|
|
|
||||||||||
|
|
|||||||||||
|
|
||||||||||||
|
उ मँहगे रोजी प्याज रामदयाल
साथी मेरे, मिल जाते तुम आज बातें तो होतीं ही होतीं सध जाते कुछ काज ।
बेटी की शादी के कर्जे का दे आते ब्याज कम से कम चौमासे का घर ले आते नाज ।
तुम ही मेरे भाई-बंधु हो बाकी सकल समाज बिन तुम्हारे आधा जीवन आधे रीति रिवाज ।
कौरव पांडव लड़ें आज भी वही दुःशासन राज भरी सभा में द्रुपद सुता की अब भी खिंचती लाज ।
दुनिया का बाजार बढ़ा पर मँहगे रोटी प्याज घर बाहर सब लूट मार है घात लगाये बाज ।
राजस्थान साहित्य अकादमी सेक्टर - 4, हिरणमगरी, उदयपुर - 313002
|
|
|
||||||||||
|
|
||||||||||||
|
||||||||||||