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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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 कहानी

 

लंगडू


महेश चंद्र द्विवेदी

 

''ज बाबू जंगीसिंह के हिंयाँ गरीबन का कम्बल बांटे जइहैं। लंगडू क़ा दस बजे भेज दिहे।''

 

मैं आँगन  मे बैठा चबेना चबा रहा था जब मेरे गाँव में स्थापित 'जंगीसिंह मेमोरियल ट्रस्ट' में काम करने वाले रामजनक ने मेरे बापू को यह आमंत्रण दिया था। रामजनक के मुख से प्रत्येक शब्द एक शीत-निर्लिप्तता के साथ निकला था और शीतकालीन प्रात: की ओसभरी वायु को कम्पित कर शीघ्र ही विलीन हो गया था। बापू के किर्सी उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना रामजनक भी हमारी आँखों के सामने से ओसभरी प्रात: की शीत में विलीन हो गया था। वह अपनी इस धारणा, कि कम्बल के लालच में मेरे बापू मुझे भेजने के अतिरिक्त कुछ और सोच भी नहीं सकते हैं, पर इतना आश्वस्त था कि उसे बापू के उत्तर की प्रतीक्षा में समय बरबाद करना अर्थहीन लगा था। पता नहीं मेरे लिये 'लंगड़' संज्ञा से बापू के मन मे क्रोध, प्रतिरोध अथवा दीनता का भाव उभरा अथवा नहीं उभरा, परंतु कम्बल मिलने की सूचना देने पर कृतज्ञता का भाव अवश्य उभरा होगा। उनके सपाट चेहरे पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया परिलक्षित नही हुई थी। मैं जानता हूँ कि मेरी विकलांगता के विषय में बापू भी इस ओसभरी शीतकालीन प्रात: की भांति ठंडे एवं निर्लिप्त हो गये हैं; और यह स्वाभाविक ही तो है क्योंकि पिछले दस वर्ष, जब से मेरे दोनों पैर पोलियो के कारण पतले हो गये हैं और मैं चलने फिरने में असमर्थ हो गया हूँ, गाँव  के सभी बच्चे, बूढे, र जवान मुझे 'ल्रंगडू' क़हकर ही तो बुलाते हैं। यहाँ तक कि बडे भइया को भी मेरा नाम लेने के बजाय 'लंगडू' क़हना अधिक सुविधाजनक लगता है। प्रतिदिन अम्मा के खाने में से रोटी का एक दो कौर पा जाने वाला कुत्ता, जो अपने को घर का सदस्य मानता है, भी जब कभी मुझे अपने साथ बाहर टहलने को उकसाता है और फिर मेरे पैरों की असमर्थता का आभास पाता है, तो कुछ देर मेरी ओर करुणा भरी दृष्टि से देखने के पश्चात मुझे छोड़कर मेरी छोटी बहिन सुग्गी के साथ खेलने लगता है।

 

चूल्हे को जलाने के लिये फुकनी में फूँक मारती अम्मा ने भी मेरे लिये रामजनक का 'लंगड़' सम्बोधन सुना था, परंतु उनकी प्रतिक्रिया का आभास हो पाना सम्भव नहीं था क्योंकि माँ की आँखों  में चूल्हे के धुएं के भरने से उत्पन्न आँसू  पहले से ही ढुलकने को आतुर हो रहे थे। मुझे याद है कि प्रारम्भ में जब मुझे पोलियो हुआ था, तो माँ मुझे अपने सीने से चिपटाकर ऐसे घूमा करतीं थीं जैसे बंदरिया अपने मरे बच्चे को सीने से चिपटाये घूमती रहती है। मैने उन्हें अनेक बार मेरे पैरों की ओर देखकर आँसू ढुलकाते हुए एवं अपने भाग्य को कोसते हुए भी देखा है। फिर मैं बड़ा होने लगा और माँ के पेट में सुग्गी आ गई और मजबूर होकर माँ को मेरे पर उमड़ने वाली अपनी करुणा से जनित मेरे प्रति लगाव के प्रदर्शन को कम करना पड़ा था। परंतु मेरा विश्वास है कि आज भी किसी के मुँह  से मेरे लिये 'लंगडू' क़ा सम्बोधन उनके अंतस्तल को झकझोर जाता है; यह अलग बात है कि वह अब इस झंझावात को अपने वक्षस्थल में ही दबा देतीं हैं, और एक बार उस व्यक्ति को निष्प्राण सी निगाहों से देखकर चुपचाप अपने काम में जुट जातीं हैं। आज भी अम्मा ने रामजनक की बात सुनकर उसकी ओर एक तीक्ष्ण दृष्टि डाली थी और फिर चूल्हा फूँकने में ऐसे जुट गईं थीं जैसे उन्होंने कुछ सुना ही न हो।


   मैं अपने घर के खुले दरवाजे क़े पार देख रहा
हूँ कि रामजनक के पीछे नीम के चबूतरे पर झाडू लगाती हुई रामदेई ने भी रामजनक की बात को ध्यान से सुना है। उसने रामजनक की बात सुनकर एक पल को अपना मुँह मेरी ओर उठाकर एक निगाह भर मुझे देखा है; और उसके पश्चात सबसे निगाह चुराते हुए झाड़ू के साथ सिमटने वाले कूडे क़ो एकटक देखने लगी है। मैं जानता हूँ कि रामदेई की यह उखडी सी निगाह मात्र एक दिखावा है। रामदेई को जब से यह भान हुआ है कि उसकी छातियों के बढ़ते उभारों पर मेरी निगाहों का देर तक ठहरना मात्र एक संयोग नही है, उसकी मुझ पर पड़ने वाली निगाह कुछ ऐसी ही उखडी उख सी रहने लगी है। जब जब उसकी निगाह मुझ पर पड़ती है वह आँखें फेरकर किसी अनजाने झंझावात में डूब जाती है। मुझे आभास है कि रामदेई के मेरे प्रति व्यवहार में बचपन का खुलापन शीघ्रता से लुप्त हो रहा है। कभी-कभी उसकी निगाह मेरे किशोर चेहरे पर उभरती मूँछों की रेख देखकर वहाँ  अटकने के लिये उसको विवश करने का प्रयत्न करती हुई सी लगती है, परंतु वह उस विवशता को एक झटके में झटक देती है। मेर मन में उसकी निकटता की उत्कंठा जितनी बढ़ रही है, वह उतनी अधिक सशंकित सी रहकर अपने को नि:स्पृह एवं निर्लिप्त दिखाने का प्रयत्न करती हैं। उसका यह निर्लिप्तता प्रदर्शित करने का प्रयत्न मेरे हृदय को कचोटता रहता है। आज रामदेई के झाड़ू लगाने के काम में जुट जाने के पश्चात भी वह अपने को निर्लिप्त प्रदर्शित करने के प्रयत्न में पूर्णत: सफल नहीं हो पा रही है। वह बार बार अपने बायें हाथ से अपनी अलकों को उठाकर पीछे कर रही है और इस क्रिया के दौरान बायें हाथ की तर्जनी से अपनी आँख का कोना भी साफ़ कर लेती है। मुझे पोलियो होने के प्रारम्भिक वर्षों में जब वह प्राय: मेरी अम्मा के पास बातें करने व खेलने आया करती थी और मैं उठकर तेजी से चलने का प्रयत्न करने पर गिर पड़ता था, तब भी मैने कभी कभी उसको अपनी उद्विग्नता इसी प्रकार व्यक्त करते देखा है। अब उसकी माँ ने उसे अकेले दुकेले मेरे घर आने को मना कर रखा है और हमारा मिलना कम हो गया है। इसके अतिरिक्त उसकी निकटता मिलने पर मै अपनी हीनता के भाव से मुक्त नहीं हो पाता हूँ, अत: अपने प्रति उसके वास्तविक भावों से अनभिज्ञ हूँ । इस कारण मैं नहीं कह सकता कि आज की उसकी प्रतिक्रिया मेरे प्रति प्रेम से उभरी है अथवा दया से। मुझे यह भी लगता है कि मेरी अम्मा को छोड़कर कोई भी व्यक्ति मेरे प्रति दया के अतिरिक्त अन्य कोई भाव कैसे रख सकता है।

 

''रमेसर! जाउ जल्दी चले जाउ, जेहिसे लाइन माँ आगे लग जइहौ।'' बापू ने मेरी तिपहिया सायकिल लाकर मेरे बगल में खड़ी कर दी है और मेरी विचार श्रृंखला भंग हो गई है। बाबू जंगी सिंह ट्रस्ट द्वारा गत वर्ष भी इन्हीं दिनों कम्बल बाँटे गये थे और देर से पहुँचने पर मैं पीछे रह गया था। फिर अन्य लोग, जो मुझसे बाद में आये थे, मुझसे आगे निकलकर कम्बल ले गये थे। मेरा नम्बर आया ही नहीं था क्योंकि कोई न कोई मुझसे आगे निकलकर कम्बल पा लेता था। अंत में थोडी सी मिठाई लेकर मुझे वापस लौटना पडा था।

 

इस वर्ष शासन द्वारा विकलांगों को दी जाने वाली सहायता के अंतर्गत एक तिपहिया सायकिल का जुगाड़ मेरे बापू ने मेरे लिये कर लिया है - जुगाड़ इसलिये कि जौनपुर के बडे ड़ाक्टर ने बापू से अपनी गाय हेतु मुफ्त में छप्पर छवाने के बाद बडा एहसान दिखाते हुए मेरा विकलांगता का प्रमाण पत्र निर्गत किया था और समाज कल्याण विभाग के बडे बाबू ने अपना हक प्राप्त करने के पश्चात ही मेरे लिये ट्रायसिकिल के स्वीकृति-पत्र पर साहब के हस्ताक्षर कराये थे। सायकिल देखकर मुझे बडी प्रसन्नता हुई थी और अनेक वर्षों बाद अब आस पास कहीं आने जाने में मैं अपने को परतंत्र नहीं पाता हूँ । दोनों हाथ से चलाने पर जब यह गति पकड़ती है तो मुझे ऐसा अनुभव होता है कि मैं आकाश में पक्षियों की भांति उड़ रहा हूँ । आज भी मैं बड़े वेग से सायकिल दौड़ाते हुए जंगी सिंह मेमोरियल ट्रस्ट पहुचा हूँ - मेरे मन में वेग से सायकिल दौड़ाने का प्रयोजन जल्दी से ट्रस्ट पहुँचने का नही था वरन् अपने शरीर मे उष्मा एवं स्फूर्ति भरना था; ट्रस्ट जाकर कम्बल प्राप्त करने में मुझे अपने में एक भिक्षुक जैसी हीनभावना का आभास होता है, परंतु मैं अपने एवं अपने परिवार के लिये कम्बल की आवश्यकता एवं उपयोगिता को भलीभांति समझता हूँ और बापू की अवज्ञा करने का साहस भी कैसे कर सकता हूँ

 

जौनपुर जनपद के शिवपुर बेलवा जैसे छोटे से गाँव, हाँ निर्धनता एवं विपन्नता कच्ची और बिना प्लास्टर की दीवालों पर रखे पुराने खपरैलों एवं छप्परों से प्रतिपल टपकती सी रहती है, में रंगों से सुसज्जित एवं लता-गुल्मों से आच्छादित जंगीसिंह मेमोरियल ट्रस्ट के विशालकाय भवन की उपस्थिति स्वतंत्रता के उपरांत प्रगति के अवसरों की उपलब्धता की एक जीवंत कहानी है। बाबू जंगीसिंह जो अपने परोपकारी स्वभाव एवं मानवीय सोच के कारण ग्रामवासियों के श्रद्धा के पात्र रहे हैं, का बड़ा बेटा बीसवीं सदी के सातवें दशक में इंजीनियरिंग पास कर अमेरिका, जो कर्मठ व्यक्तियों के लिये सदैव ही 'अवसर की भूमि' रहा है, चला गया था। इस लायक बेटे ने वहाँ उपलब्ध अवसरों का समुचित उपयोग कर पर्याप्त श्रीवृद्वि की। तत्पश्चात अपनी मातृभूमि का ऋण चुकाने के उद्देश्य से अपनी पत्नी के सहयोग एवं प्रयास से अपने पैतृक मकान का विस्तार एवं नवीनीकरण कराकर यह ट्रस्ट स्थापित किया है। अब वे दोनों वर्ष मे पाँच-छ: महीने यहाँ आकर रहने लगे हैं। मकान के साथ लगी भूमि पर बालिकाओं हेतु नि:शुल्क माध्यमिक विद्यालय की स्थापना कर दी है। निर्धनों के स्वास्थ्य की देखभाल हेतु प्रत्येक रविवार को हेल्थ-कैम्प लगवाते हैं। सुना है कि इस बार अमेरिका से उनकी मित्र लीलाबेन आईं हुईं हैं जो आज अपनी ओर से सौ कम्बल गरीबों को वितरित कर रहीं हैं।

 

ट्रस्ट के लम्बे चौडे प्रांगण में मैं पहुच चुका हूँ । अभी यहाँ  पर कम्बल लेने वाले थोडे से लोग ही आये हैं जो इधर उधर धूप मे बैठे हुए हैं। अभी कम्बल वितरण प्रारम्भ होने में देरी है और कोई लाइन नहीं लगी है। नीचे ठंडी ज़मीन पर बैठने के बजाय मैं अपनी सायकिल पर बैठा रहना अधिक आरामदेह समझता हूँ । यहाँ धूप भी अच्छी मिल रही है। अरे यह क्या? सामने से मेरे पड़ोस के देवीदीन की अम्मा अपने बडे पोते चुन्नू का हाथ पकड़ कर कम्बल लेने आ रहीं हैं। देवीदीन के यहाँ तो खाने पीने भर को पर्याप्त पैदावार होती है और कोई विकलांग भी नहीं है। हाँ , देवीदीन की माँ की कमर अवश्य झुक गई है और वह घर का कामकाज नहीं कर पातीं हैं। उनके चार हृष्ट पुष्ट बेटे हैं परंतु माँ का खाने पीने का खर्चा उठाने पर चारों की बहुओं में रोज़ चख-चख होती रहती है।

 

ट्रस्ट-भवन के लोहे के बडे से दरवाजे क़ा एक भाग धीरे-धीरे खुलता है और उसमें से रामजनक निकलता है और सभी को लाइन में लग जाने को कहता है। उसके निकलते ही सभी बैठे हुए व्यक्ति उठकर जल्दी से लाइन में आगे लग जाने के लिये दौड़ते हैं। मैं भी जल्दी से सायकिल से उतरता हूँ और लाइन में लगने को धिसटने लगता हूँ, परंतु सब मुझे पीछे धकियाकर आगे निकले जा रहे हैं; हाँ तक कि चुन्नू, जो मेरे पैर खराब होने से पहले प्रतिदिन मेरे साथ तीन-टोग और गुल्ली डंडा खेला करता था और अब भी कभी कभी मुझसे बोलने बतियाने आ जाता है, मुझे पीछे कर अपनी दादी को लाइन में आगे लगा देता है। लाइन बन चुकी है और मैं उसमें इतने पीछे लग पाया हूँ कि इस वर्ष भी कम्बल मिल पाने की मेरी आशा क्षीण हो गईं है।

 

मेरी निगाहों के सामने वे लोग कम्बल लेकर जा रहे हैं जो मुझसे बहुत बाद में आये थे। चुन्नू की दादी की तरह खाते पीते घरों के लोग भी कम्बल लेकर जा रहे हैं। मैं इस वर्ष भी कम्बल न पाने के कारण किटकिटाती शीत को गाढे क़ी सूती चादर में काटने की विवशता की कल्पना से कहीं अधिक इस अपराधबोध से ग्रस्त हो रहा हूँ कि बापू इस साल फिर मुझे मेरी अकर्मण्यता हेतु हिकारत की दृष्टि से देर तक देखते रह जायेंगे। गत वर्ष की भांति इस वर्ष भी मुझ जैसे पीछे लगे लोगों का नम्बर आने से पूर्व ही कम्बल समाप्त हो गये हैं और बचे हुए लोगों को चना-चबेना देकर विदा किया जा रहा है। मेरी कुंठा मुझे आगे बढ़कर चना-चबेना लेने से अवरोधित करती है और मैं अपने स्थान पर मूर्तिवत बैठा हुआ हूँ । अब मुझे छोड़कर अंतिम व्यक्ति जा रहा है और मैं भी अपनी सायकिल की ओर खिसकने का उपक्रम करने लगा हूँ कि तभी बाबू जंगी सिह की पुत्रवधू अपने पास छिपाया हुआ एक कम्बल लेकर मेरे पास आ जातीं हैं और मेरी रुआसी आखों में देखकर मुझसे मेरा नाम पूछने लगतीं हैं। उनके हाथ में कम्बल देखकर मेरा गला भर आता है और मैं कठिनाई से अपना नाम बोलकर उनकी ओर एकटक देखने लगता हूँ । पता नहीं क्यों मुझे उनकी आँखों में अपने प्रति एक दयालु व्यक्ति की करुणा के अतिरिक्त अम्मा के आँसू, रामदेई की उद्विग्नता, बापू की उदासीनता, भैया की सम्वेदनहीनता, एवं चुन्नू की मुझे घकेलकर आगे बढ़ जाने की ललक के भाव एक के बाद एक आते जाते दिखाई देते हैं और उनके हाथ से कम्बल लेते हुए मेरे हाथ एवं मन दोनों में अनायास एक निश्चयी भाव उत्पन्न हो रहा है।

 

मुझे भान हो रहा है कि चाहे कोई मेरे लिये आँसू बहाये अथवा मुझे पीछे घकेले, जब तक मैं अपने स्वतंत्र अस्तित्व को स्थापित करने की क्षमता प्राप्त नहीं कर लेता हूँ, मैं मात्र दया का पात्र रहूँगा; और एक नवीन उमंग के साथ मैं अपनी सायकिल की ओर बढ़ लेता हूँ । 

  महेश चंद्र द्विवेदी

1/137, विवेकखंड, गोमतीनगर

लखनऊ, उत्तरप्रदेश

 

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