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वर्ष- 2, अंक - 16, सितम्बर, 2007

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  छंद

 उ

ऐसा भी अक्सर होता है


अनिल अनवर

 

 

मैं मन में तेरी याद सजाए बैठा हूँ

तू भूल गई मुझ को तो कोई बात नहीं ।

 

तेरी प्रतिमा निज मन-मंदिर में स्थापित कर

करता हूँ जाने कब से नित तेरा पूजन ।

नयनों के जल का अर्ध्य, हृदय-पीड़ा के पुष्प,

विरहाग्नि सुंगधित धूप, दुखों का घिस चंदन ।

प्राणों की आरति-ज्योति जगाए बैठा हूँ,

तुझ को यह मेरी प्रेम-तपस्या ज्ञात नहीं ।

 

बीता है जाने कितना लंबा अंतराल,

जब मैंने तुझ को, तूने मुझ को देखा था ।

तू नयनों से पढ़ सकी न मैं मुख से बोला,

इस प्रेम-कथा में मूक-व्यथा का लेखा था ।

अनजानी सी इस आस लगाए बैठा हूँ,

माना अब संभव तेरा-मेरा साथ नहीं ।

 

मन की बातें रह जातीं है मन ही मन में,

ऐसा भी अक्सर हो जाता है जीवन में ।

मैंने पीड़ा गीतों में सार्वजनिक कर दी,

तू रही लाज के और समाज के बंधन में ।

यह प्रेम सफल है या असफल, मालूम नहीं,

जग समझेगा तेरे-मेरे ज़ज्बात नहीं ।

 

अनिल अनवर

जोधपुर, राजस्थान

 

  छंदकार

गीत

- आनंदी सहाय शुक्ल

- ज्ञानेन्द्र साज

- अनिल अनवर

- रामदयाल

- डॉ. अजय पाठक

नवगीत

- डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

- नईम

- ऋषिवंश

- विद्यानंदन राजीव

- इंदिरा मोहन

ग़ज़ल

- रईस अहमद 'फ़िगार'

- अग्निवेश शुक्ल

- तुली फकीरचंद जलंधरी

- सुल्तान अहमद

- विज्ञान व्रत

दोहे

- चंद्रसेन विराट

- आचार्य भगवत दुबे

- पुरुषोत्तम 'यक़ीन'

- प्रभु त्रिवेदी

- जितेन्द्र जौहर

माह के छंदकार

- कैलाश गौतम

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