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हिन्दी
- करवट लेती
नयी चुनौतियाँ
डॉ.
विनय
राजाराम
'भाषा
किसी देश की अस्मिता की द्योतक होती है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम न
होकर समूची संस्कृति को स्पष्ट करने का आईना भी होती है। भाषा न केवल
विचारों के आदान-प्रदान का साधन भर है,
अपितु वह पूरी की पूरी परम्परा की संवाहक भी होती
है।' किसी देश और राष्ट्र के स्वरूप तथा
स्वाभिमान को अभिव्यक्ति देने का नाम भाषा है। भाषा देश के इतिहास एवं
वर्तमान का वह आईना होती है, जिसमें भविष्य
भी देखा जा सकता है।
भारत की
स्वतन्त्रता के यज्ञ में जिन महापुरुषों ने आहुतियाँ
डाली थीं,
उन सबने तब ही यह अनुमान लगा लिया था कि भारत के
'राष्ट्र-देव' को
जगाना है तो 'हिन्दी के मन्त्र'
को प्रखर करना होगा। इसी हिन्दी-मन्त्र का आधार
लेकर महानायक सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज जैसी विशाल सेना खड़ी
कर हिन्दुस्तान की आजादी का सपना देखा। इसी हिन्दी-मन्त्र को साध कर
महात्मा
गाँधी
ने स्वतन्त्रता की लड़ाई में सारे भारत को एकजुट कर लिया और जीत हासिल
की।
हिन्दी-मन्त्र
का यह स्वर स्वतन्त्रता की पहली लड़ाई के दौर में ही गूंजने लगा था,
जिसको शक्ति दी थी कलम के योध्दा भारतेन्दु
हरिश्चन्द्र ने। भारतेन्दु ने पहली बार 'निज
भाषा उन्नति अहै सब उन्न्ति को मूल' कहकर
इसकी क्षमता को पहचानने का आव्हान किया था।
स्वतन्त्रता आन्दोलन के उस दौर में हिन्दी
ने जो लोकप्रियता हासिल की थी, वही आज यदि
बरकरार रहती तो भारत का सांस्कृतिक परिदृश्य कुछ और होता। आज का युवा
जिस सम्भ्रम की स्थित से गुजर रहा है, उससे
भिन्न वह एक ठोस धरातल पर खड़ा होता।अपनी भाषा,
अपनी संस्कृति और अपना इतिहास ही व्यक्ति को अपनी
निजता की पहचान कराते हैं, अभिमान तथा
स्वाभिमान जगाते हैं। अभिमान और स्वाभिमान की धरती के अभाव में आकाशीय
ऊंचाईयों को छूने का उपक्रम पूरी तरह से सफल नहीं हो पाता,
प्रयत्न भी कुछ अधिक ही करना पड़ता है।सच तो यह है
कि भारतीय जन-मानस अपने 'स्वत्व'
को न पहचान सके, इसकी
परिकल्पना अंग्रेजो ने वर्षों पूर्व कर ली थी। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने
अपने आप को अधिक समर्थ बनाने के लिए एक 'भाषा-नीति'
बनायी थी। अपने सैनिकों को प्रशिक्षित करने के लिए
कम्पनी ने 'ओरिएण्टल सेमिनरी'
नामक संस्था की स्थापना की थी जो आगे चलकर 'फोर्ट
विलियम कॉलेज' के रूप में प्रसिद्ध
हुई। भारत की
'उच्च
शिक्षा नीति' का केन्द्र यही फोर्ट विलियम
कॉलेज था। 4 मई
1800 ई. को स्थापित 'ओरिएण्टल
सेमिनरी' के प्रथम अध्यक्ष गिल क्राइस्ट थे,
जो उर्दू के पक्षधर थे,
अतः उन्होंने हिन्दी के नाम पर उर्दू को अपनाया। अपनी राजनीतिक चाल के
तहत भारत के तत्कालीन राजकाज की भाषा फारसी को अपदस्थ करके अंग्रेजो ने
अँगरेज़ी
को राजभाषा तथा सम्भ्रान्त भारतीयों के लिए सम्पर्क भाषा के रूप में
मान्यता दे दी। अंग्रेजो की भाषा-नीति निश्चित ही शैक्षिक हितों के
मद्देनज़र
नहीं थी। राजनीतिक हित-साधन का माध्यम बनी इसी नीति के तहत अंग्रेजों
ने हिन्दी के नाम पर उर्दू को प्रोत्साहित किया,
जिसका परिणाम यह निकला कि हिन्दी और उर्दू भाषियों
के मध्य खींचातानी बढ़ी। भाषायी तनाव के माध्यम से अंग्रेजों ने
साम्प्रदायिक वैमनस्य का बीज भी बड़ी कुशलता के साथ बो दिया था।
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दौर से ही
अँगरेज़ी
आकाओं के प्रयत्नों से सम्पूर्ण देश में
अँगरेज़ी
माध्यम के मिशनरी स्कूलों का जाल बिछता गया,
भारत की क्षेत्रीय भाषाएँ
किनारे कर दी गयीं,
हिन्दी का महत्व घटता गया और भारत का जन-मानस न
केवल राजनीतिक स्तर पर, अपितु भाषा एवं
संस्कृति के स्तर पर भी गुलामी की जगड़ में जकड़ता गया। भाषा को आधार
बनाकर किसी समध्द-सुसंस्कृत राष्ट्र को पूरी तरह 'गुलाम'
बना लिये जाने का यह एक अद्वितीय उदाहरण है।
हिन्दी भाषा
अपनी अन्य सहोदरा भाषाओं के साथ
अँगरेज़ी
के साथ
अँगरेज़ी
के दबाव में ऐसी दबी कि आज लगभग
60
वर्षों के बाद भी उससे निजात पाना असम्भव प्रतीत होता है। हमारी भाषाएँ
भाषायी गुलामी रूपी रेत के दलदल में फस गयी हैं। स्वतन्त्रता आन्दोलन
में अगुआ बनी हिन्दी
'राजभाषा'
तथा 'राष्ट्रभाषा'
के नाम पर हंसी का मुद्दा बन कर हमें आईने के सामने
खड़ी कर चुकी है। आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री की प्रसिद्ध
पंक्तियाँ
हैं। 'राजभाषा
के रूप में हिन्दी के विकास की जितनी सम्भावनाएँ
थीं,
दुर्भाग्य और दुश्चक्र के कारण वे मूर्त नहीं हो
सकीं। पहले राजभाषा के रूप में हिन्दी की प्रतिष्ठा की तैयारी के लिए
पन्द्रह वर्ष का समय निश्चित किया गया। पन्द्रह वर्ष बाद हिन्दी
राजभाषा के रूप में प्रयुक्त हो, इसके लिए
उच्च प्रशासकीय अधिकारियों की मानसिक तैयारी नहीं की गयी।
अँगरेज़ी
को चलते रहने दिया गया। हिन्दी को जानबूझकर उपेक्षा की गयी। पन्द्रह
वर्षों के बाद हिन्दी विरोध का आन्दोलन राजनीतिक कारणों से दक्षिण भारत
में उग्रतापूर्वक एवं उत्तर पूर्व भारत में सामान्य रूप से छेड़ा गया और
उसके बाद यह घोषणा कर दी गयी कि
अँगरेज़ी
तब तक राजभाषा के रूप में चलती रहेगी,
जब तक एक भी राज्य ऐसा चाहेगा। इसका मतलब यह हुआ कि
देश के लगभग सभी प्रमुख राज्य भी अगर हिन्दी को ही राजभाषा मानने को
तैयार हों और नागालैण्ड या मेघालय जैसा छोटा राज्य भी
अँगरेज़ी
की
माँग
करे तो
अँगरेज़ी
को राजभाषा के पद से हटाया नहीं जा सकता। इसके कारण उच्च प्रशासनिक
अधिकारियों के मन में यह बात जम गई कि
अँगरेज़ी
अनन्त काल तक राजभाषा के रूप में चलती रहेगी। अतः राजभाषा के रूप में
हिन्दी की गति अवरुध्द सी हो गयी'।
अंग्रेजों के जाने के बाद अंग्रेजियत से भरी मानसिकता के चलते हिन्दी
को हम वह स्थान कभी नहीं दे पाये, जिसकी वह
अधिकारिणी थी। हमने न तो टर्की के कमाल पाशा से कोई सबक लिया,
न ही हिब्रू जैसी मातृभाषा को पुनर्जीवित कर अपने
आप को गौरवशाली मानने वाले इज़राइलियों
से कोई सीख ली। हमने राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में हिन्दी जैसी
सर्वप्रिय,
सर्वसुलभ भाषा को दोयम दर्जे का बनाकर रख छोड़ा है।
भौतिक शास्त्र
का एक नियम है कि किसी पदार्थ पर जितना अधिक दबाव डाला जाता है,
वह उतना ही ऊपर उठकर आता है। न्यूटन के तीसरे
सिध्दान्त के रूप में ज्ञात यह वैज्ञानिक नियम निश्चित रूप से आज
'हिन्दी' भाषा पर
लागू हो रहा है। 'हिन्दी'
को जितना अधिक दबा-कुचला रखा गया,
वह उतनी ही उभर कर आज अपने महति अस्तित्व को
विश्व-पटल पर उजागर कर रही है।हिन्दी एक बेहद लचीली,
सहज-सम्भ्रान्त भाषा है। वर्षों पूर्व मध्यकाल में
भी इसने अरबी-फारसी और तुर्की भाषाओं के दबाव को बेहद संजीदगी के साथ
झेला और उन विदेशी भाषाओं के अनेकानेक शब्दों को आत्मसात करके स्वयं और
भी अधिक सशक्त बनी। यह तो सर्वविदित है ही कि अरबी-फारसी और तुर्की
भाषाओं के साथ हिन्दी की बोलियों के सह-अस्तित्व के परिणाम स्वरूप ही
उर्दू भाषा का जन्म हुआ।
बीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों से 'सूचना
क्रान्ति' के तहत सम्पूर्ण विश्व में
अभूतपूर्व एकीकरण हुआ। 'वसुधैव कुटुम्बकम्'
की भारतीय उक्ति युगों बाद 'वैश्विक
ग्राम' के रूप में साकार हुई सी लगती है।
वैश्विकीकरण के इस दौर में हिन्दी भाषा ने भी एक नयी करवट ली है। आज
सम्पूर्ण विश्व की दृष्टि एक व्यापार केन्द्र के रूप में भारत पर है।
उत्साहजनक स्थिति यह है कि इस व्यापार की भाषा हिन्दी बनती जा रही है।
भारत ने व्यापार के माध्यम से अपनी प्राचीन संस्कृति को मध्य एशिया,
योरोप और चीन तक फैलाया है। आज भी यही व्यापार
भिन्न रूप में न केवल भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर रहा है,
हिन्दी भाषा के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दे
रहा है।
'वैश्विक
बाजारवाद' के चाहे कितने ही दुष्परिणाम
गिनाये जाएँ,
उसका एक ही लाभ उन सबसे ऊपर स्थापित होने को
पर्याप्त है कि उसके कारण हिन्दी भाषा आज वैश्विक पटल पर छा रही है।
अमेरिका के राष्ट्रपति बुश कहते हैं कि हिन्दी सीखों और भारत के साथ
व्यापार करो। कुछ पूर्वी देशों में हिन्दी सीखने की होड़ लग गयी है। वे
लोग भारत आकर काम धन्धा करना चाहते हैं।भारत के भीतर की बात करें तो आज
दक्षिण भारतीय हों या पूर्वी भारतीय, गुज़राती
हों या कश्मीरी,
हर प्रान्त के लोग आज काम के सिलसिले में या
व्यापार के खातिर हिन्दी सीख रहे हैं। इसके विपरीत धुर दक्षिणी
प्रान्तों के बैंगलोर, मैसूर,
हैदराबाद जैसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के सूचना
प्रौद्योगिक केन्द्रों में हिन्दी क्षेत्र के विशेषज्ञों का जाना और
वहाँ
रहकर काम करने में हिन्दी एक वैचारिक समरसता का पुल
सिद्ध
हो रही है।
अमेरिकी बाजारों या योरोप का अगोरा,
पूरब का हाट हो या चीन की दुकान,
हर कोई अब भारत आने को उत्सुक है और भारत आने की
पहली सीढ़ी के रूप में वह 'हिन्दी'
को देखता है। बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ
अपना उत्पादन बेचने के लिए आज
'हिन्दी'
का ही सहारा ले रही हैं। पेप्सी हो या पिज्जा,
नूडल्स हो या बर्गर,
तेल-क्रीम हो या मोटर साइकल हर वस्तु की बिक्री आज हिन्दी के माध्यम से
हो रही है। अधिक लोगों तक जाना, अधिक बिक्री
का आधार है। अधिक लोग हिन्दी समझते हैं तो बिक्री की भाषा भी हिन्दी ही
होगी।आज का युग विशेषज्ञता का है। हर कहीं,
हर कोई अधिक से अधिक श्रेष्ठता अर्जित करके अपने आपको स्थापित करने के
प्रयास में जुटा है। आधुनिक तकनीक के द्वारा सूचना प्रेषित करने का
माध्यम एसएमएस और ई-मेल भी आज हिन्दी के रथ पर सवार हो चुके हैं।
विदेशों में रहने वाले हजारों युवा जब कम्प्यूटर के जरिए भारत में अपनी
माँ
या बहन से बातचीत करते हैं तो वह हिन्दी में होती है। अभी यह बातचीत
रोमन लिपि में होती है,
किन्तु वह दिन दूर नहीं जब देवनागरी लिपि भी अपना
दबदबा कायम कर लेगी।
दबाव में जीने
की आदी हो चुकी 'हिन्दी'
के लिए ये नवीन परिस्थितियाँ
रेश्मी उजास से भरपूर सुबह के सुखद स्वप्न की तरह है,
जो स्वप्न नहीं सच में तब्दील हो रहा है। हिन्दी
भाषा के विकास की चिन्ता करने वालों के लिए यह परिदृश्य उत्साहजनक
आवश्यक है। फिर भी इन तमाम खुशफहमियों के बीच कुछेक शंका-कुशंका के
बादल हिन्दी के आसपास मंडरा रहे हैं,
जिन्हें
नज़र
अन्दाज नहीं किया जा सकता।
बाजारवाद से उभरती हिन्दी भाषा के सम्मुख आज निश्चित ही भिन्न प्रकार
की चुनौतियाँ
आ
खड़ी हुई हैं। एक ओर उसके विस्तार और विकास का आनन्द है,
तो दूसरी ओर भाषायी प्रदूषण का भय भी बढ़ता जा रहा
है। तमाम अन्य क्षेत्रों में जैसे बाजारवाद का प्रदूषण फैल रहा है,
वैसे ही भाषा में भी इसके कई-कई रूप समाते जा रहे
हैं। शुध्दि-अशुध्दि से भी आगे बढ़कर भाषा का संकुचन,
विस्तार से बचने की प्रवृत्ति,
लेखन में कोताही,
सरलीकरण तथा इन जैसे और भी अनेकानेक दुष्प्रभाव धीरे-धीरे स्पष्ट होंगे,
जिनके लिए 'हिन्दी'
भाषा के पुरोधाओं को पहले से ही मोर्चा संभालना
आवश्यक हो जायेगा।
इन सब नयी चुनौतियों के साथ भारत का जन-मानस यदि
आत्म-सम्मान और स्वाभिमान के साथ हिन्दी को 'अपनी
भाषा' का स्थान देगा तो निश्चित ही हिन्दी
अपनी तमाम विरोधाभासी परिस्थितियों के जाल-जंजाल से ऊपर उठकर कमल वत
खिल उठेगी। अब वैश्विक स्तर पर हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की अधिकारिक
भाषा के रूप में मान्यता मिलने की उम्मीद है। संयुक्तराष्ट्र के
मुख्यालय न्यूयार्क में हो रहे आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में यह
उम्मीद फिर जाग उठी है।
विनय राजाराम
प्राध्यापक
हिंदी
भोपाल, मध्यप्रदेश
  
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