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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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छंद

 उ

*श्रद्धांजलि*

 

बच्चू बाबू


 

 

च्चू बाबू एम.ए. करके सात साल झख मारे

खेत बेचकर पढ़े पढ़ाई उल्लू बने बिचारे ।

 

कितन अर्जी दिए न जाने कितना फूँके तापे

कितनी धूल न जाने फाँके कितना रस्ता नापे ।

 

लाई चना कहीं खा लेते कहीं बेंच पर सोते

बच्चू बाबू हुए छुहारा झोला ढोते-ढोते ।

 

उमर अधिक हो गई नौकरी कहीं नहीं मिल पाई

चौपट हुई गिरस्ती बीबी देने लगी दुहाई ।

 

बाप कहे आवारा भाई कहने लगे बिलल्ला

नाक फूला भौजाई कहती मरती नहीं निठल्ला ।

 

खून गरम हो गया एक दिन कब तक करते फाका

लोक लाज सब छोड़-छाड़कर लगे डालने डाका ।

 

बड़ा रंग है, बड़ा शान है, बरस रहा है पैसा

सारा गाँव यही कहता है, बेटा हो तो ऐसा ।  

 

 

स्व. कैलाश गौतम

 

 

  छंदकार

माह के छंदकार

 00 कैलाश गौतम 0

  - तेज धूप में

  - किस्मत हो तो ऐसी

  - बच्चू बाबू

  - गुपतेसरा

  - कुछ दोहे

 

गीत

- आनंदी सहाय शुक्ल

- ज्ञानेन्द्र साज

- अनिल अनवर

- रामदयाल

- डॉ. अजय पाठक

नवगीत

- डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

- नईम

- ऋषिवंश

- विद्यानंदन राजीव

- इंदिरा मोहन

ग़ज़ल

- रईस अहमद 'फ़िगार'

- अग्निवेश शुक्ल

- तुली फकीरचंद जलंधरी

- सुल्तान अहमद

- विज्ञान व्रत

दोहे

- चंद्रसेन विराट

- आचार्य भगवत दुबे

- पुरुषोत्तम 'यक़ीन'

- प्रभु त्रिवेदी

- जितेन्द्र जौहर

 

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