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उ सन्नाटा मन का इंदिरा मोहन
अपने मन का सन्नाटा ही करता है बेहाल हिलते हाथ, थके संबोधन अश्रु धुले रूमाल
तन्हाई में ऊबा-ऊबा कुहनी धर मन सोता आस पास काजल की कालिख शंका से मन रोता दरवाज़े पर नीम खाँसता बीता यह भी साल
विश्वास का जोड़-घटाना हँसी अधर से खिसकी अपनों से अपनी ही दूरी तस्वीरें जिस-जिस की सब त्योहार हो गये सूने जेबें पड़ी निढाल
उन्मादों की हर पल हलचल अस्त-व्यस्त है रातें बतियाना भूली चिंतातुर प्रियतम की सौगातें शीत लहर व्यापी है घर-घर व्यर्थ बजाती गाल
12, लखनऊ रोड़ दिल्ली - 54
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