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उ ऐसा क्यूँ होता है ज्ञानेन्द्र साज
जब भी जाता है तो याद बहुत आता है ऐसा क्यूँ होता है ?
जाते ही सुधियों का बादल उमड़-उमड़ घिरता है पल-पल उसके साथ बिताया आँखों में तिरता है फिर मन ही क्यों उसे याद कर रह-रह कर रोता है ऐसा क्यूँ होता है ?
उसके साथ खेलना-हँसना बोलना और बतियाना कभी ढूँढना उसे कभी ख़ुद इधर-उधर छिप जाना उन आनंद पगे लम्हों को कोई नहीं खोता है ऐसा क्यूँ होता है ?
ये भी सच है जाने वाले नहीं भुलाये जाते ये भी सच है जाने वाले नहीं लौट कर आते क्यूँ उनकी यादों को कोई जीवन भर ढोता है ऐसा क्यूँ होता है ?
अलीगढ़, उत्तरप्रदेश
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