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हिन्दी भाषा 'भारती' का भविष्य नीरज कुमार झा
प्रायः प्रत्येक हिन्दीभाषी हिन्दी को एक विश्वभाषा के रूप में देखना चाहता है, लेकिन स्थिति यह है कि भारत के हिन्दी क्षेत्र में ही यह भाषा अपने अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्षरत है। इसकी उपादेयता पर भी प्रश्नचिन्ह लग चुका है। यही कारण है कि विपन्न वर्ग के जन भी अत्यंत त्याग कर अपने बच्चों को अँगरेज़ी माध्यम में शिक्षा दिलवाते हैं। विकल्पहीनता की स्थिति में ही कोई अपने बालकों को हिन्दी माध्यम विद्यालयों में भेजता है। आज की अर्थव्यवस्था में अँगरेज़ी का बोलबाला तो निर्विवाद है। कृषि, लघु उद्यम, मजदूरी को छोड़ दें तो एक छोटी सी नौकरी पाने के लिए भी अँगरेज़ी का ज्ञान अनिवार्य योग्यता का हिस्सा हो चुका है, प्रबंधन की भाषा तो अँगरेज़ी है ही। अगर लोगों की मनोस्थिति को मापदंड मानें तो हिन्दी का एक भाषा के रूप में सम्मान तथा उपादेयता निश्चित तौर पर समाप्त हो चुकी है। इसका अस्तित्व महज मजबूरी या आनुष्ठानिक है। जहाँ भारत का मध्यवर्ग अँगरेज़ी को अपनाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है वहीं भारतीय अभिजन में तो हिन्दी घरेलू बोलचाल की भी भाषा नहीं रह गयी है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि हिन्दी फिल्मों के अभिनेता तथा अभिनेत्रियां, जो हिन्दी में लच्छेदार सम्वाद बोलने के कारण ही भारतीय आम जनता के बीच अपनी पहचान बनाए हुए हैं और उनके पसंदीदा कलाकार हैं वे भी रोजमर्रा के निजी तथा सामाजिक जीवन में इस भाषा का प्रयोग करना अपनी तौहीन मानते हैं। यह विचार की भाषा तो रही ही नहीं गयी है। अच्छे शोध, अच्छे विचार तथा शायद अच्छे साहित्य के लिए भी हिन्दी भाषी अँगरेज़ी भाषा पर निर्भर रहते हैं। साहित्य में तो भले ही इस भाषा की महत्ता को कमतर आंकना शायद उचित नहीं होगा, लेकिन मानविकी को छोड़ें तो समाज, प्राकृतिक तथा भौतिक विज्ञानों में इस भाषा का प्रयोग श्रेष्ठ संस्थानों में अपवाद स्वरूप ही होता है। तकनीक या प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण, जिसका उद्देश्य मात्र विज्ञान को व्यवहारिक स्वरूप प्रदान करना है, वहाँ भी भारती का प्रयोग नहीं के बराबर है। जिन लोगों ने हिन्दी को अपने शोध तथा सृजन का माध्यम बनाया हुआ है वे सामान्यतया अँगरेज़ी के प्रयोग में असमर्थ हैं। हिन्दी भाषी राज्यों के प्रशासन में अँगरेज़ी के प्रयोग को नीति के तहत हतोत्साहित किया जाता है, लेकिन उसके बावजूद निहायत ही देसी प्रकार के, आंचलिक शिक्षण संस्थानों में पढ़े, बड़े, मझोले तथा छोटे अधिकारी (ब्युरोक्रैट्स) भी मिली जुली, टूटी फूटी ही सही, अँगरेज़ी के उपयोग को अपने साहबीयत का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। यहाँ तक कि संसद में भी हिन्दी क्षेत्र के जन प्रतिनिधि भी यदि बोलने की स्थिति में हैं तो अँगरेज़ी ही बोलते हैं। बकौल उपराष्ट्रपति सह राज्यसभा अध्यक्ष श्री भैरों सिंह शेखावत, संसद में सांसद हिन्दी बोलने से कतराते हैं या यदि बोलते हैं तो उन्हें गम्भीरता से नहीं लिया जाता है (टाइम्स ऑफ इंडिया, पटना, 31 मई 2005)। उच्चतर न्यायालयों में तो हिन्दी को अभी तक अपनाया भी नहीं गया है।
उन्नति का मार्ग - हिन्दी को सशक्त बनाने का उत्तरदायित्व हर हिन्दी भाषी का है। यह उसके लिए मात्र भावनात्मक प्रश्न नहीं है। इससे उसका आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक हित जुड़ा है। साथ ही यह भी समझने की आवश्यकता है कि अँगरेज़ी भाषा का वह कितना गहन अध्ययन करे, कितना भी इसका अभ्यास करें, चूंकि यह एक विदेशी भाषा है और विदेशी संस्कृति की अभिव्यक्ति है, वह इस भाषा में उस स्तर का प्रावीण्य प्राप्त नहीं कर सकता है जो देशज भाषा में उसे सहज प्राप्त होता है। अँगरेज़ी भाषाइयों में उसकी पहचान तो एक शरणार्थी की ही रहेगी चाहे वह कुछ भी कर ले। यदि वह अँगरेज़ी में प्राकृतिक प्रवीणता हासिल कर भी लेता है तो वह ऐसा अपनी संस्कृति से बिलगाव की कीमत पर करता है। अतः प्रत्येक हिन्दी भाषी स्वयं तथा हर तरह तथा हर स्तर के संगठन, जिस पर उसका प्रभाव है, मैं प्रयास करे कि हिन्दी के प्रभाव में वृध्दि हो। ऐसी स्थिति बनने पर ही सरकारी प्रयासों में भी गम्भीरता तथा ईमानदारी दिखने की सम्भावना है।
यहाँ यह भी स्मरण रखने की आवश्यकता है कि जब भी हिन्दी के प्रसार का प्रयास हो तो उसमें किसी तरह के वर्चस्व की भावना बिलकुल नहीं होनी चाहिए। हिन्दी का प्रत्येक भारतीय भाषा से सहयोगात्मक रवैया होना चाहिए तथा नीति सहविकास की होनी चाहिए। यहाँ तक कि हिन्दी भाषी क्षेत्र में भी हिन्दी को शिक्षण संस्थानों पर थोपना भी अनुचित होगा। यह हर सामान्य शिक्षण संस्थान का विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक को अधिकार होना चाहिए कि वह आवश्यकतानुसार अपने शोध तथा शिक्षण के माध्यम का चयन करे। आज अँगरेज़ी का विरोध वास्तव में अप्रासंगिक हो चुका है। इस भाषा में भारतीयों की प्रवीणता देश के लिए लाभदायक सिद्ध हो रही है। आज देश में जरूरत है कि ज्यादा लोग अच्छी अँगरेज़ी सीखें। यह देश की आर्थिक प्रगति के लिए आवश्यकता है, लेकिन यह ध्यान रखना नितांत आवश्यक है कि अँगरेज़ी एक साधन है न कि साध्य। अँगरेज़ी सीखना चाहिए लेकिन एक उपकरण के रूप में। सीखना गलत नहीं है, लगत है अँगरेज़ी के प्रति समर्पण, उसकी आराधना। गलत है भारती का तिरस्कार, उसकी अवमानना।
जहाँ तक विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की बात है उसमें भी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति लेशमात्र नहीं होनी चाहिए। इसके विपरीत भारती के प्रसार का उद्देश्य भाषाई साम्राज्यवाद, जो वृहत्तर साम्राज्यवाद का ही हिस्सा है, का प्रतिकार होना चाहिए। साम्राज्यवाद का प्रतिकार वैकल्पिक साम्राज्यवाद नहीं वरन् अन्य भाषाओं का संरक्षण है। आज यदि विश्व की आवश्यकता जैव विविधता है तो विश्व समाज की जरूरत इसकी सांस्कृतिक विविधता की रक्षा है। भारती के प्रसार का प्रयास परस्पर आदान-प्रदान के आधार पर हो। हिन्दी भाषी विश्व की तमाम संस्कृतियों से उनकी भाषा सीखकर सीधा सम्पर्क कायम करें तथा उसके साथ ही भारती के प्रसार का प्रयास करें, यही उचित होगा।
भारती के सशकत बनाने के लिए आधारभूत आवश्यकता है कि हिन्दी भाषी क्षेत्र का आर्थिक विकास तीव्र गति से हो। भाषा की प्रतिष्ठा के लिए मात्र यह आवश्यक नहीं है कि वह भाषा कितनी बड़ी संख्या में लोगों के द्वारा बोली जाती है। महत्वपूर्ण यह है कि भाषियों की आर्थिक स्थिति क्या है? आर्थिक विकास के लिए राजनीति तथा प्रशासन को इस दिशा में प्रवृत्त करने की आवश्यकता है।
उपर्युक्त तथ्य तो मूलभूत है लेकिन जो विषय प्राथमिक तथा ज्वलंत है, वह इस क्षेत्र में शिक्षा की खासकर उच्च शिक्षा की त्रासद स्थिति है। आज इस क्षेत्र में निम्न स्तरीय राजनीति के कारण शिक्षा व्यवस्था पतन के गर्त मे है। इस क्षेत्र में शिक्षा का विश्वस्तरीय उन्नयन भारती के विकास में भी सहायक होगा। भाषा के उपादेयता तथा प्रतिष्ठा के लिए नितांत आवश्यक शर्तें हैं कि किसी भाषा में किस तरह का ज्ञान सृजित, संग्रहित तथा प्रसारित हो रहा है? हर विश्वविद्यालय में यह होना चाहिए कि वह अपने यहाँ शोध, अध्यापन के लिए हिन्दी भाषा के लिए अलग से विशेष महाविद्यालयों की स्थापना करें। ऐसा भी हो सकता है कि प्रत्येक राज्य में एक ऐसे विश्वविद्यालय की अलग से स्थापना की जाए जहाँ ज्ञान क्षेत्र की प्रत्येक विधा को स्थान प्राप्त हो तथा वहाँ अध्यापन तथा शोध की आधार भाषा मात्र हिन्दी हो। इस तरह के विद्यापीठ हिन्दी में ज्ञान के उद्गम स्थल होंगे।
हिन्दी भाषा में साहित्य तथा ज्ञान-विज्ञान में
लेखन को हर स्तर पर प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए
भरपूर संख्या में पुरस्कारों, अनुदानों,
कार्यक्रमों तथा परियोजनाओं की व्यवस्था स्थानीय,
प्रांतीय, राष्ट्रीय तथा
अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर होनी चाहिए। विश्व के प्रत्येक देश,
बड़े शहरों तथा अधिक से अधिक शिक्षण संस्थानों में
हिन्दी में अध्यापन तथा शोध की व्यवस्था होनी चाहिए। खासकर अहिन्दीभाषी
क्षेत्रों में तथा विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार को अभियान के
अंतर्गत चलाया जाना चाहिए। हिन्दी के पुस्तकों के प्रकाशन पर तथा उस प्रक्रिया में प्रयुक्त हर सामग्री तथा चल-अचल सम्पत्ति कर मुक्त हो तथा यथासम्भव सब्सिडी भी हिन्दी प्रकाशन उद्योग को मिले। भारत तथा समस्त विश्व के कोने-कोने में जितना ज्यादा सम्भव हो हिन्दी पुस्तकालयों की स्थापना की जाए। इसके अलावा ऐसी प्रतियोगिताओं का आयोजन हो जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग हिन्दी पढ़ने तथा बोलने को प्रेरित हों।
हिन्दी भाषी राज्यों में प्रशासन की भाषा हिन्दी मात्र होनी चाहिए। विदेशी आगंतुक, पर्यटकों तथा निवेशकों से संवाद के लिए दुभाषिये रखे जा सकते हैं। राजकीय सेवाओं में भर्ती के लिए हिन्दी का यथेष्ठ ज्ञान अनिवार्य अर्हता होनी चाहिए। यहाँ यह भी रेखांकित करना आवश्यक है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार की प्राथमिक भूमिका हिन्दी भाषी राज्यों की है न कि केन्द्र सरकार की।
भारती का प्रसार मात्र भावनात्मक प्रश्न नहीं है, इसका महत्व आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा अंतर्राष्ट्रीय है। अतएव इसके प्रचार पर खर्च को निवेश तथा सामाजिक कल्याण के तहत अनिवार्य मानना चाहिए।
नीतिक, सांस्कृतिक तथा
अंतर्राष्ट्रीय है। अतएव
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