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उ
एक तेरे ज़िक्र से स्व. अग्निवेश शुक्ल
फूल, खुश्बू, चाँद, मैख़ाना ग़ज़ल में आ गया । एक तेरे ज़िक्र से क्या क्या ग़ज़ल में आ गया।।
कर रहा था मैं तो अपनी ज़िंदगी का तज्ज़िया दूर तक फैला हुआ सहरा ग़ज़ल में आ गया ।
क़द परिन्दे का बढ़ा तो घर बदलना ही पड़ा दर्द मेरे दिल से यूँ निकला ग़ज़ल में आ गया ।
आज फिर पत्थर हुई एहसास की शहनाइयाँ आज फिर लफ़्जों का सन्नाटा ग़ज़ल में आ गया ।
मेरे कमरे की खुली खिड़की से आकर चाँद ने रात भर जो नूर बरसाया ग़ज़ल में आ गया ।
अग्निज्योति, 250, सदर बाजार शाहजहाँपुर - 242001
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