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उ *श्रद्धांजलि*
बच्चू बाबू
बच्चू बाबू एम.ए. करके सात साल झख मारे खेत बेचकर पढ़े पढ़ाई उल्लू बने बिचारे ।
कितन अर्जी दिए न जाने कितना फूँके तापे कितनी धूल न जाने फाँके कितना रस्ता नापे ।
लाई चना कहीं खा लेते कहीं बेंच पर सोते बच्चू बाबू हुए छुहारा झोला ढोते-ढोते ।
उमर अधिक हो गई नौकरी कहीं नहीं मिल पाई चौपट हुई गिरस्ती बीबी देने लगी दुहाई ।
बाप कहे आवारा भाई कहने लगे बिलल्ला नाक फूला भौजाई कहती मरती नहीं निठल्ला ।
खून गरम हो गया एक दिन कब तक करते फाका लोक लाज सब छोड़-छाड़कर लगे डालने डाका ।
बड़ा रंग है, बड़ा शान है, बरस रहा है पैसा सारा गाँव यही कहता है, बेटा हो तो ऐसा ।
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