्त में हमीद को बोलना ही पड़ गया था। - यही शर्त आंत्वानेत के परिवार और उसके गिरजाघर के पादरी की भी है। मेरे ईसाई बन जाने पर आंत्वानेत के साथ मेरी शादी पर कोई आपत्ति नहीं होगी। आंत्वानेत को वह शर्त मंजूर नहीं और आप चाहते हैं कि मैं आप लोगों की शर्त मान लूँ।
फिर तो बात बिगड़ती ही चली गयी थी। यहाँ तक बिगड़ कर रही कि हमीद के घनिष्ठ मित्रा रेमों और गायतों | ||||||||||