ई-पताः srijangatha@gmail.com

वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 व्याकरण

एक शब्द

उतारना


डॉ.गंगाप्रसाद बरसैंया

 

किसी वस्तु या व्यक्ति को ऊपर से नीचे लाने के लिये उतारना शब्द का प्रयोग किया जाता है। लेकिन यही शब्द जब अन्य की संगति में पड़ जाता है तो अपने अर्थ बदल देता है। नज़र लगने पर राई नोन से नज़र  उतारी जाती है। देवी-देवताओं, महापुरुषों की महानता के लिये उसे अपनी नज़र से उतार देते हैं। उसकी उपेक्षा करते हैं। अहंकारी लोगों का मनमर्दन कर उनका पानी उतारा जाता है और जिसका पानी उतर जाता है वह किसी काम का नहीं रहता। बर्तनों का, आभूषणों का पानी उतर जाता है तो उनका आकर्षण और चमक समाप्त हो जाती है। इसी को कलई उतरना भी कहा जाता है। दोहरा जीवन जीने वालों का मुखौटा उतर जाता है तो सारी पोल खुल जाती है। सारा ढोंग सामने आ जाता है। नज़र से उतरना और उतारने में अंतर अवश्य है। उतरने में स्वयं का भाव है और उतारने में समाज का। जब किसी को कोई बात बार-बार बताइये तब भी उसकी समझ में नहीं आती तब खीझकर कहा जाता है - उसके गले कुछ उतरना ही नहीं। बच्चों के न खाने पर भी इसका प्रयोग होता है जब कि गोली या तलवार का आघात आरपार उतर जाता है। केंवट नाव से नदी पार उतारता है और ईश्वर की कृपा भवसागर पार उतार देती है।

 

इच्छित कार्य न होने पर या असफलता मिलने पर आदमी का मुँह उतर जाता है, प्रसन्नता  गायब हो जाती है। मुँह के साथ मन भी उत्साहहीन होकर उतर जाता है। अच्छी मरम्मत होने पर अच्छों-अच्छों का नशा तर जाता है। नशा उतरने के बाद उसकी खुमारी उतरना भी जरूरी है अन्यथा शिथिलता बनी रहती है। व्यक्ति के साथ जुड़ा दायित्य जब पूरा हो जाता है या कोई ऋण चुका दिया जाता तो उसे बोझ उतरना कहा जाता है। जब तक वह नहीं उतरता तब तक व्यक्ति उस बोझ से दबा ही रहता है। ओझा मंत्र से भूत उतारता है पर किसी को अहंकार का भूत चढ़ा हो तो सबल लोग पिटाई करके उसका भूत उतार देते हैं। गुस्सा खराब और अनर्थकारी है। कई बार अकारण लोग उसका गुस्सा दूसरों पर उतारते हैं और कभी-कभी ताड़ना देकर किसी का गुस्सा उतारा जाता ह। कपड़े उतारना जीवन की सामान्य प्रक्रिया है पर जब किसी विशेष कारण से या जोश से किसी कपड़े उतारे जायें तो उसका भाव ही दूसरा होता है्। कभी-कभी लुटेरे यात्रियों के कड़े तक उतरवा लेते हैं। किसी फल की ताजगी समाप्त होने पर उसका स्वाद उतर जाता है फिर खाने में मजा नहीं आता। वैसे बुखार चढ़ना कहते हैं। अमुक को आजकल पैसे का बुखार रहता है जिस दिन घाट लगेगा सारा बुखार उतर जायेगा।दो पहलवान अखाड़े में उतरकर कुश्ती लड़ते हैं और कभीकभी विवाद होने पर जूता-चप्पल तक उतारने की नौबत आ जाती है। बाढ़ समाप्त होने पर नदी का पानी उतरता है और बच्चों का मुंडन कराकर झालर उतारी जाती है। दूध से मलाई उतारी जाती है। नकल करने को ज्यों का त्यों उतारना कहा जाता है।

 

इस प्रकार के तमाम प्रयोगों में कोई कही ऊपर से नीचे नहीं उतर रहा पर उतरना या उतारना शब्द अपना कार्य बराबर कर रहा है।इसे ठीक से समझने के लिये शब्द की अन्तरात्मा को पहचानना बहुत जरूरी है अन्यथा गड़बड़ होने की आशंका बनी रहेगी।

 

  डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया

एम.आई.जी. 12

चौबे कॉलोनी, छतरपुर, मध्यप्रदेश

 

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिकपुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google

 
WWW http://www.srijangatha.com