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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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  छंद

 उ

मँहगे रोजी प्याज


रामदयाल

 

साथी मेरे,

मिल जाते तुम आज

बातें तो होतीं ही होतीं

सध जाते कुछ काज ।

 

बेटी की शादी के

 कर्जे का दे आते ब्याज

कम से कम चौमासे का

घर ले आते नाज ।

 

तुम ही मेरे भाई-बंधु हो

बाकी सकल समाज

बिन तुम्हारे आधा जीवन

आधे रीति रिवाज ।

 

कौरव पांडव लड़ें आज भी

वही दुःशासन राज

भरी सभा में द्रुपद सुता की

अब भी खिंचती लाज ।

 

दुनिया का बाजार बढ़ा पर

मँहगे रोटी प्याज

घर बाहर सब लूट मार है

घात लगाये बाज ।

 

रामदयाल

राजस्थान साहित्य अकादमी

सेक्टर - 4, हिरणमगरी, उदयपुर - 313002

 

 

  छंदकार

गीत

- आनंदी सहाय शुक्ल

- ज्ञानेन्द्र साज

- अनिल अनवर

- रामदयाल

- डॉ. अजय पाठक

नवगीत

- डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

- नईम

- ऋषिवंश

- विद्यानंदन राजीव

- इंदिरा मोहन

ग़ज़ल

- रईस अहमद 'फ़िगार'

- अग्निवेश शुक्ल

- तुली फकीरचंद जलंधरी

- सुल्तान अहमद

- विज्ञान व्रत

दोहे

- चंद्रसेन विराट

- आचार्य भगवत दुबे

- पुरुषोत्तम 'यक़ीन'

- प्रभु त्रिवेदी

- जितेन्द्र जौहर

माह के छंदकार

- कैलाश गौतम

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