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उ ऐसा भी अक्सर होता है अनिल अनवर
मैं मन में तेरी याद सजाए बैठा हूँ तू भूल गई मुझ को तो कोई बात नहीं ।
तेरी प्रतिमा निज मन-मंदिर में स्थापित कर करता हूँ जाने कब से नित तेरा पूजन । नयनों के जल का अर्ध्य, हृदय-पीड़ा के पुष्प, विरहाग्नि सुंगधित धूप, दुखों का घिस चंदन । प्राणों की आरति-ज्योति जगाए बैठा हूँ, तुझ को यह मेरी प्रेम-तपस्या ज्ञात नहीं ।
बीता है जाने कितना लंबा अंतराल, जब मैंने तुझ को, तूने मुझ को देखा था । तू नयनों से पढ़ सकी न मैं मुख से बोला, इस प्रेम-कथा में मूक-व्यथा का लेखा था । अनजानी सी इस आस लगाए बैठा हूँ, माना अब संभव तेरा-मेरा साथ नहीं ।
मन की बातें रह जातीं है मन ही मन में, ऐसा भी अक्सर हो जाता है जीवन में । मैंने पीड़ा गीतों में सार्वजनिक कर दी, तू रही लाज के और समाज के बंधन में । यह प्रेम सफल है या असफल, मालूम नहीं, जग समझेगा तेरे-मेरे ज़ज्बात नहीं ।
जोधपुर, राजस्थान
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